‘पिछले साल 28 को भाई को मारा, किसे राखी बांधू’:बेगूसराय में 12 साल के बच्चे की प्राइवेट पार्ट काट हुई थी हत्या, IO बोली- नहीं मिला सुराग

‘पिछले साल 28 को भाई को मारा, किसे राखी बांधू’:बेगूसराय में 12 साल के बच्चे की प्राइवेट पार्ट काट हुई थी हत्या, IO बोली- नहीं मिला सुराग

‘हम तीन बहन हैं, एक भाई था। पिछले साल 28 अगस्त को ही मेरे भाई की हत्या हो गई थी। इस साल भाई नहीं है, अब हम तीनों बहन किसको राखी बांधेंगे। पहले जब तीनों बहन अपने भाई को राखी बांधती थी, तो कुछ गिफ्ट मिलता था, अब वो हक भी हत्यारे ने हम तीनों बहन से छीन लिया। मेरा भाई था, साल 2025 में 28 तारीख को आठवें महीने में बदमाशों ने मेरे बड़े भाई को मार दिया था। मैंने अपने हाथों से भाई को मुखाग्नि दी थी। इस बार हम राखी किसको बांधेंगे, बहुत याद आती है। एक साल बीत जाने के बाद भी पुलिस मेरे भाई के कातिल को तलाश नहीं पाई है।’ बेगूसराय के साहेबपुर कमाल के खरहट गांव की रहने वाली 15 साल की पूजा और 10 साल की सोनाक्षी कुमारी ने ये बातें दैनिक भास्कर से कही। पूजा और सोनाक्षी के इकलौते भाई 12 साल के अमृतांशु उर्फ मनसुख की पिछले साल अज्ञात अपराधियों ने प्राइवेट पार्ट काटकर हत्या कर दी थी। मनसुख की हत्या के एक साल बाद भी पुलिस किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है। केस की आईओ का कहना है कि अब तक हम लोगों ने 20 संदिग्धों से पूछताछ की, लेकिन कोई ठोस सुराग नहीं मिला। अब सिलसिलेवार तरीके से जानिए पूरा मामला अमृतांशु की तीसरी और सबसे बड़ी बहन अपने ननिहाल में थी। उसने फोन पर बातचीत में बताया कि आज देशभर में बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांध रही हैं, लेकिन मैं इतनी अभागी हूं कि भाई को राखी नहीं बांध पा रही हूं। अज्ञात अपराधियों ने मेरे भाई को हम तीनों बहनों से छीन लिया। मैं मायूस थी, इसलिए मैं अपने नानी के घर आ गई। वही, अमृतांशु के पिता श्याम दास ने बताया कि मेरी दो बेटियों के बाद साल 2013 में बेटे का जन्म हुआ तो परिवार में खुशी का माहौल था। भगवान से दिन-रात मन्नतें मांगने के बाद ये खुशी नसीब हुई थी। मेरी बड़ी बेटी ने अमृतांशु नाम रखा। सुबह से लेकर रात तक पूरे घर में अपनी तोतली बोली, हंसी और खिलखिलाहट से सबका दिल बहलाने वाले अमृतांशु को पूरा परिवार और गांव वाले प्यार से मनखुश बुलाने लगे। वो वाकई हर किसी का मन खुश कर देता था। मनखुश प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ता था। पढ़ाई में तेज, व्यवहार में नटखट और खेलकूद में सबसे आगे रहने वाले मनखुश से पूरे गांव को बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन किसी को क्या खबर थी कि मन्नतों से पाया गया यह चिराग इतनी बेरहमी से बुझा दिया जाएगा। पिछले साल 28 अगस्त को स्कूल से हंसता हुआ घर लौटा था मनखुश श्याम दास यादव बताते हैंं कि दोपहर लगभग 1 से 2 बजे के बीच मनखुश स्कूल से हंसता हुआ घर लौटा था। कपड़े बदले, खाना खाया, नहाया और थोड़ा आराम किया। शाम 4 बजे वह रोज की तरह पास के शालीग्रामी गांव में कोचिंग पढ़ने चला गया। शाम 6 