पटना उच्च न्यायालय ने नालंदा जिला प्रशासन की ओर से बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 के तहत मनमाने तरीके से नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनने और प्रशासनिक अधिकारों के दुरुपयोग पर फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार की ओर से पारित उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके तहत 2 स्थानीय नागरिकों पर असामाजिक तत्व बताकर कठोर पाबंदियां थोप दी गई थीं। अदालत ने न केवल उस गैरकानूनी आदेश को निरस्त किया, बल्कि राज्य सरकार को दोनों पीड़ितों को एक-एक लाख रुपये मुआवजा और दस-दस हजार रुपए मुकदमा खर्च अदा करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी व्यवस्था दी है कि राज्य सरकार इस हर्जाने की राशि को दोषी अधिकारियों से नियमानुसार वसूल किया जाए। उच्च न्यायालय ने नालंदा के जिलाधिकारी के कामकाज के तौर-तरीकों पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जिलाधिकारी की ओर से पारित आदेश पूरी तरह से न्यायिक सोच के अभाव को दर्शाते हैं। पीठ ने पाया कि जिलाधिकारी के आदेशों का प्रारूप पूरी तरह ‘कट एंड पेस्ट’ जैसा है, जिसमें बिना किसी ठोस तथ्य, सामग्री या स्वतंत्र जांच के केवल घिसे-पिटे शब्दों को दोहरा दिया गया। पीड़ितों ने पिछले साल 9 सितंबर को याजिचा यादर की थी। इस साल 11 सितंबर को फैसला हुआ। जजमेंट को आज सार्वजनिक किया गया है। न्यायिक मस्तिष्क का घोर अभाव अदालत ने कहा कि पूर्व में भी इस तरह के आदेशों में न्यायिक मस्तिष्क का घोर अभाव देखने को मिला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीसीए जैसी कठोर कानून की धाराओं का इस्तेमाल किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए एक सामान्य प्रशासनिक औपचारिकता या मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। इस कठोर शक्ति के प्रयोग से पूर्व जिलाधिकारी का यह वैधानिक दायित्व बनता है कि वह वस्तुनिष्ठ सामग्री के आधार पर निष्पक्ष और तर्कसंगत संतुष्टि प्राप्त करे। बिना ठोस आधार के किसी व्यक्ति को असामाजिक तत्व घोषित कर देना कानून के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
पिछले साल कारण बताओ नोटिस दिया था नालंदा जिले के कतरीसराय थाना क्षेत्र अंतर्गत कटौना गांव निवासी शशि कुमार उर्फ फुकन और अजय सिंह पर बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 की धारा 3(3) के तहत कार्रवाई की गई थी। राजगीर के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी ने एक रिपोर्ट पेश की, जिसे पुलिस अधीक्षक ने आगे बढ़ाते हुए दोनों नागरिकों को ‘असामाजिक तत्व’ के रूप में चिह्नित करने की अनुशंसा की। प्रशासन का दावा था कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव और छठ पर्व के दौरान इन व्यक्तियों के स्वतंत्र रूप से घूमने से क्षेत्र की विधि-व्यवस्था एवं शांति भंग होने की आशंका है। इस अनुशंसा पर संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी ने सितंबर 2025 में कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में उनके स्पष्टीकरण को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए उन पर कठोर शर्तें लागू कर दीं। अदालत ने पाया कि यह पूरी कार्रवाई केवल अनुमानों, पूर्वाग्रहों और निराधार आशंकाओं पर आधारित थी।
