बक्सर के कुकुढ़ा में 26 अक्टूबर को होगा रावण वध:250 साल से चली आ रही परंपरा, 15 दिन तक खुले मैदानों में सजती है रामायण की दुनिया

बक्सर के कुकुढ़ा में 26 अक्टूबर को होगा रावण वध:250 साल से चली आ रही परंपरा, 15 दिन तक खुले मैदानों में सजती है रामायण की दुनिया

देशभर में विजयादशमी के दिन रावण वध के साथ दशहरा मनाया जाता है। शाम होते ही मैदानों में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं, लेकिन बिहार के बक्सर जिले के इटाढ़ी प्रखंड के कुकुढ़ा गांव में रावण अभी जिंदा है। यहां दशहरे के दिन न रावण का वध होता है और न ही उसके पुतले का दहन होता है। इसके लिए गांव के लोग शरद पूर्णिमा का इंतजार करते हैं। इस बार 26 अक्टूबर को राम-रावण युद्ध होगा और रावण का पुतला जलाया जाएगा। कुकुढ़ा में यह सिर्फ तारीख बदलने की बात नहीं है। करीब 250 साल से चली आ रही इस परंपरा में गांव की आस्था, संस्कृति और आपसी भाईचारा एक साथ दिखाई देता है। यहां 15 दिनों तक रामलीला होती है। इसकी खासियत यह है कि रामायण की कहानी किसी एक मंच पर नहीं, बल्कि गांव के चार अलग-अलग खुले मैदानों में आगे बढ़ती है। कहीं अयोध्या सजती है, कहीं चित्रकूट बनता है, तो कहीं पंपापुरी और लंका का दृश्य दिखाई देता है। गांव के लोग एक जगह बैठकर रामलीला देखने की जगह उसके साथ-साथ अलग-अलग स्थानों तक पहुंचते हैं। हिंदू-मुस्लिम मिलकर रामलीला का किरदार निभाते हैं इस रामलीला की एक और खास पहचान हिंदू-मुस्लिम एकता है। यहां मुस्लिम समुदाय के लोग भी रामलीला में किरदार निभाते रहे हैं। सुलेमान मियां करीब 20 साल तक रावण बने हैं। वहीं, हाफिज साईं भरत का किरदार निभाते थे। आज दोनों कलाकार इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन गांव के लोगों की यादों में उनका अभिनय और आपसी सद्भाव की मिसाल अब भी जिंदा है। दशहरे के बाद भी जारी रहती है रामलीला देश के अधिकतर हिस्सों में विजयादशमी के दिन राम-रावण युद्ध के बाद रावण के पुतले का दहन कर दिया जाता है। कुकुढ़ा में इसके लिए अलग परंपरा है। यहां रामलीला का आयोजन 15 दिनों तक चलता है। रावण वध विजयादशमी के पांचवें दिन किया जाता है। हालांकि, यह दिन रविवार या मंगलवार पड़ने पर वध एक दिन के लिए टाल दिया जाता है। इस बार भी इसी परंपरा के तहत 26 अक्टूबर को रावण वध और दहन होगा। ग्रामीणों का कहना है कि इस परंपरा के पीछे कोई विशेष तर्क उन्हें नहीं बताया गया है। उनके पूर्वज जिस तरीके से रामलीला करते आए, गांव की अगली पीढ़ी ने भी उसी को अपनाया। समय के साथ आसपास के गांवों में रामलीला और रावण दहन की तारीखें बदलती रहीं, लेकिन कुकुढ़ा ने अपनी परंपरा को नहीं बदला। यहां के लोगों के लिए रावण वध की तारीख कैलेंडर में दर्ज किसी सामान्य दिन की तरह नहीं है। यह उनके पूर्वजों से मिली एक ऐसी विरासत है, जिसे वे हर साल दोहराते हैं। देशभर में जब दशहरे का उत्सव समाप्त हो जाता है, तब भी कुकुढ़ा में रामलीला के प्रसंग चलते रहते हैं। गांव के लोगों के लिए असली उत्सव रामायण की कथा को उसके अंतिम पड़ाव तक पहुंचाना है। चार मैदानों में बसती है रामायण की दुनिया कुकुढ़ा की रामलीला को समझने के लिए गांव के चार स्थानों तक पहुंचना जरूरी है। यहां रामायण की कहानी के अलग-अलग पड़ावों को गांव के वास्तविक स्थानों से जोड़ा गया है। इन जगहों को अयोध्या, चित्रकूट, पंपापुरी और लंका के रूप में तैयार किया जाता है। हर स्थान पर कथा का एक हिस्सा