बजे कोचिंग से लौटकर उसने अपना बैग घर में रखा और रोज की तरह गांव के ही खेल मैदान (फील्ड) में दोस्तों के साथ खेलने चला गया। उस समय मैदान में करीब एक-दो सौ लोग और बच्चे मौजूद थे। शाम करीब 7 बजे जब अचानक हल्की बारिश शुरू हुई, तो मैदान में मौजूद बच्चे अपने-अपने घर लौटने लगे। लेकिन मनखुश घर नहीं पहुंचा। देर शाम 7:30 बजे पिता श्याम दास यादव चौक पर से घर लौटे, तो मनखुश को न पाकर परिजनों की धड़कनें तेज हो गई। पति-पत्नी और बहनें बदहवास होकर मैदान की तरफ भागे। वहां मनखुश नहीं था। परिजनों ने पूरे गांव में चप्पा-चप्पा छान मारा, सबदलपुर स्टेशन, मल्हीपुर और आसपास के गांवों में खोजबीन की। मानसी में गणेश मेला लगा था, वहां तक गए कि शायद बच्चा किसी के साथ मेला देखने चला गया हो। नाते-रिश्तेदारों को फोन घुमाए गए, लेकिन मनखुश का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। रातभर पूरा परिवार जगकर मनखुश को तलाशता रहा। परिजनों ने उस रात पुलिस को सूचना नहीं दी। उनके मन में खौफ था कि अगर किसी ने फिरौती के लिए अपहरण किया होगा और पुलिस बीच में आई, तो बदमाश बच्चे को नुकसान न पहुंचा दें। वे रातभर फोन की घंटी बजने का इंतजार करते रहे कि अपहरणकर्ता जितने पैसे मांगेंगे, वे दे देंगे, बस उनका बेटा सलामत लौट आए। जब सुबह तक कोई फोन नहीं आया और न ही मनखुश का पता चला, तो सुबह 9 बजे बदहवास पिता साहेबपुर कमाल थाना पहुंचे और लिखित आवेदन दिया। पुलिस की टीम हरकत में आई, आसपास के गांवों में छानबीन और सीसीटीवी कैमरे खंगाले जाने लगे। लेकिन दोपहर होते-होते खरहट गांव पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गांव का ही एक व्यक्ति आया और मनखुश के चाचा को बुलाकर ले गया। घास के बीच पड़ी थी मनखुश की लाश, प्राइवेट पार्ट कटा हुआ था वहां खेत में जो नजारा था, उसने देखने वालों की रूह कंपा दी। घास के बीच मनखुश की विभत्स और खौफनाक लाश पड़ी हुई थी। कातिलों ने दरिंदगी और हैवानियत की सारी हदें पार कर दी थीं। मनखुश का गला रेता हुआ था, पेट पर धारदार हथियार से दो जगह गहरे वार किए गए थे और उसकी पैंट खोलकर गुप्तांग को भी काट दिया गया था।
12 साल के मासूम पर किस कदर का जुल्म ढहाया गया था, यह देखकर पूरी पुलिस टीम और गांव स्तब्ध रह गया। घटना के बाद गांव में हड़कंप मच गया। एसपी, डीएसपी, FSL की टीम और डॉग स्क्वॉड मौके पर पहुंचे। उस वक्त बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि बहुत जल्द हत्यारों को सलाखों के पीछे भेज दिया जाएगा। लेकिन आज घटना के इतने समय बाद भी पुलिस के हाथ पूरी तरह खाली हैं। जिस खेत में मनखुश की लाश मिली थी, वहां आज भी घास उगाई जा रही है। लेकिन उस खेत के पन्नों पर लिखा खून का धब्बा और परिवार का दर्द आज भी वैसा ही ताजा है। खेत के बगल से सबदलपुर स्टेशन जाने वाला कच्चा रास्ता, जो कभी गांव की चहल-पहल का गवाह था, आज सुनसान पड़ा है। डर के मारे अब गांव वाले उस रास्ते से गुजरने से कतराते हैं। 200 लोगों के बीच मनखुश को अगवा किया गया, लेकिन कोई गवाही को तैयार नहीं चौंकाने वाली बात यह है कि सरेशाम, गांव के बीचो-बीच बने खेल मैदान से 100-200 लोगों की मौजूदगी में मनखुश को अगवा कर लिया गया, लेकिन गांव का कोई भी व्यक्ति मुंह खोलने को तैयार नहीं है। डर और खौफ की ऐसी चादर तनी है कि लोग इस घटना का जिक्र आते ही चुप्पी साध लेते हैं।
