पेरेंटिंग- हमारे दोनों बच्चे बहुत लड़ते हैं:डांटने-समझाने का कोई असर नहीं, उन्हें विवाद सुलझाना, आपस में प्यार से रहना कैसे सिखाएं

पेरेंटिंग- हमारे दोनों बच्चे बहुत लड़ते हैं:डांटने-समझाने का कोई असर नहीं, उन्हें विवाद सुलझाना, आपस में प्यार से रहना कैसे सिखाएं

सवाल- मैं 42 साल का हूं। मेरे दो बच्चे हैं- 13 साल का बेटा और 9 साल की बेटी। दोनों की आपस में बिल्कुल नहीं बनती। सुबह स्कूल जाने से लेकर रात सोने तक दोनों में किसी-न-किसी बात पर बहस, लड़ाई होती रहती है। अब तो वे साथ बैठकर खाना तक नहीं खाना चाहते। घर में हर समय तनाव का माहौल रहता है और हम पति-पत्नी भी इस वजह से परेशान रहने लगे हैं। कई बार गुस्से में हम बच्चों को डांट देते हैं, लेकिन उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या भाई-बहनों के बीच झगड़ा नॉर्मल है? क्या ये झगड़े भविष्य में भी उनके रिश्ते को भी प्रभावित कर सकते हैं? बतौर पेरेंट्स हमें क्या करना चाहिए, ताकि उनके बीच सहयोग और अपनापन बढ़ सके? एक्सपर्ट- डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- अगर घर में दो बच्चे हैं तो उनके बीच कभी-कभार झगड़ा, नोकझोंक होना बिल्कुल सामान्य है। खिलौने, टीवी का रिमोट, पसंदीदा खाना, कमरे की बेस्ट जगह या माता-पिता का अटेंशन, इन छोटी-छोटी बातों के लिए भाई-बहन के बीच बहस होना सामान्य भी है और स्वाभाविक भी। यह उनके डेवलपमेंट का ही हिस्सा है। इससे वे अपनी बात रखना, समझौते करना और आपसी मतभेद सुलझाना सीखते हैं। लेकिन जैसाकि आपने लिखा है कि अब दोनों के बीच यह सामान्य झगड़ा नहीं रह गया है। आपने लिखा है- ऐसी स्थिति में इसे सिर्फ ‘भाई-बहन की सामान्य लड़ाई’ कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सिबलिंग्स के बीच झगड़े के मुख्य कारण आपके बच्चों की उम्र 13 और 9 साल है। दोनों अलग-अलग डेवलपमेंटल स्टेज में हैं। बड़े बेटे में किशोरावस्था की शुरुआत हो रही है, जहां वह अपनी पहचान और पर्सनल स्पेस चाहता है। वहीं 9 साल की बेटी अभी भी परिवार के साथ ज्यादा जुड़ाव और अटेंशन चाहती है। इन अलग-अलग जरूरतों की वजह से टकराव बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन अगर यह टकराव लगातार हो रहा है तो पेरेंट्स को बीच में सिर्फ ‘जज’ नहीं, बल्कि इमोशनल कोच की भूमिका निभानी होगी। आपको यह समझने की कोशिश करनी होगी कि इस केस में दोनों के बीच टकराव की वजह क्या है। किस कारण से दोनों के बीच दूरियां बढ़ी हैं। साथ ही भाई-बहनों के बीच लड़ाई के सभी संभावित कारणों का एक ओवरव्यू जरूरी है। इसे ग्राफिक में देखिए- सिबलिंग फाइट का रिश्ते पर प्रभाव अगर दोनों के बीच लंबे समय तक लगातार अपमान, कटुता और दुश्मनी का माहौल बना रहे तो इसका असर भविष्य के रिश्ते पर भी पड़ सकता है। अगर बचपन में ही बहुत ज्यादा दूरियां बन जाएं तो कई बार एडल्ट होने के बाद भी वो दूरियां खत्म नहीं होती हैं। चाइल्ड साइकोलॉजी कहती है कि बचपन में भाई–बहन के बीच अगर सहयोग और विश्वास का रिश्ता हो तो आगे चलकर यह चीज उनके कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट स्किल को प्रभावित करता है। भाई-बहन के झगड़े में पेरेंट्स क्या करें? अगर झगड़ा छोटा है तो बच्चों को खुद उसे सुलझाने और ठीक करने का मौका देना चाहिए। लेकिन अगर- तो माता-पिता