दिखाया जाता है। इसके साथ ही मेला भी लगता है, जिससे धार्मिक आयोजन के साथ ग्रामीण जीवन की रौनक भी जुड़ जाती है। रामलीला की शुरुआत पंचायत भवन परिसर से होती है। इसे अयोध्या के रूप में सजाया जाता है। यहां भगवान राम की शिक्षा से जुड़े प्रसंगों का मंचन होता है। गांव के लोग यहां पहुंचकर रामायण की कथा की शुरुआत देखते हैं। इसके बाद कहानी अगले पड़ाव की ओर बढ़ती है। दूसरा पड़ाव कुकुढ़ा मध्य विद्यालय है, जिसे चित्रकूट के रूप में जाना जाता है। यहां चार दिनों तक रामलीला के अलग-अलग प्रसंगों का मंचन होता है। इनमें केवट प्रसंग, हिरण वध और सीताहरण जैसे दृश्य शामिल हैं। कलाकारों के अभिनय के जरिए रामायण की कहानी आगे बढ़ती है और दर्शक भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचकर इसका हिस्सा बनते हैं। इसके बाद हनुमान मंदिर परिसर पंपापुरी में बदल जाता है। यहां बाली वध का प्रसंग दिखाया जाता है। रामलीला का अंतिम पड़ाव असकामनी मैदान होता है, जिसे लंका के रूप में सजाया जाता है। यहीं राम और रावण के बीच युद्ध होता है। इसी मैदान में रावण का वध और पुतला दहन किया जाता है। इस तरह कुकुढ़ा में रामलीला केवल कलाकारों और दर्शकों के बीच का आयोजन नहीं रह जाती। पूरा गांव कथा का हिस्सा बन जाता है। दर्शक रामायण के प्रसंगों के साथ आगे बढ़ते हैं। एक स्थान पर अयोध्या का दृश्य देखते हैं, तो दूसरे स्थान पर वनवास और युद्ध से जुड़े प्रसंगों के साक्षी बनते हैं। गांव के अलग-अलग मैदानों को कथा के पड़ावों से जोड़ने की यह परंपरा कुकुढ़ा की रामलीला को खास बनाती है। सुलेमान मियां 20 साल तक बने रावण कुकुढ़ा की रामलीला की सबसे खास तस्वीर उसके कलाकारों से जुड़ी है। यहां रामायण के पात्रों को निभाने में धर्म के आधार पर कोई दूरी नहीं रही। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर आयोजन को आगे बढ़ाते रहे हैं। गांव के बुजुर्ग हरेंद्र कुशवाहा बताते हैं कि यहां हिंदू-मुस्लिम एकता की परंपरा काफी पुरानी है। मुस्लिम समुदाय के लोग हिंदुओं के त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, तो हिंदू भी मुस्लिम समुदाय के ताजिया जुलूस में शामिल होते हैं। इस आपसी भाईचारे की झलक रामलीला के मंचन में भी दिखाई देती रही है। गांव के सुलेमान मियां करीब 20 वर्षों तक रावण का किरदार निभाते रहे। रामलीला में रावण की भूमिका निभाना उनके लिए सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि गांव की साझा सांस्कृतिक परंपरा में भागीदारी थी। वह कई वर्षों तक इस किरदार से जुड़े रहे और लोगों के बीच उनकी पहचान रावण के रूप में बन गई थी। इसी तरह हाफिज साईं भरत का किरदार निभाते थे। उनके अभिनय का असर ऐसा होता था कि रामलीला देखने पहुंचे लोग भावुक हो जाते थे। भरत के अपने भाई राम के प्रति प्रेम और त्याग को वह जिस तरह निभाते थे, उसे गांव के लोग आज भी याद करते हैं। अब सुलेमान मियां और हाफिज साईं दोनों इस दुनिया में नहीं हैं। उनके जाने के बाद भी उनकी यादें रामलीला के साथ जुड़ी हुई हैं। गांव के लोगों के लिए ये दोनों कलाकार इस बात की मिसाल हैं कि लोक परंपराएं धर्म की सीमाओं से बड़ी हो सकती हैं। किसी गांव की सांस्कृतिक पहचान केवल पूजा-पाठ से नहीं, बल्कि उसमें शामिल लोगों के आपसी रिश्तों से भी बनती है। कुकुढ़ा की रामलीला में यह भाईचारा सिर्फ मंच तक सीमित नहीं है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि त्योहारों