मृतक के पिता श्याम दास यादव कहते हैं कि मेरी किसी से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। मैं गांव के लड़ाई-झगड़ों में पंचायती करता था, हो सकता है कि किसी को इसी बात की खुन्नस रही हो। लेकिन हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया। हम किसी निर्दोष का नाम शक के आधार पर नहीं दे सकते, क्योंकि निर्दोष फंस जाएगा और असली कातिल बच निकलेगा। लेकिन हमारे बेटे के हत्यारों को पकड़ने में सरकार और प्रशासन का पूरा तंत्र फेल हो चुका है। पिता श्याम दास कहते हैं कि अगर सरकार चाहती तो सीबीआई (CBI) जांच करवा सकती थी। अब तो पुलिस-प्रशासन भी शांत होकर बैठ गया है। पुलिस भले ही कातिल को न पकड़े, लेकिन उस हैवान को भगवान कभी माफ नहीं करेंगे। भगवान की अदालत में उसे सख्त से सख्त सजा मिलेगी। फॉरेंसिक रिपोर्ट और फिंगरप्रिंट का बहाना बनाकर मामले को लटका रहे पीड़ित पिता का आरोप है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन केवल फॉरेंसिक रिपोर्ट और फिंगरप्रिंट का बहाना बनाकर मामले को लटका रहे हैं। जब भी परिवार न्याय की गुहार लगाने थाने या वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाता है, तो उन्हें धैर्य रखने की सलाह देकर वापस भेज दिया जाता है। कभी कहते हैं कि फॉरेंसिक रिपोर्ट आने दीजिए, कभी सैंपल रिपोर्ट का बहाना बनाया जाता है। क्या एक साल में भी फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं आती‌ क्या साल भर से पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। उन्होंने पुलिस को कुछ वीडियो साक्ष्य और संदिग्धों के बारे में जानकारी भी मुहैया कराई थी, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों ने उन सबूतों को यह कहकर खारिज कर दिया कि वीडियो में बयान देने वाला व्यक्ति शराब के नशे में था। इस तरह की हिला-हवाली से यह साफ जाहिर होता है कि जांच को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है। तीन बेटियों के बाद एक ही बेटा था, उसे भी दरिंदों ने बेरहमी से मार डाला। अब जीने का क्या मकसद रह गया है, जब न्याय ही नहीं मिलना तो इस पुलिस-प्रशासन पर हम क्या भरोसा रखें। कानून अंधा हो चुका है और प्रशासन केवल झूठे आश्वासन दे रहा है। अगर हमें न्याय नहीं मिला, तो पूरा परिवार यहां से निकल जाएंगे या फिर सामूहिक रूप से आत्मदाह कर लेंगे। जब न्याय देने वाला कोई नहीं है, तो फिर इस समाज और गांव में रहने का क्या फायदा। बलिया की तत्कालीन डीएसपी साक्षी कुमारी ने गांव वालों से अपील की थी कि यदि किसी के पास कातिलों की थोड़ी भी जानकारी हो, तो वे गुप्त रूप से सूचना दें, उनका नाम उजागर नहीं किया जाएगा। लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई। मामले के जांच अधिकारी (IO) का कहना है कि पुलिस लगातार अनुसंधान कर रही है, 20 