को हस्तक्षेप करना चाहिए। ध्यान रखें, हस्तक्षेप का मतलब फैसला सुनाना नहीं, बल्कि समाधान सिखाना है। इन संकेतों को गंभीरता से लें और ऐसा होने पर तुरंत पेरेंटल हस्तक्षेप करें– पेरेंट्स की कॉमन गलतियां कई माता-पिता अनजाने में कुछ ऐसी बातें कह देते हैं, जो झगड़े को और बढ़ा सकती हैं, जैसेकि- ऐसे वाक्य बच्चों को समस्या का हल नहीं सिखाते, बल्कि उन्हें एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बना सकते हैं। इसलिए अगर बच्चे झगड़ें तो कभी भी उनके बीच तुलना न करें। बच्चों की भावनाओं को समझें ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि बच्चों के बीच झगड़ा खिलौने, टीवी या कमरे को लेकर हुआ है, लेकिन असली वजह कुछ और होती है, जैसेकि- इसलिए सिर्फ व्यवहार नहीं, उसके पीछे की भावना को समझना जरूरी है। भाई-बहन का झगड़ा खत्म होने के बाद पेरेंट्स को कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए- भाई-बहन में अपनापन कैसे बढ़ाएं? इस समस्या को हल करने और बच्चों के बीच अपनापन बढ़ाने के लिए पेरेंट्स को ही समझदारी और मैच्योरिटी के साथ कुछ कदम उठाने होंगे। मैं यहां आपको 5 बुनियादी चीजें बता रही हूं। 1. तुलना पूरी तरह बंद करें 2. दोनों के साथ अलग-अलग समय बिताएं 3. टीमवर्क वाले काम दें बच्चों को ऐसे काम दें, जो दोनों साथ मिलकर करें, जैसेकि- जब बच्चे साथ मिलकर किसी लक्ष्य पर काम करते हैं तो उनके बीच सहयोग बढ़ता है। 4. विवाद सुलझाने की भाषा सिखाएं बच्चों को कॉन्फ्लिक्ट को सुलझाने वाली भाषा सिखाएं। उन्हें अपने इमोशंस को व्यक्त करने और अपनी भावनाओं को शब्द देने की कला सिखाएं। जैसेकि दूसरे पर आरोप लगाने की बजाय अपनी तकलीफ को कैसे एक्सप्रेस करना है। कुछ उदाहरण: ये न कहें: “तुम हमेशा मेरी चीजें छीन लेते हो।” इसकी जगह कहें: “मुझे बुरा लगा कि तुमने मेरी चीज बिना पूछे ले ली।” ये न कहें: “तुम कभी मेरी बात नहीं सुनते।” इसकी जगह कहें: “मुझे अच्छा लगेगा, अगर तुम मेरी बात पूरी सुनो।” ये न कहें: “तुम बहुत परेशान करते हो।” इसकी जगह कहें: “जब तुम ऐसा करते हो, तो मुझे गुस्सा आता है। हम इसे कैसे सुलझाएं?” ये न कहें: “तुमने मेरा गेम खराब कर दिया।” इसकी जगह कहें: “मुझे दुख हुआ कि मेरा गेम रुक गया। क्या हम फिर से शुरू कर सकते हैं?” यह इमोशनल कम्युनिकेशन की शुरुआत है। 5. सभी के लिए एक नियम बनाएं पूरे परिवार के साथ बैठकर कुछ नियम तय करें, जैसेकि- जब नियम पूरे परिवार के लिए हों, तो बच्चों को वे ज्यादा स्वीकार्य लगते हैं। बड़ा बच्चा किशोर है, इसलिए… कब एक्सपर्ट की मदद लें? अगर- तो चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या फैमिली काउंसिलर से सलाह लेना उचित रहेगा। याद रखें भाई-बहनों के बीच मतभेद होना सामान्य है। लेकिन रिश्ते में सम्मान, भरोसा और सहयोग बनाए रखना सीखना भी उतना ही जरूरी है। माता-पिता का काम हर झगड़े का फैसला सुनाना नहीं, बल्कि बच्चों को यह सिखाना है कि असहमति के बावजूद एक-दूसरे की बात कैसे सुनी जाए, भावनाओं को कैसे व्यक्त किया जाए और समाधान कैसे खोजा जाए। ***************** ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा …………………. पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…

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