और धार्मिक आयोजनों में दोनों समुदाय एक-दूसरे का साथ देते आए हैं। यही वजह है कि यहां की रामलीला को लोग केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे गांव की एकता और साझा विरासत से भी जोड़ते हैं। ढाई सौ साल पुरानी परंपरा, लेकिन लिखित इतिहास नहीं कुकुढ़ा की रामलीला करीब ढाई सौ साल पुरानी मानी जाती है। हालांकि, इसकी शुरुआत किस वर्ष हुई और इसे सबसे पहले किसने शुरू किया, इसका कोई लिखित रिकॉर्ड ग्रामीणों के पास नहीं है। रामलीला के अध्यक्ष हरेंद्र कुशवाहा बताते हैं कि जब उन्होंने अपने दादा से इसकी शुरुआत के बारे में पूछा था, तब उन्होंने भी यही कहा था कि जब से होश संभाला, तब से गांव में रामलीला होते देख रहे हैं। इसी आधार पर ग्रामीण अनुमान लगाते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत उनके पूर्वजों ने करीब ढाई सौ साल पहले की होगी। पीढ़ी दर पीढ़ी यह आयोजन आगे बढ़ता रहा। पहले के लोग अपने अनुभव और यादों के जरिए अगली पीढ़ी को इसके बारे में बताते थे। इसी तरह रामलीला की परंपरा गांव की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गई। लिखित इतिहास नहीं होने के बावजूद इस आयोजन की निरंतरता ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। गांव के बुजुर्गों ने इसे अपने बचपन में देखा, फिर अपने बच्चों को दिखाया और अब नई पीढ़ी के सामने इसे जारी रखने की जिम्मेदारी है। रामलीला की तारीख, उसके चार पड़ाव और रावण वध की परंपरा आज भी उसी पुराने तरीके से निभाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, समय के साथ गांव की जीवनशैली बदली है। मनोरंजन के साधन बढ़े हैं और लोगों की दिनचर्या भी पहले जैसी नहीं रही। इसका असर रामलीला पर भी दिखाई देने लगा है। ग्रामीणों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस आयोजन के लिए कलाकार जुटाने और युवाओं को इससे जोड़ने की है। पहले दस गांवों के लोग आते थे, अब कलाकार ढूंढना मुश्किल रामलीला के आयोजन से जुड़े ग्रामीण बताते हैं कि पहले कुकुढ़ा की रामलीला देखने के लिए आसपास के करीब दस गांवों से लोग पहुंचते थे। गांव के मैदानों में भीड़ जुटती थी। लोग कई दिनों तक अलग-अलग प्रसंग देखने आते थे। रामलीला केवल कुकुढ़ा के लोगों का आयोजन नहीं थी, बल्कि आसपास के गांवों के लिए भी आकर्षण का केंद्र थी। ग्रामीण सुभाष कुमार बताते हैं कि पहले रामलीला को लेकर लोगों में काफी उत्साह रहता था। कई कलाकार वर्षों तक एक ही किरदार निभाते थे। दर्शक भी उन्हें उनके पात्रों के नाम से पहचानने लगे थे। किसी कलाकार के अभिनय से जुड़ी यादें लंबे समय तक लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती थीं। अब स्थिति बदल रही है। युवाओं की रुचि पहले जैसी नहीं दिखाई देती। रामलीला के लिए पात्रों की भूमिका निभाने वाले कलाकारों को जुटाना मुश्किल हो रहा है। कई बार जरूरी किरदार निभाने के लिए कलाकार नहीं मिलते। ऐसी स्थिति में रामायण की चौपाइयों का वाचन कर परंपरा को आगे बढ़ाया जाता है। यह बदलाव केवल कलाकारों की कमी तक सीमित नहीं है। किसी भी लोक परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी का उससे जुड़ना जरूरी होता है। जब युवा आयोजन में हिस्सा लेते हैं, तभी अभिनय, संवाद, पात्रों की तैयारी और आयोजन की व्यवस्थाओं का अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचता है। अगर यह सिलसिला कमजोर होता है, तो वर्षों से चली आ रही परंपरा