कुशीनगर में पडरौना राजघराने की 1503 एकड़ जमीन को सरकारी घोषित करने के एडीएम न्यायालय के आदेश के बाद दिवंगत रानी रेवती देवी एक बार फिर चर्चा में हैं। यह मामला करीब 48 साल पुराने सीलिंग विवाद से जुड़ा है। रानी रेवती देवी का निधन 27 मई 1984 को हो गया था, लेकिन मृत्यु से करीब डेढ़ महीने पहले उन्होंने अपनी चल-अचल संपत्ति को लेकर वसीयत तैयार की थी। उन्होंने अपनी संपत्तियों की देखरेख और अपने धार्मिक-सांस्कृतिक उद्देश्यों के लिए ट्रस्ट की व्यवस्था भी की थी। दैनिक भास्कर को मिली वसीयत की प्रति के अनुसार, रानी रेवती देवी ने पडरौना स्थित अपने राजभवन ‘आनंद भवन’ को सनातन धर्म, वेदों की विभिन्न शाखाओं की परंपरा के संरक्षण और संस्कृत भाषा की उच्च शिक्षा एवं शोध के लिए समर्पित करने की इच्छा जताई थी। वसीयत में गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के समय उसके बैंक खाते में पहली धनराशि जमा कराने का भी उल्लेख किया गया है। नेपाल में जन्मीं, पडरौना राजघराने में हुई शादी रानी रेवती देवी मूल रूप से नेपाल की निवासी थीं और सनातन धर्म से गहराई से जुड़ी थीं। उनका विवाह पडरौना राजघराने के राजा रवि प्रताप नारायण सिंह से हुआ था। वह बड़े दरबार के महाराजा बृज प्रताप नारायण सिंह के तीसरे पुत्र थे। शादी के करीब एक महीने बाद ही राजा रवि प्रताप नारायण सिंह की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। पति की मृत्यु के बाद राजपरिवार और संपत्तियों की जिम्मेदारियां रानी रेवती देवी के सामने आ गईं। परिवार में जमीन-जायदाद को लेकर विवाद बढ़ने के बीच उन्होंने संपत्तियों की देखरेख शुरू की। वसीयत में आनंद भवन को शोध पीठ बनाने की इच्छा रानी रेवती देवी ने 14 अप्रैल 1984 को अपनी संपूर्ण चल-अचल संपत्ति को लेकर वसीयत जारी की थी। इसमें उन्होंने जय भारत मणि आचार्य दीक्षित को अपनी संपत्तियों का एक्जीक्यूटर यानी कानूनी तौर पर अधिकृत व्यक्ति नियुक्त किया था। वसीयत के पैरा नौ में रानी ने पडरौना स्थित अपने निवास आनंद भवन को वेदों की विभिन्न शाखाओं की परंपरा को संरक्षित रखने, संस्कृत भाषा की उच्च शिक्षा और शोध के लिए शोध पीठ के रूप में स्थापित करने की इच्छा जताई थी। इसी पैरा में गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के समय उसके बैंक खाते में पहली धनराशि रानी की ओर से जमा किए जाने का भी उल्लेख है। इससे शिक्षा और संस्कृत के क्षेत्र में उनके योगदान और रुचि का पता चलता है। निधन के बाद भी ट्रस्ट की संपत्तियों की व्यवस्था जारी रही रानी रेवती देवी का निधन 27 मई 1984 को प्रयागराज के सिविल लाइंस स्थित एनके मुखर्जी रोड के उनके मूल निवास पर हुआ था। वसीयत के अनुसार नियुक्त एक्जीक्यूटर जय भारत मणि आचार्य दीक्षित ने भी अपनी मृत्यु से पहले 19 जुलाई 1988 को तत्कालीन एडमिनिस्ट्रेटिव जनरल को न्यास की सभी संपत्तियों की देखरेख की जिम्मेदारी सौंप दी थी। ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक, वर्ष 1988 से कुशीनगर के जिलाधिकारी रानी रेवती देवी की इन संपत्तियों के रिसीवर नियुक्त हैं। यानी ट्रस्ट की संपत्तियों की देखरेख प्रशासनिक रिसीवर व्यवस्था के तहत होती रही है। ट्रस्ट की जमीनों पर कब्जे का आरोप रानी रेवती देवी रवि प्रताप न्यास की देखरेख से जुड़े लोगों का आरोप है कि जिलाधिकारी के रिसीवर होने के बावजूद ट्रस्ट की ज्यादातर जमीनों पर भू-माफिया का कब्जा रहा है। ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने इसके लिए लंबे समय से यहां तैनात चकबंदी और राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों-अधिकारियों के साथ राजपरिवार के कुछ लोगों की कथित भूमिका को जिम्मेदार बताया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ट्रस्ट से जुड़े लोगों का कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया में उलझी फाइलों का फायदा उठाकर जमीनों की खरीद-फरोख्त और कब्जे का सिलसिला चलता रहा। डीएम समेत 195 लोगों के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना वाद ट्रस्ट की ओर से दावा किया गया कि रिसीवरशिप वाली जमीनों की कथित अवैध खरीद-फरोख्त की जानकारी मिलने के बाद हाईकोर्ट में अवमानना वाद दाखिल किया गया। इसमें जिलाधिकारी समेत कुल 195 लोगों को पक्ष बनाया गया है। ट्रस्ट से जुड़े लोगों का कहना है कि मुकदमे के जरिए रिसीवरशिप वाली जमीनों की स्थिति और कथित अवैध लेन-देन को न्यायालय के सामने रखा गया है। 48 साल पुराने सीलिंग विवाद के फैसले से फिर चर्चा में आईं रानी अब 14 अगस्त को करीब 48 साल पुराने सीलिंग विवाद के निस्तारण और 1503 एकड़ जमीन को सरकारी घोषित किए जाने के एडीएम न्यायालय के आदेश के बाद रानी रेवती देवी का नाम फिर चर्चा में है। इस आदेश का असर उन जमीनों पर काबिज लोगों पर भी पड़ने की संभावना है, जिनका कब्जा या स्वामित्व किसी न किसी रूप में इन विवादित संपत्तियों से जुड़ा हुआ है। आदेश के बाद संबंधित पक्षों के बीच हलचल तेज हो गई है। फिलहाल इस पूरे मामले में एडीएम न्यायालय के आदेश, जमीनों के राजस्व रिकॉर्ड, ट्रस्ट की वसीयत और रिसीवरशिप से जुड़े दस्तावेज अहम होंगे। 48 साल पुराने विवाद के निस्तारण के बाद अब यह मामला न केवल पडरौना राजघराने की संपत्तियों, बल्कि रानी रेवती देवी की उस विरासत को भी सामने ला रहा है, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति को शिक्षा, संस्कृत और सनातन परंपरा के संरक्षण के लिए इस्तेमाल करने की इच्छा जताई थी।