24 महीने में 2 मामलों में चार्जशीट होना था अनिवार्य उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 के वैधानिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने रेखांकित किया कि कानून की धारा 2(b) और 2(f) के तहत किसी भी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ तभी माना जा सकता है जब कार्रवाई शुरू होने से ठीक पहले के 24 महीनों के भीतर उसके खिलाफ कम से कम दो मामलों में अदालत में पुलिस रिपोर्ट यानी चार्जशीट दायर की गई हो। इस मामले में जब रिकॉर्ड की जांच की गई, तो यह तथ्य सामने आया कि दो वर्षों की निर्धारित अवधि में दोनों के खिलाफ केवल एक ही मामले में चार्जशीट दाखिल हुई थी, जो कि खनन एवं पर्यावरण नियमों से संबंधित थी। इसके अलावा महज एक गोपनीय सनहा का सहारा लेकर पूरी प्रशासनिक मशीनरी ने दोनों को समाज के लिए खतरनाक करार दे दिया। अदालत ने हैरानी जताई कि जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, एसडीपीओ और थानाध्यक्ष सभी जिम्मेदार अधिकारियों ने कानून के स्पष्ट प्रावधानों को पढ़ने या समझने तक की जहमत नहीं उठाई और अपनी अज्ञानता का खुला प्रदर्शन किया। सप्ताह में 3 दिन हाजिरी लगाने का थोपा गया अमानवीय फरमान जिलाधिकारी के आदेश के अनुसार, इन दोनों नागरिकों को उनके नजदीकी थाने के बजाय लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित सिलाव थाने में सप्ताह में तीन दिन सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को हाजिरी लगाने का फरमान सुनाया गया था। साथ ही उन्हें थाना क्षेत्र की सीमा से बाहर जाने पर भी कड़े प्रतिबंधों में बांध दिया गया था। पीठ ने कहा कि इस अमानवीय आदेश ने उन दोनों को अपने घर, परिवार और आजीविका के साधनों से तीन महीनों तक पूरी तरह अलग-थलग रहने को विवश कर दिया। जब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के वकील से यह पूछा कि नजदीकी थाने के होते हुए 40 किलोमीटर दूर हाजिरी लगाने का आधार क्या था, तो सरकार की ओर से कोई भी तर्कसंगत जवाब नहीं दिया जा सका। अदालत ने कहा कि 1978 की नियमावली के नियम 6 के तहत भी व्यक्ति को उसके सबसे नजदीकी थाने में ही रिपोर्ट करने का निर्देश दिया जा सकता है, लेकिन प्रशासन ने नियमों को धता बताकर अपनी मनमर्जी चलाई। पटना उच्च न्यायालय ने नालंदा जिला प्रशासन की ओर से बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 के तहत मनमाने तरीके से नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनने और प्रशासनिक अधिकारों के दुरुपयोग पर फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार की ओर से पारित उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके तहत 2 स्थानीय नागरिकों पर असामाजिक तत्व बताकर कठोर पाबंदियां थोप दी गई थीं। अदालत ने न केवल उस गैरकानूनी आदेश को निरस्त किया, बल्कि राज्य सरकार को दोनों पीड़ितों को एक-एक लाख रुपये मुआवजा और दस-दस हजार रुपए मुकदमा खर्च अदा करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी व्यवस्था दी है कि राज्य सरकार इस हर्जाने की राशि को दोषी अधिकारियों से नियमानुसार वसूल किया जाए। उच्च न्यायालय ने नालंदा के जिलाधिकारी के कामकाज के तौर-तरीकों पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जिलाधिकारी की ओर से पारित आदेश पूरी तरह से न्यायिक सोच के अभाव को दर्शाते हैं। पीठ ने पाया कि जिलाधिकारी के आदेशों का प्रारूप पूरी तरह ‘कट एंड पेस्ट’ जैसा है, जिसमें बिना किसी ठोस तथ्य, सामग्री या स्वतंत्र जांच के केवल घिसे-पिटे शब्दों को दोहरा दिया गया। पीड़ितों ने पिछले साल 9 सितंबर को याजिचा यादर की थी। इस साल 11 सितंबर को फैसला हुआ। जजमेंट को आज सार्वजनिक किया गया है। न्यायिक मस्तिष्क का घोर अभाव अदालत ने कहा कि पूर्व में भी इस तरह के आदेशों में न्यायिक मस्तिष्क का घोर अभाव देखने को मिला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीसीए जैसी कठोर कानून की धाराओं का इस्तेमाल किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए एक सामान्य प्रशासनिक औपचारिकता या मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। इस कठोर शक्ति के प्रयोग से पूर्व जिलाधिकारी का यह वैधानिक दायित्व बनता है कि वह वस्तुनिष्ठ सामग्री के आधार पर निष्पक्ष और तर्कसंगत संतुष्टि प्राप्त करे। बिना ठोस आधार के किसी व्यक्ति को असामाजिक तत्व घोषित कर देना कानून के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