को संभालना मुश्किल हो सकता है। हरेंद्र कुशवाहा और दूसरे ग्रामीणों के सामने भी यही चिंता है कि आने वाले वर्षों में रामलीला को उसी रूप में कैसे जारी रखा जाए। परंपरा के प्रति सम्मान है, लेकिन उसे आगे बढ़ाने के लिए कलाकारों और दर्शकों की भागीदारी जरूरी है। खुले मैदानों में रामलीला, साथ में लगता है मेला कुकुढ़ा की रामलीला में धार्मिक प्रसंगों के साथ मेले का भी आयोजन होता है। गांव के अलग-अलग स्थानों पर कथा के मंचन के दौरान लोगों की आवाजाही बनी रहती है। इससे गांव में उत्सव जैसा माहौल बनता है। परिवार के लोग रामलीला देखने आते हैं और आसपास के ग्रामीण भी इसमें शामिल होते हैं। इस आयोजन की खासियत यह है कि इसके लिए किसी एक बड़े मंच या बंद परिसर पर निर्भरता नहीं है। गांव के वास्तविक स्थानों को कथा के अनुसार तैयार किया जाता है। पंचायत भवन अयोध्या बनता है, मध्य विद्यालय चित्रकूट और हनुमान मंदिर परिसर पंपापुरी। अंत में असकामनी मैदान लंका के रूप में तैयार होता है। इन स्थानों के जरिए रामायण की कहानी गांव के बीच ही आगे बढ़ती है। यह तरीका लोगों को कथा से जोड़ता है और गांव के अलग-अलग हिस्सों को आयोजन का केंद्र बना देता है। रामलीला के दौरान इन जगहों की पहचान भी कुछ समय के लिए बदल जाती है। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले स्थान धार्मिक कथा के दृश्य बन जाते हैं। इस आयोजन में गांव के लोगों की भागीदारी ही इसकी असली ताकत है। कलाकारों के साथ आयोजन की तैयारी करने वाले लोग, दर्शक और मेले में पहुंचने वाले ग्रामीण मिलकर इसे जीवित रखते हैं। यही सामूहिक भागीदारी इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद करती रही है। 26 अक्टूबर का रावण वध, विरासत बचाने की एक और कोशिश इस बार 26 अक्टूबर को कुकुढ़ा के असकामनी मैदान में राम-रावण युद्ध के साथ रावण वध और पुतला दहन होगा। देश के दूसरे हिस्सों में दशहरे के साथ रावण दहन का आयोजन पूरा हो चुका होगा, लेकिन कुकुढ़ा के लिए यही दिन रामलीला का अंतिम और महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। यह आयोजन गांव के लोगों के लिए हर साल होने वाला धार्मिक कार्यक्रम भर नहीं है। इसके साथ उनके पूर्वजों की यादें, पुराने कलाकारों का अभिनय और हिंदू-मुस्लिम एकता की कहानियां जुड़ी हैं। सुलेमान मियां और हाफिज साईं जैसे कलाकारों की स्मृतियां इस परंपरा को और खास बनाती हैं, लेकिन इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ पुरानी यादें काफी नहीं होंगी। युवाओं को रामलीला से जोड़ना, नए कलाकार तैयार करना और आयोजन के इतिहास को दर्ज करना भी जरूरी है। अगर बुजुर्गों की यादों और अनुभवों को लिखित रूप में सहेजा जाए, तो आने वाली पीढ़ियां भी इस परंपरा की खासियत को समझ सकेंगी। कुकुढ़ा की रामलीला यह बताती है कि भारत की लोक परंपराएं हर जगह एक जैसी नहीं होतीं। कहीं दशहरे पर रावण दहन होता है, तो कहीं शरद पूर्णिमा तक रामलीला चलती है। कहीं कलाकारों की पहचान उनके किरदारों से होती है, तो कहीं धार्मिक आयोजन अलग-अलग समुदायों को जोड़ने का माध्यम बनता है। कुकुढ़ा में रावण का वध भले ही दशहरे के दिन न होता हो, लेकिन यहां रामलीला की आस्था पीढ़ियों से कायम है। 