भास्कर न्यूज | खगड़िया जमीन खरीदी, दाखिल-खारिज के लिए ऑनलाइन आवेदन किया और मांगे गए दस्तावेज भी जमा किए, लेकिन कई सप्ताह बाद भी नामांतरण नहीं हुआ। किसी पक्षकार ने आपत्ति भी नहीं की, फिर भी अंचल अधिकारी ने खुद ऑब्जेक्शन लगाकर मामला रोक दिया। सोमवार को जनसुनवाई में यह शिकायत अपर समाहर्ता पुष्पेश कुमार तक पहुंची तो उन्होंने संबंधित वाद की स्थिति खंगाली। पता चला कि राजस्व कर्मचारी 30 सितंबर को ही स्वीकृति का प्रस्ताव भेज चुके थे, लेकिन सीओ के स्तर पर मामला लंबित था। इस पर अपर समाहर्ता ने फोन कर जवाब मांगा और दोबारा ऐसी शिकायत मिलने पर अनुशासनिक कार्रवाई की चेतावनी दी। मामला बेलदौर प्रखंड की जोरावरपुर पंचायत के पचाठ गांव निवासी अरुण यादव का है। उन्होंने जुलाई में जमीन के दाखिल-खारिज के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था। जनसुनवाई में बताया कि पहले सीओ ने वंशावली और अन्य पक्षकारों का सहमति पत्र मांगा। दस्तावेज जमा करने के बाद शपथ पत्र की मांग की जाने लगी, जबकि किसी पक्षकार ने नामांतरण पर आपत्ति नहीं जताई थी।
शिकायत पर अपर समाहर्ता ने मोबाइल से नामांतरण वाद की अद्यतन स्थिति की जानकारी ली। इसमें सामने आया कि 30 सितंबर को ही राजस्व कर्मचारी ने स्वीकृति का प्रस्ताव भेज दिया था। इसके बावजूद मामला लंबित था। इस पर उन्होंने सीओ से फोन पर पूछा, क्या आप आपत्ति पदाधिकारी हैं? उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी पक्षकार की आपत्ति नहीं है और कर्मचारी स्वीकृति की अनुशंसा कर चुके हैं तो सीओ स्वयं ऑब्जेक्शन लगाकर प्रक्रिया क्यों रोक रहे हैं? सभी पक्षकारों की सहमति के बावजूद शपथ पत्र मांगने का औचित्य भी पूछा। अपर समाहर्ता ने कहा कि आवेदन की कमियों को नामांतरण वाद शुरू होने से पहले ही आवेदक को बताकर दूर कराया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान नई आपत्ति लगाकर मामला लंबित रखना उचित नहीं है। उन्होंने निर्धारित समय-सीमा में निष्पादन नहीं होने पर भी नाराजगी जताई। कहा कि सरकार की मंशा लोगों का काम आसान करना है, न कि उन्हें अनावश्यक परेशान करना। दोबारा ऐसी शिकायत मिलने पर अनुशासनिक कार्रवाई के लिए उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट भेजी जाएगी। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने दाखिल-खारिज में बिना ठोस आधार स्वतः आपत्ति दर्ज करने पर पहले ही सख्त निर्देश जारी किए हैं। बिहार भूमि दाखिल-खारिज अधिनियम, 2011 और बिहार भूमि दाखिल-खारिज (संशोधन) नियमावली, 2020 के तहत नामांतरण निष्पादन की समय-सीमा तय है। निर्देश के अनुसार, आम-खास सूचना जारी होने के 14 दिनों के भीतर कोई वैध आपत्ति नहीं आती है तो सीओ को अनावश्यक सुनवाई में मामला उलझाए बिना नियमानुसार आदेश पारित करना होगा। सरकारी खाता/खेसरा से संबंधित भूमि को छोड़कर अन्य मामलों में बिना ठोस आधार स्वतः आपत्ति दर्ज करना कदाचार की श्रेणी में आएगा। जनसुनवाई कार्यक्रम के दौरान जमीन विवाद से जुड़ी समस्याओं को लेकर कई लोगों ने अपर समाहर्ता को आवेदन सौंपे। अपर समाहर्ता ने सभी आवेदनों पर गंभीरता से सुनवाई करते हुए संबंधित मामलों में नियमानुसार कार्रवाई की और आवश्यक आदेश जारी किए। 