से ज्यादा संदिग्धों से पूछताछ की जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस सुराग नहीं मिला है। ‘हम तीन बहन हैं, एक भाई था। पिछले साल 28 अगस्त को ही मेरे भाई की हत्या हो गई थी। इस साल भाई नहीं है, अब हम तीनों बहन किसको राखी बांधेंगे। पहले जब तीनों बहन अपने भाई को राखी बांधती थी, तो कुछ गिफ्ट मिलता था, अब वो हक भी हत्यारे ने हम तीनों बहन से छीन लिया। मेरा भाई था, साल 2025 में 28 तारीख को आठवें महीने में बदमाशों ने मेरे बड़े भाई को मार दिया था। मैंने अपने हाथों से भाई को मुखाग्नि दी थी। इस बार हम राखी किसको बांधेंगे, बहुत याद आती है। एक साल बीत जाने के बाद भी पुलिस मेरे भाई के कातिल को तलाश नहीं पाई है।’ बेगूसराय के साहेबपुर कमाल के खरहट गांव की रहने वाली 15 साल की पूजा और 10 साल की सोनाक्षी कुमारी ने ये बातें दैनिक भास्कर से कही। पूजा और सोनाक्षी के इकलौते भाई 12 साल के अमृतांशु उर्फ मनसुख की पिछले साल अज्ञात अपराधियों ने प्राइवेट पार्ट काटकर हत्या कर दी थी। मनसुख की हत्या के एक साल बाद भी पुलिस किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है। केस की आईओ का कहना है कि अब तक हम लोगों ने 20 संदिग्धों से पूछताछ की, लेकिन कोई ठोस सुराग नहीं मिला। अब सिलसिलेवार तरीके से जानिए पूरा मामला अमृतांशु की तीसरी और सबसे बड़ी बहन अपने ननिहाल में थी। उसने फोन पर बातचीत में बताया कि आज देशभर में बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांध रही हैं, लेकिन मैं इतनी अभागी हूं कि भाई को राखी नहीं बांध पा रही हूं। अज्ञात अपराधियों ने मेरे भाई को हम तीनों बहनों से छीन लिया। मैं मायूस थी, इसलिए मैं अपने नानी के घर आ गई। वही, अमृतांशु के पिता श्याम दास ने बताया कि मेरी दो बेटियों के बाद साल 2013 में बेटे का जन्म हुआ तो परिवार में खुशी का माहौल था। भगवान से दिन-रात मन्नतें मांगने के बाद ये खुशी नसीब हुई थी। मेरी बड़ी बेटी ने अमृतांशु नाम रखा। सुबह से लेकर रात तक पूरे घर में अपनी तोतली बोली, हंसी और खिलखिलाहट से सबका दिल बहलाने वाले अमृतांशु को पूरा परिवार और गांव वाले प्यार से मनखुश बुलाने लगे। वो वाकई हर किसी का मन खुश कर देता था। मनखुश प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ता था। पढ़ाई में तेज, व्यवहार में नटखट और खेलकूद में सबसे आगे रहने वाले मनखुश से पूरे गांव को बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन किसी को क्या खबर थी कि मन्नतों से पाया गया यह चिराग इतनी बेरहमी से बुझा दिया जाएगा। पिछले साल 28 अगस्त को स्कूल से हंसता हुआ घर लौटा था मनखुश श्याम दास यादव बताते हैंं कि दोपहर लगभग 1 से 2 बजे के बीच मनखुश स्कूल से हंसता हुआ घर लौटा था। कपड़े बदले, खाना खाया, नहाया और थोड़ा आराम किया। शाम 4 बजे वह रोज की तरह पास के शालीग्रामी गांव में कोचिंग पढ़ने चला गया। शाम 6 बजे कोचिंग से लौटकर उसने अपना बैग घर में रखा और रोज की तरह गांव के ही खेल मैदान (फील्ड) में दोस्तों के साथ खेलने चला गया। उस समय मैदान में करीब एक-दो सौ लोग और बच्चे