26 अक्टूबर को जब असकामनी मैदान में रावण का पुतला जलेगा, तो उसके साथ करीब ढाई सौ साल पुरानी परंपरा भी एक बार फिर जीवंत होगी। अब चुनौती यही है कि यह परंपरा केवल बुजुर्गों की यादों में सिमटकर न रह जाए, बल्कि नई पीढ़ी भी इसे उसी उत्साह और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाए। देशभर में विजयादशमी के दिन रावण वध के साथ दशहरा मनाया जाता है। शाम होते ही मैदानों में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं, लेकिन बिहार के बक्सर जिले के इटाढ़ी प्रखंड के कुकुढ़ा गांव में रावण अभी जिंदा है। यहां दशहरे के दिन न रावण का वध होता है और न ही उसके पुतले का दहन होता है। इसके लिए गांव के लोग शरद पूर्णिमा का इंतजार करते हैं। इस बार 26 अक्टूबर को राम-रावण युद्ध होगा और रावण का पुतला जलाया जाएगा। कुकुढ़ा में यह सिर्फ तारीख बदलने की बात नहीं है। करीब 250 साल से चली आ रही इस परंपरा में गांव की आस्था, संस्कृति और आपसी भाईचारा एक साथ दिखाई देता है। यहां 15 दिनों तक रामलीला होती है। इसकी खासियत यह है कि रामायण की कहानी किसी एक मंच पर नहीं, बल्कि गांव के चार अलग-अलग खुले मैदानों में आगे बढ़ती है। कहीं अयोध्या सजती है, कहीं चित्रकूट बनता है, तो कहीं पंपापुरी और लंका का दृश्य दिखाई देता है। गांव के लोग एक जगह बैठकर रामलीला देखने की जगह उसके साथ-साथ अलग-अलग स्थानों तक पहुंचते हैं। हिंदू-मुस्लिम मिलकर रामलीला का किरदार निभाते हैं इस रामलीला की एक और खास पहचान हिंदू-मुस्लिम एकता है। यहां मुस्लिम समुदाय के लोग भी रामलीला में किरदार निभाते रहे हैं। सुलेमान मियां करीब 20 साल तक रावण बने हैं। वहीं, हाफिज साईं भरत का किरदार निभाते थे। आज दोनों कलाकार इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन गांव के लोगों की यादों में उनका अभिनय और आपसी सद्भाव की मिसाल अब भी जिंदा है। दशहरे के बाद भी जारी रहती है रामलीला देश के अधिकतर हिस्सों में विजयादशमी के दिन राम-रावण युद्ध के बाद रावण के पुतले का दहन कर दिया जाता है। कुकुढ़ा में इसके लिए अलग परंपरा है। यहां रामलीला का आयोजन 15 दिनों तक चलता है। रावण वध विजयादशमी के पांचवें दिन किया जाता है। हालांकि, यह दिन रविवार या मंगलवार पड़ने पर वध एक दिन के लिए टाल दिया जाता है। इस बार भी इसी परंपरा के तहत 26 अक्टूबर को रावण वध और दहन होगा। ग्रामीणों का कहना है कि इस परंपरा के पीछे कोई विशेष तर्क उन्हें नहीं बताया गया है। उनके पूर्वज जिस तरीके से रामलीला करते आए, गांव की अगली पीढ़ी ने भी उसी को अपनाया। समय के साथ आसपास के गांवों में रामलीला और रावण दहन की तारीखें बदलती रहीं, लेकिन कुकुढ़ा ने अपनी परंपरा को नहीं बदला। यहां के लोगों के लिए रावण वध की तारीख कैलेंडर में दर्ज किसी सामान्य दिन की तरह नहीं है। यह उनके पूर्वजों से मिली एक ऐसी विरासत है, जिसे वे हर साल दोहराते हैं। देशभर में जब दशहरे का उत्सव समाप्त हो जाता है, तब भी कुकुढ़ा में रामलीला के प्रसंग चलते रहते हैं। गांव के लोगों के लिए असली उत्सव रामायण की कथा को उसके अंतिम पड़ाव तक पहुंचाना है। चार मैदानों में बसती है रामायण की दुनिया कुकुढ़ा की रामलीला को समझने के लिए गांव के चार स्थानों तक पहुंचना जरूरी है। यहां रामायण की कहानी के अलग-अलग पड़ावों को गांव के वास्तविक स्थानों से जोड़ा गया है। इन जगहों को अयोध्या, चित्रकूट, पंपापुरी और लंका के रूप में तैयार किया जाता है। हर स्थान पर कथा का एक हिस्सा दिखाया जाता है। इसके साथ ही मेला भी लगता है, जिससे धार्मिक आयोजन के साथ ग्रामीण जीवन की रौनक भी जुड़ जाती है। रामलीला की शुरुआत पंचायत भवन परिसर से होती