14 दिन में आपत्ति नहीं तो सीओ को नियमानुसार आदेश पारित करना होगा Share with facebook भास्कर न्यूज | खगड़िया जमीन खरीदी, दाखिल-खारिज के लिए ऑनलाइन आवेदन किया और मांगे गए दस्तावेज भी जमा किए, लेकिन कई सप्ताह बाद भी नामांतरण नहीं हुआ। किसी पक्षकार ने आपत्ति भी नहीं की, फिर भी अंचल अधिकारी ने खुद ऑब्जेक्शन लगाकर मामला रोक दिया। सोमवार को जनसुनवाई में यह शिकायत अपर समाहर्ता पुष्पेश कुमार तक पहुंची तो उन्होंने संबंधित वाद की स्थिति खंगाली। पता चला कि राजस्व कर्मचारी 30 सितंबर को ही स्वीकृति का प्रस्ताव भेज चुके थे, लेकिन सीओ के स्तर पर मामला लंबित था। इस पर अपर समाहर्ता ने फोन कर जवाब मांगा और दोबारा ऐसी शिकायत मिलने पर अनुशासनिक कार्रवाई की चेतावनी दी। मामला बेलदौर प्रखंड की जोरावरपुर पंचायत के पचाठ गांव निवासी अरुण यादव का है। उन्होंने जुलाई में जमीन के दाखिल-खारिज के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था। जनसुनवाई में बताया कि पहले सीओ ने वंशावली और अन्य पक्षकारों का सहमति पत्र मांगा। दस्तावेज जमा करने के बाद शपथ पत्र की मांग की जाने लगी, जबकि किसी पक्षकार ने नामांतरण पर आपत्ति नहीं जताई थी।
शिकायत पर अपर समाहर्ता ने मोबाइल से नामांतरण वाद की अद्यतन स्थिति की जानकारी ली। इसमें सामने आया कि 30 सितंबर को ही राजस्व कर्मचारी ने स्वीकृति का प्रस्ताव भेज दिया था। इसके बावजूद मामला लंबित था। इस पर उन्होंने सीओ से फोन पर पूछा, क्या आप आपत्ति पदाधिकारी हैं? उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी पक्षकार की आपत्ति नहीं है और कर्मचारी स्वीकृति की अनुशंसा कर चुके हैं तो सीओ स्वयं ऑब्जेक्शन लगाकर प्रक्रिया क्यों रोक रहे हैं? सभी पक्षकारों की सहमति के बावजूद शपथ पत्र मांगने का औचित्य भी पूछा। अपर समाहर्ता ने कहा कि आवेदन की कमियों को नामांतरण वाद शुरू होने से पहले ही आवेदक को बताकर दूर कराया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान नई आपत्ति लगाकर मामला लंबित रखना उचित नहीं है। उन्होंने निर्धारित समय-सीमा में निष्पादन नहीं होने पर भी नाराजगी जताई। कहा कि सरकार की मंशा लोगों का काम आसान करना है, न कि उन्हें अनावश्यक परेशान करना। दोबारा ऐसी शिकायत मिलने पर अनुशासनिक कार्रवाई के लिए उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट भेजी जाएगी। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने दाखिल-खारिज में बिना ठोस आधार स्वतः आपत्ति दर्ज करने पर पहले ही सख्त निर्देश जारी किए हैं। बिहार भूमि दाखिल-खारिज अधिनियम, 2011 और बिहार भूमि दाखिल-खारिज (संशोधन) नियमावली, 2020 के तहत नामांतरण निष्पादन की समय-सीमा तय है। निर्देश के अनुसार, आम-खास सूचना जारी होने के 14 दिनों के भीतर कोई वैध आपत्ति नहीं आती है तो सीओ को अनावश्यक सुनवाई में मामला उलझाए बिना नियमानुसार आदेश पारित करना होगा। सरकारी खाता/खेसरा से संबंधित भूमि को छोड़कर अन्य मामलों में बिना ठोस आधार स्वतः आपत्ति दर्ज करना कदाचार की श्रेणी में आएगा। जनसुनवाई कार्यक्रम के दौरान जमीन विवाद से जुड़ी समस्याओं को लेकर कई लोगों ने अपर समाहर्ता को आवेदन सौंपे। अपर समाहर्ता ने सभी आवेदनों पर गंभीरता से सुनवाई करते हुए संबंधित मामलों में नियमानुसार कार्रवाई की और आवश्यक आदेश जारी किए। 14 दिन में आपत्ति नहीं तो सीओ को नियमानुसार आदेश पारित करना होगा Share with facebook

