प्रयागराज में युवाओं को साधने के लिए लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान का ‘यूथ बोले तो’ कार्यक्रम आयोजित किया । इस आयोजन ने सियासी गलियारों में एक नई चर्चा छेड़ दी है। पिछले महीने ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इसी शहर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के जरिए युवाओं की नब्ज टटोलने की कोशिश की थी। दोनों ही कार्यक्रमों का मुख्य लक्ष्य युवा और छात्र वोटर थे, लेकिन दोनों नेताओं की रणनीति, संवाद की शैली और सियासी संदेश एक-दूसरे से मिलतें जुलते दिखे। चिराग पासवान का ‘यूथ बोले तो’ चिराग पासवान का कार्यक्रम युवाओं के अधिकारों की लड़ाई, करियर की चुनौतियों और भविष्य के निर्माण के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। चिराग ने युवा नेतृत्व, आधुनिक सोच और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की सीधी भागीदारी पर जोर दिया। यह एनडीए (NDA) के पक्ष में युवा वोटरों, खासकर नए और महत्वाकांक्षी युवाओं को लामबंद करने की रणनीति का हिस्सा के तौर पर देखा गया। राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’: सिस्टम पर सवाल और संवाद वहीं कुछ महीने पहले प्रयागराज में आयोजित हुए राहुल गांधी के कार्यक्रम का मुख्य फोकस छात्रों की जमीनी समस्याओं पर था। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने, और शिक्षण संस्थानों में छात्रों के अधिकारों जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया गया। उन्होंने छात्रों की परेशानियां सुनीं और सिस्टम की खामियों पर सरकार को घेरा। यह कार्यक्रम सीधे तौर पर व्यवस्था से नाराज या निराश युवाओं को विपक्षी गठबंधन (INDIA) के साथ जोड़ने की एक कोशिश थी। क्या है इसके सियासी मायने? एक ओर जहां राहुल गांधी का कार्यक्रम छात्रों के असंतोष और शिकायतों को स्वर देने का मंच था, वहीं चिराग पासवान का कार्यक्रम युवाओं की महत्वाकांक्षाओं और ऊर्जा को भुनाने का प्रयास था। दोनों ही पार्टियां यह जानती हैं कि जो प्रयागराज के युवा को साधेगा, वह यूपी की सियासत में मजबूत पकड़ बनाएगा। आने वाले चुनावों में उत्तर प्रदेश का युवा और उसकी समस्याएं केंद्र बिंदु में रहने वाली हैं। दोनों ही नेताओं ने अपनी-अपनी राजनीतिक पिच तैयार कर ली है, अब देखना यह होगा कि प्रयागराज का युवा किस नेता के विजन पर ज्यादा भरोसा जताता है।