है। इसे अयोध्या के रूप में सजाया जाता है। यहां भगवान राम की शिक्षा से जुड़े प्रसंगों का मंचन होता है। गांव के लोग यहां पहुंचकर रामायण की कथा की शुरुआत देखते हैं। इसके बाद कहानी अगले पड़ाव की ओर बढ़ती है। दूसरा पड़ाव कुकुढ़ा मध्य विद्यालय है, जिसे चित्रकूट के रूप में जाना जाता है। यहां चार दिनों तक रामलीला के अलग-अलग प्रसंगों का मंचन होता है। इनमें केवट प्रसंग, हिरण वध और सीताहरण जैसे दृश्य शामिल हैं। कलाकारों के अभिनय के जरिए रामायण की कहानी आगे बढ़ती है और दर्शक भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचकर इसका हिस्सा बनते हैं। इसके बाद हनुमान मंदिर परिसर पंपापुरी में बदल जाता है। यहां बाली वध का प्रसंग दिखाया जाता है। रामलीला का अंतिम पड़ाव असकामनी मैदान होता है, जिसे लंका के रूप में सजाया जाता है। यहीं राम और रावण के बीच युद्ध होता है। इसी मैदान में रावण का वध और पुतला दहन किया जाता है। इस तरह कुकुढ़ा में रामलीला केवल कलाकारों और दर्शकों के बीच का आयोजन नहीं रह जाती। पूरा गांव कथा का हिस्सा बन जाता है। दर्शक रामायण के प्रसंगों के साथ आगे बढ़ते हैं। एक स्थान पर अयोध्या का दृश्य देखते हैं, तो दूसरे स्थान पर वनवास और युद्ध से जुड़े प्रसंगों के साक्षी बनते हैं। गांव के अलग-अलग मैदानों को कथा के पड़ावों से जोड़ने की यह परंपरा कुकुढ़ा की रामलीला को खास बनाती है। सुलेमान मियां 20 साल तक बने रावण कुकुढ़ा की रामलीला की सबसे खास तस्वीर उसके कलाकारों से जुड़ी है। यहां रामायण के पात्रों को निभाने में धर्म के आधार पर कोई दूरी नहीं रही। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर आयोजन को आगे बढ़ाते रहे हैं। गांव के बुजुर्ग हरेंद्र कुशवाहा बताते हैं कि यहां हिंदू-मुस्लिम एकता की परंपरा काफी पुरानी है। मुस्लिम समुदाय के लोग हिंदुओं के त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, तो हिंदू भी मुस्लिम समुदाय के ताजिया जुलूस में शामिल होते हैं। इस आपसी भाईचारे की झलक रामलीला के मंचन में भी दिखाई देती रही है। गांव के सुलेमान मियां करीब 20 वर्षों तक रावण का किरदार निभाते रहे। रामलीला में रावण की भूमिका निभाना उनके लिए सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि गांव की साझा सांस्कृतिक परंपरा में भागीदारी थी। वह कई वर्षों तक इस किरदार से जुड़े रहे और लोगों के बीच उनकी पहचान रावण के रूप में बन गई थी। इसी तरह हाफिज साईं भरत का किरदार निभाते थे। उनके अभिनय का असर ऐसा होता था कि रामलीला देखने पहुंचे लोग भावुक हो जाते थे। भरत के अपने भाई राम के प्रति प्रेम और त्याग को वह जिस तरह निभाते थे, उसे गांव के लोग आज भी याद करते हैं। अब सुलेमान मियां और हाफिज साईं दोनों इस दुनिया में नहीं हैं। उनके जाने के बाद भी उनकी यादें रामलीला के साथ जुड़ी हुई हैं। गांव के लोगों के लिए ये दोनों कलाकार इस बात की मिसाल हैं कि लोक परंपराएं धर्म की सीमाओं से बड़ी हो सकती हैं। किसी गांव की सांस्कृतिक पहचान केवल पूजा-पाठ से नहीं, बल्कि उसमें शामिल लोगों के आपसी रिश्तों से भी बनती है। कुकुढ़ा की रामलीला में यह भाईचारा सिर्फ मंच तक सीमित नहीं है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि त्योहारों और धार्मिक आयोजनों में दोनों समुदाय एक-दूसरे का साथ देते आए हैं। यही वजह है कि यहां की रामलीला को लोग केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे