‘प्लीज मुझे बचा लो, मैं मरना नहीं चाहती’ नेपाल की बाढ़ ने बच्चों के मन में छोड़ा खौफ, हर रात डरकर चीख रही 8 साल की बच्ची

‘प्लीज मुझे बचा लो, मैं मरना नहीं चाहती’ नेपाल की बाढ़ ने बच्चों के मन में छोड़ा खौफ, हर रात डरकर चीख रही 8 साल की बच्ची

Nepal Flood News : काठमांडू। नेपाल में आई भीषण बाढ़ और तबाही का असर सिर्फ घरों और सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि इस आपदा ने बच्चों के मन पर भी गहरे जख्म छोड़े हैं। त्रिशूली में बाढ़ की भयावहता देखने वाली 8 साल की बिप्रिन्शा कार्की आज भी उस मंजर को भूल नहीं पा रही है। वह हर रात नींद से जागकर चीखती है- ‘प्लीज मुझे बचा लो… मैं मरना नहीं चाहती।’

त्रिशूली को इस आपदा का प्रमुख केंद्र बताया जा रहा है। कक्षा 2 में पढ़ने वाली बिप्रिन्शा उस समय स्कूल में थी, जब अचानक तेज धमाके जैसी आवाज सुनाई दी। उसने बताया कि आवाज इतनी तेज थी, जैसे कोई बम फट गया हो। कुछ ही पल में पूरा इलाका हिलने लगा और चारों तरफ धुआं व कोहरा छा गया।

सेना के बेस कैंप में लिया सहारा, हर तरफ बिखरा दर्द

सीएनएन-न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, त्रिशूली स्थित सेना के बेस कैंप के बाहर अपनों की राह देख रही बिप्रिंश की मां बीना कार्की, जो पेशे से एक बीमा एजेंट हैं, अपनी दो बेटियों के साथ पिछले कुछ दिनों से यहीं शरण लिए हुए हैं। वे किसी तरह सेना के रेस्क्यू हेलीकॉप्टर के जरिए अपने ससुराल जाने की उम्मीद लगाए बैठी हैं। बीना ने बताया कि हमारा सब कुछ खत्म हो गया। घर, गृहस्थी का सामान सब बह गया। सड़कें तक नहीं बची हैं। मेरे पति विदेश में काम करते हैं। अगर सेना का हेलीकॉप्टर मिल जाए, तो मैं बच्चों को लेकर ससुराल पहुंच सकती हूं।

‘मेरी बहन आज भी चीखती है- मुझे बचा लो’

बड़ी बहन प्रिंशा ने 26 अगस्त की घटना को याद करते हुए बताया कि स्कूल में अचानक धमाके जैसी आवाज आई। ऐसा लगा जैसे भूकंप आ गया हो। कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। चारों तरफ धुआं और कोहरा था। शिक्षकों ने सभी बच्चों को इकट्ठा किया और नुवाकोट दरबार की ओर ऊंचाई पर ले गए। प्रिंशा ने बताया कि जब स्थिति थोड़ी शांत हुई तो उन्होंने देखा कि बाढ़ ने क्या तबाही मचाई है। उसने कहा कि उसकी छोटी बहन आज भी उस दिन को याद कर चीखने लगती है ‘प्लीज मुझे बचा लो।’

चेहरे पर मायूस मुस्कान और आंखों में अनजाना खौफ

8 साल की बिप्रिन्शा लोगों के सामने खुद को बहादुर दिखाने की कोशिश करती है। जब उससे पूछा गया कि क्या वह ठीक है तो वह मुस्कुराती है। लेकिन कुछ ही देर बाद वह मेडिकल मास्क को चेहरे के ऊपर खींच लेती है, मानो उन भावनाओं को छिपाना चाहती हो जिन्हें शब्दों में बयां करना उसके लिए मुश्किल है। नुवाकोट स्थित सेना का बेस कैंप इस समय हजारों प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय बना हुआ है। यहां बिप्रिन्शा की उम्र के कई बच्चे भी पहुंच रहे हैं।

एक रेस्क्यू हेलीकॉप्टर के उतरने के बाद करीब चार साल के दो भाई-बहनों को बचावकर्मी अपनी गोद में लेकर पहुंचे। उनके माता-पिता का कोई पता नहीं था। घबराया हुआ बच्चा सिर्फ अपना नाम ‘बिजय’ बता सका। वहीं करीब 10 साल का एक बच्चा अपनी मां का हाथ कसकर पकड़े हुए था। उसकी मां ने बताया कि वे चार दिन तक पहाड़ियों में फंसे रहे, जिसके बाद उन्हें बचाया गया। परिवार ने अपना बहुत कुछ खो दिया, लेकिन मां इस बात से राहत महसूस कर रही थी कि उसका बेटा उसके साथ सुरक्षित है।

स्कूल और बस्तियों को फिर से बसाने की चुनौती

नुवाकोट का सेना शिविर हजारों प्रभावित लोगों के लिए जिंदगी का नया सहारा बना है। हालांकि अब सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जिंदगी की ओर लौटना है। बच्चों को स्कूल लौटने में कई सप्ताह लग सकते हैं। त्रिशूली, नुवाकोट, बट्टर और देवघाट जैसे इलाकों में घर, बाजार और पूरी बस्तियां तबाह हो गई हैं। इन्हें दोबारा बसाने में लंबा समय लगने की संभावना है।

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