पिछले साल कारण बताओ नोटिस दिया था नालंदा जिले के कतरीसराय थाना क्षेत्र अंतर्गत कटौना गांव निवासी शशि कुमार उर्फ फुकन और अजय सिंह पर बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 की धारा 3(3) के तहत कार्रवाई की गई थी। राजगीर के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी ने एक रिपोर्ट पेश की, जिसे पुलिस अधीक्षक ने आगे बढ़ाते हुए दोनों नागरिकों को ‘असामाजिक तत्व’ के रूप में चिह्नित करने की अनुशंसा की। प्रशासन का दावा था कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव और छठ पर्व के दौरान इन व्यक्तियों के स्वतंत्र रूप से घूमने से क्षेत्र की विधि-व्यवस्था एवं शांति भंग होने की आशंका है। इस अनुशंसा पर संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी ने सितंबर 2025 में कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में उनके स्पष्टीकरण को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए उन पर कठोर शर्तें लागू कर दीं। अदालत ने पाया कि यह पूरी कार्रवाई केवल अनुमानों, पूर्वाग्रहों और निराधार आशंकाओं पर आधारित थी।
24 महीने में 2 मामलों में चार्जशीट होना था अनिवार्य उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 के वैधानिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने रेखांकित किया कि कानून की धारा 2(b) और 2(f) के तहत किसी भी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ तभी माना जा सकता है जब कार्रवाई शुरू होने से ठीक पहले के 24 महीनों के भीतर उसके खिलाफ कम से कम दो मामलों में अदालत में पुलिस रिपोर्ट यानी चार्जशीट दायर की गई हो। इस मामले में जब रिकॉर्ड की जांच की गई, तो यह तथ्य सामने आया कि दो वर्षों की निर्धारित अवधि में दोनों के खिलाफ केवल एक ही मामले में चार्जशीट दाखिल हुई थी, जो कि खनन एवं पर्यावरण नियमों से संबंधित थी। इसके अलावा महज एक गोपनीय सनहा का सहारा लेकर पूरी प्रशासनिक मशीनरी ने दोनों को समाज के लिए खतरनाक करार दे दिया। अदालत ने हैरानी जताई कि जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, एसडीपीओ और थानाध्यक्ष सभी जिम्मेदार अधिकारियों ने कानून के स्पष्ट प्रावधानों को पढ़ने या समझने तक की जहमत नहीं उठाई और अपनी अज्ञानता का खुला प्रदर्शन किया। सप्ताह में 3 दिन हाजिरी लगाने का थोपा गया अमानवीय फरमान जिलाधिकारी के आदेश के अनुसार, इन दोनों नागरिकों को उनके नजदीकी थाने के बजाय लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित सिलाव थाने में सप्ताह में तीन दिन सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को हाजिरी लगाने का फरमान सुनाया गया था। साथ ही उन्हें थाना क्षेत्र की सीमा से बाहर जाने पर भी कड़े प्रतिबंधों में बांध दिया गया था। पीठ ने कहा कि इस अमानवीय आदेश ने उन दोनों को अपने घर, परिवार और आजीविका के साधनों से तीन महीनों तक पूरी तरह अलग-थलग रहने को विवश कर दिया। जब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के वकील से यह पूछा कि नजदीकी थाने के होते हुए 40 किलोमीटर दूर हाजिरी लगाने का आधार क्या था, तो सरकार की ओर से कोई भी तर्कसंगत जवाब नहीं दिया जा सका। अदालत ने कहा कि 1978 की नियमावली के नियम 6 के तहत भी व्यक्ति को उसके सबसे नजदीकी थाने में ही रिपोर्ट करने का निर्देश दिया जा सकता है, लेकिन प्रशासन ने नियमों को धता बताकर अपनी मनमर्जी चलाई।