गांव की एकता और साझा विरासत से भी जोड़ते हैं। ढाई सौ साल पुरानी परंपरा, लेकिन लिखित इतिहास नहीं कुकुढ़ा की रामलीला करीब ढाई सौ साल पुरानी मानी जाती है। हालांकि, इसकी शुरुआत किस वर्ष हुई और इसे सबसे पहले किसने शुरू किया, इसका कोई लिखित रिकॉर्ड ग्रामीणों के पास नहीं है। रामलीला के अध्यक्ष हरेंद्र कुशवाहा बताते हैं कि जब उन्होंने अपने दादा से इसकी शुरुआत के बारे में पूछा था, तब उन्होंने भी यही कहा था कि जब से होश संभाला, तब से गांव में रामलीला होते देख रहे हैं। इसी आधार पर ग्रामीण अनुमान लगाते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत उनके पूर्वजों ने करीब ढाई सौ साल पहले की होगी। पीढ़ी दर पीढ़ी यह आयोजन आगे बढ़ता रहा। पहले के लोग अपने अनुभव और यादों के जरिए अगली पीढ़ी को इसके बारे में बताते थे। इसी तरह रामलीला की परंपरा गांव की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गई। लिखित इतिहास नहीं होने के बावजूद इस आयोजन की निरंतरता ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। गांव के बुजुर्गों ने इसे अपने बचपन में देखा, फिर अपने बच्चों को दिखाया और अब नई पीढ़ी के सामने इसे जारी रखने की जिम्मेदारी है। रामलीला की तारीख, उसके चार पड़ाव और रावण वध की परंपरा आज भी उसी पुराने तरीके से निभाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, समय के साथ गांव की जीवनशैली बदली है। मनोरंजन के साधन बढ़े हैं और लोगों की दिनचर्या भी पहले जैसी नहीं रही। इसका असर रामलीला पर भी दिखाई देने लगा है। ग्रामीणों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस आयोजन के लिए कलाकार जुटाने और युवाओं को इससे जोड़ने की है। पहले दस गांवों के लोग आते थे, अब कलाकार ढूंढना मुश्किल रामलीला के आयोजन से जुड़े ग्रामीण बताते हैं कि पहले कुकुढ़ा की रामलीला देखने के लिए आसपास के करीब दस गांवों से लोग पहुंचते थे। गांव के मैदानों में भीड़ जुटती थी। लोग कई दिनों तक अलग-अलग प्रसंग देखने आते थे। रामलीला केवल कुकुढ़ा के लोगों का आयोजन नहीं थी, बल्कि आसपास के गांवों के लिए भी आकर्षण का केंद्र थी। ग्रामीण सुभाष कुमार बताते हैं कि पहले रामलीला को लेकर लोगों में काफी उत्साह रहता था। कई कलाकार वर्षों तक एक ही किरदार निभाते थे। दर्शक भी उन्हें उनके पात्रों के नाम से पहचानने लगे थे। किसी कलाकार के अभिनय से जुड़ी यादें लंबे समय तक लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती थीं। अब स्थिति बदल रही है। युवाओं की रुचि पहले जैसी नहीं दिखाई देती। रामलीला के लिए पात्रों की भूमिका निभाने वाले कलाकारों को जुटाना मुश्किल हो रहा है। कई बार जरूरी किरदार निभाने के लिए कलाकार नहीं मिलते। ऐसी स्थिति में रामायण की चौपाइयों का वाचन कर परंपरा को आगे बढ़ाया जाता है। यह बदलाव केवल कलाकारों की कमी तक सीमित नहीं है। किसी भी लोक परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी का उससे जुड़ना जरूरी होता है। जब युवा आयोजन में हिस्सा लेते हैं, तभी अभिनय, संवाद, पात्रों की तैयारी और आयोजन की व्यवस्थाओं का अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचता है। अगर यह सिलसिला कमजोर होता है, तो वर्षों से चली आ रही परंपरा को संभालना मुश्किल हो सकता है। हरेंद्र कुशवाहा और दूसरे ग्रामीणों के सामने भी यही चिंता है कि आने वाले वर्षों में रामलीला को उसी रूप में कैसे जारी रखा जाए। परंपरा