मौजूद थे। शाम करीब 7 बजे जब अचानक हल्की बारिश शुरू हुई, तो मैदान में मौजूद बच्चे अपने-अपने घर लौटने लगे। लेकिन मनखुश घर नहीं पहुंचा। देर शाम 7:30 बजे पिता श्याम दास यादव चौक पर से घर लौटे, तो मनखुश को न पाकर परिजनों की धड़कनें तेज हो गई। पति-पत्नी और बहनें बदहवास होकर मैदान की तरफ भागे। वहां मनखुश नहीं था। परिजनों ने पूरे गांव में चप्पा-चप्पा छान मारा, सबदलपुर स्टेशन, मल्हीपुर और आसपास के गांवों में खोजबीन की। मानसी में गणेश मेला लगा था, वहां तक गए कि शायद बच्चा किसी के साथ मेला देखने चला गया हो। नाते-रिश्तेदारों को फोन घुमाए गए, लेकिन मनखुश का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। रातभर पूरा परिवार जगकर मनखुश को तलाशता रहा। परिजनों ने उस रात पुलिस को सूचना नहीं दी। उनके मन में खौफ था कि अगर किसी ने फिरौती के लिए अपहरण किया होगा और पुलिस बीच में आई, तो बदमाश बच्चे को नुकसान न पहुंचा दें। वे रातभर फोन की घंटी बजने का इंतजार करते रहे कि अपहरणकर्ता जितने पैसे मांगेंगे, वे दे देंगे, बस उनका बेटा सलामत लौट आए। जब सुबह तक कोई फोन नहीं आया और न ही मनखुश का पता चला, तो सुबह 9 बजे बदहवास पिता साहेबपुर कमाल थाना पहुंचे और लिखित आवेदन दिया। पुलिस की टीम हरकत में आई, आसपास के गांवों में छानबीन और सीसीटीवी कैमरे खंगाले जाने लगे। लेकिन दोपहर होते-होते खरहट गांव पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गांव का ही एक व्यक्ति आया और मनखुश के चाचा को बुलाकर ले गया। घास के बीच पड़ी थी मनखुश की लाश, प्राइवेट पार्ट कटा हुआ था वहां खेत में जो नजारा था, उसने देखने वालों की रूह कंपा दी। घास के बीच मनखुश की विभत्स और खौफनाक लाश पड़ी हुई थी। कातिलों ने दरिंदगी और हैवानियत की सारी हदें पार कर दी थीं। मनखुश का गला रेता हुआ था, पेट पर धारदार हथियार से दो जगह गहरे वार किए गए थे और उसकी पैंट खोलकर गुप्तांग को भी काट दिया गया था।
12 साल के मासूम पर किस कदर का जुल्म ढहाया गया था, यह देखकर पूरी पुलिस टीम और गांव स्तब्ध रह गया। घटना के बाद गांव में हड़कंप मच गया। एसपी, डीएसपी, FSL की टीम और डॉग स्क्वॉड मौके पर पहुंचे। उस वक्त बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि बहुत जल्द हत्यारों को सलाखों के पीछे भेज दिया जाएगा। लेकिन आज घटना के इतने समय बाद भी पुलिस के हाथ पूरी तरह खाली हैं। जिस खेत में मनखुश की लाश मिली थी, वहां आज भी घास उगाई जा रही है। लेकिन उस खेत के पन्नों पर लिखा खून का धब्बा और परिवार का दर्द आज भी वैसा ही ताजा है। खेत के बगल से सबदलपुर स्टेशन जाने वाला कच्चा रास्ता, जो कभी गांव की चहल-पहल का गवाह था, आज सुनसान पड़ा है। डर के मारे अब गांव वाले उस रास्ते से गुजरने से कतराते हैं। 200 लोगों के बीच मनखुश को अगवा किया गया, लेकिन कोई गवाही को तैयार नहीं चौंकाने वाली बात यह है कि सरेशाम, गांव के बीचो-बीच बने खेल मैदान से 100-200 लोगों की मौजूदगी में मनखुश को अगवा कर लिया गया, लेकिन गांव का कोई भी व्यक्ति मुंह खोलने को तैयार नहीं है। डर और खौफ की ऐसी चादर तनी है कि लोग इस घटना का जिक्र आते ही चुप्पी साध लेते हैं।
