नेपाल बोला- हमारी बर्बादी के लिए दुनिया जिम्मेदार, कम्पेन्सेशन दो, बाढ़ को बताया बढ़ते खतरे का संकेत

नेपाल बोला- हमारी बर्बादी के लिए दुनिया जिम्मेदार, कम्पेन्सेशन दो, बाढ़ को बताया बढ़ते खतरे का संकेत

Nepal Flood Compensation: नेपाल ने 26 अगस्त की भीषण बाढ़ और हिमालयी तबाही को क्लाइमेट चेंज से बढ़ते खतरे से जोड़ते हुए दुनिया के सामने कम्पेन्सेशन का सवाल खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कहा कि हिमालय में बढ़ते तापमान के साथ ऐसे खतरों का जोखिम बढ़ रहा है और इसका बोझ सिर्फ नेपाल पर नहीं डाला जा सकता। रसुवा में भोटेकोशी नदी की तबाही को उन्होंने हिमालय में बढ़ते जलवायु खतरे का गंभीर संकेत बताया।

शाह ने कहा कि विशेषज्ञों के मुताबिक आपदा की शुरुआत हिमालय में बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटने से हुई। नेपाल अब इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने की तैयारी में है। बालेन शाह के न्यूयॉर्क जाकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्लाइमेट जस्टिस और कम्पेन्सेशन का मुद्दा उठाने की मांग जोर पकड़ रही है, हालांकि उनका दौरा अभी तय नहीं हुआ है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र 8 सितंबर से शुरू होगा।

मदद नहीं, अब न्याय और कम्पेन्सेशन

विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि नेपाल अब सिर्फ राहत और पुनर्वास के लिए मदद नहीं, बल्कि जलवायु नुकसान की जिम्मेदारी तय करने और कम्पेन्सेशन की मांग कर रहा है। उन्होंने भारत, अमरीका और चीन को बड़े उत्सर्जक देशों में गिनाते हुए कहा कि नेपाल जैसे प्रभावित देशों को जलवायु नुकसान का कम्पेन्सेशन मिलना चाहिए। नेपाल सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के लॉस एंड डैमेज फंड से भी आर्थिक मदद मांगी है। वहीं वित्त मंत्री के मुताबिक आपदा के बाद पुनर्निर्माण पर 4 से 5 अरब डॉलर तक खर्च आ सकता है।

1,127 मौतें, 4,858 अब भी लापता

नेपाल पुलिस के मुताबिक बुधवार तक आपदा में 1,127 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 4,858 लोग अब भी लापता हैं। 1,113 शवों का पोस्टमार्टम और कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन सिर्फ 95 शव परिजनों को सौंपे जा सके हैं। पुलिस ने 911 अज्ञात शवों की जानकारी ऑनलाइन डाली है। 7,912 पुलिसकर्मी राहत और तलाश अभियान में जुटे हैं और 6,541 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।

शव नहीं मिले तो पुतलों का अंतिम संस्कार

काठमांडू और नुवाकोट में कई परिवारों ने लापता परिजनों के शव नहीं मिलने पर पुतले बनाकर प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया। कई दिन तक अस्पतालों, मुर्दाघरों और प्रभावित इलाकों में तलाश के बाद भी जब अपनों का सुराग नहीं मिला तो परिवारों ने धार्मिक परंपरा के अनुसार अंतिम विदाई दी।

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