के प्रति सम्मान है, लेकिन उसे आगे बढ़ाने के लिए कलाकारों और दर्शकों की भागीदारी जरूरी है। खुले मैदानों में रामलीला, साथ में लगता है मेला कुकुढ़ा की रामलीला में धार्मिक प्रसंगों के साथ मेले का भी आयोजन होता है। गांव के अलग-अलग स्थानों पर कथा के मंचन के दौरान लोगों की आवाजाही बनी रहती है। इससे गांव में उत्सव जैसा माहौल बनता है। परिवार के लोग रामलीला देखने आते हैं और आसपास के ग्रामीण भी इसमें शामिल होते हैं। इस आयोजन की खासियत यह है कि इसके लिए किसी एक बड़े मंच या बंद परिसर पर निर्भरता नहीं है। गांव के वास्तविक स्थानों को कथा के अनुसार तैयार किया जाता है। पंचायत भवन अयोध्या बनता है, मध्य विद्यालय चित्रकूट और हनुमान मंदिर परिसर पंपापुरी। अंत में असकामनी मैदान लंका के रूप में तैयार होता है। इन स्थानों के जरिए रामायण की कहानी गांव के बीच ही आगे बढ़ती है। यह तरीका लोगों को कथा से जोड़ता है और गांव के अलग-अलग हिस्सों को आयोजन का केंद्र बना देता है। रामलीला के दौरान इन जगहों की पहचान भी कुछ समय के लिए बदल जाती है। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले स्थान धार्मिक कथा के दृश्य बन जाते हैं। इस आयोजन में गांव के लोगों की भागीदारी ही इसकी असली ताकत है। कलाकारों के साथ आयोजन की तैयारी करने वाले लोग, दर्शक और मेले में पहुंचने वाले ग्रामीण मिलकर इसे जीवित रखते हैं। यही सामूहिक भागीदारी इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद करती रही है। 26 अक्टूबर का रावण वध, विरासत बचाने की एक और कोशिश इस बार 26 अक्टूबर को कुकुढ़ा के असकामनी मैदान में राम-रावण युद्ध के साथ रावण वध और पुतला दहन होगा। देश के दूसरे हिस्सों में दशहरे के साथ रावण दहन का आयोजन पूरा हो चुका होगा, लेकिन कुकुढ़ा के लिए यही दिन रामलीला का अंतिम और महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। यह आयोजन गांव के लोगों के लिए हर साल होने वाला धार्मिक कार्यक्रम भर नहीं है। इसके साथ उनके पूर्वजों की यादें, पुराने कलाकारों का अभिनय और हिंदू-मुस्लिम एकता की कहानियां जुड़ी हैं। सुलेमान मियां और हाफिज साईं जैसे कलाकारों की स्मृतियां इस परंपरा को और खास बनाती हैं, लेकिन इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ पुरानी यादें काफी नहीं होंगी। युवाओं को रामलीला से जोड़ना, नए कलाकार तैयार करना और आयोजन के इतिहास को दर्ज करना भी जरूरी है। अगर बुजुर्गों की यादों और अनुभवों को लिखित रूप में सहेजा जाए, तो आने वाली पीढ़ियां भी इस परंपरा की खासियत को समझ सकेंगी। कुकुढ़ा की रामलीला यह बताती है कि भारत की लोक परंपराएं हर जगह एक जैसी नहीं होतीं। कहीं दशहरे पर रावण दहन होता है, तो कहीं शरद पूर्णिमा तक रामलीला चलती है। कहीं कलाकारों की पहचान उनके किरदारों से होती है, तो कहीं धार्मिक आयोजन अलग-अलग समुदायों को जोड़ने का माध्यम बनता है। कुकुढ़ा में रावण का वध भले ही दशहरे के दिन न होता हो, लेकिन यहां रामलीला की आस्था पीढ़ियों से कायम है। 26 अक्टूबर को जब असकामनी मैदान में रावण का पुतला जलेगा, तो उसके साथ करीब ढाई सौ साल पुरानी परंपरा भी एक बार फिर जीवंत होगी। अब चुनौती यही है कि यह परंपरा केवल बुजुर्गों की यादों में सिमटकर न रह जाए, बल्कि नई पीढ़ी भी इसे उसी उत्साह और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाए।  

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