मृतक के पिता श्याम दास यादव कहते हैं कि मेरी किसी से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। मैं गांव के लड़ाई-झगड़ों में पंचायती करता था, हो सकता है कि किसी को इसी बात की खुन्नस रही हो। लेकिन हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया। हम किसी निर्दोष का नाम शक के आधार पर नहीं दे सकते, क्योंकि निर्दोष फंस जाएगा और असली कातिल बच निकलेगा। लेकिन हमारे बेटे के हत्यारों को पकड़ने में सरकार और प्रशासन का पूरा तंत्र फेल हो चुका है। पिता श्याम दास कहते हैं कि अगर सरकार चाहती तो सीबीआई (CBI) जांच करवा सकती थी। अब तो पुलिस-प्रशासन भी शांत होकर बैठ गया है। पुलिस भले ही कातिल को न पकड़े, लेकिन उस हैवान को भगवान कभी माफ नहीं करेंगे। भगवान की अदालत में उसे सख्त से सख्त सजा मिलेगी। फॉरेंसिक रिपोर्ट और फिंगरप्रिंट का बहाना बनाकर मामले को लटका रहे पीड़ित पिता का आरोप है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन केवल फॉरेंसिक रिपोर्ट और फिंगरप्रिंट का बहाना बनाकर मामले को लटका रहे हैं। जब भी परिवार न्याय की गुहार लगाने थाने या वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाता है, तो उन्हें धैर्य रखने की सलाह देकर वापस भेज दिया जाता है। कभी कहते हैं कि फॉरेंसिक रिपोर्ट आने दीजिए, कभी सैंपल रिपोर्ट का बहाना बनाया जाता है। क्या एक साल में भी फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं आती‌ क्या साल भर से पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। उन्होंने पुलिस को कुछ वीडियो साक्ष्य और संदिग्धों के बारे में जानकारी भी मुहैया कराई थी, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों ने उन सबूतों को यह कहकर खारिज कर दिया कि वीडियो में बयान देने वाला व्यक्ति शराब के नशे में था। इस तरह की हिला-हवाली से यह साफ जाहिर होता है कि जांच को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है। तीन बेटियों के बाद एक ही बेटा था, उसे भी दरिंदों ने बेरहमी से मार डाला। अब जीने का क्या मकसद रह गया है, जब न्याय ही नहीं मिलना तो इस पुलिस-प्रशासन पर हम क्या भरोसा रखें। कानून अंधा हो चुका है और प्रशासन केवल झूठे आश्वासन दे रहा है। अगर हमें न्याय नहीं मिला, तो पूरा परिवार यहां से निकल जाएंगे या फिर सामूहिक रूप से आत्मदाह कर लेंगे। जब न्याय देने वाला कोई नहीं है, तो फिर इस समाज और गांव में रहने का क्या फायदा। बलिया की तत्कालीन डीएसपी साक्षी कुमारी ने गांव वालों से अपील की थी कि यदि किसी के पास कातिलों की थोड़ी भी जानकारी हो, तो वे गुप्त रूप से सूचना दें, उनका नाम उजागर नहीं किया जाएगा। लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई। मामले के जांच अधिकारी (IO) का कहना है कि पुलिस लगातार अनुसंधान कर रही है, 20 से ज्यादा संदिग्धों से पूछताछ की जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस सुराग नहीं मिला है।  

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