नालंदा यूनिवर्सिटी में स्पेशल लेक्चर:सिंधु-सरस्वती से गंगा तक भारतीय सभ्यता के सातत्य पर मंथन, आईसीसीआर के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सेशन का आयोजन

नालंदा यूनिवर्सिटी में स्पेशल लेक्चर:सिंधु-सरस्वती से गंगा तक भारतीय सभ्यता के सातत्य पर मंथन, आईसीसीआर के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सेशन का आयोजन

ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के तत्वावधान में एक गरिमामयी विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अकादमिक सत्र का मुख्य विषय “सिंधु-सरस्वती सभ्यता से गंगा तक: भू-जलवायु परिवर्तन, पाठ्य परंपराएं और भारतीय सभ्यता का सातत्य” रहा। इस अंतरराष्ट्रीय विमर्श में पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन स्थित लिसोफोना विश्वविद्यालय के प्रख्यात शोधकर्ता एवं विद्वान प्रोफेसर जोस कार्लोस रिबेरो डी कैलाजन्स डुआर्टे ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। प्राचीन मुहरों और भाषाई संरचनाओं पर शोध, साक्ष्यों की व्याख्या पर बल प्रोफेसर डुआर्टे ने अपने संबोधन में प्राचीन मुहरों और ऐतिहासिक भाषाई संरचनाओं पर किए गए अपने गहन शोध के निष्कर्षों को साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की प्राचीनतम सभ्यताओं और उसकी आज तक चली आ रही ज्ञान परंपराओं के बीच एक अटूट व सुदृढ़ संबंध है। भू-जलवायु परिवर्तनों और साहित्यिक ग्रंथों के संदर्भों को जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि शोध का मूल उद्देश्य साक्ष्यों को प्रामाणिकता के साथ सामने रखना होना चाहिए, जिससे तथ्यों की विवेकपूर्ण, संतुलित और निष्पक्ष व्याख्या का दायरा हमेशा बना रहे। औपनिवेशिक सोच से मुक्ति और पारंपरिक ज्ञान के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत: कुलपति सत्र की अध्यक्षता कर रहे नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में हमें अपनी विरासत में मिले ज्ञान के ढांचों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा और अपनी सोच को वि-औपनिवेशिक करने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे। अपनी बौद्धिक परंपराओं को स्वतंत्र और मौलिक दृष्टिकोण से समझना समय की मांग है। इस अवसर पर कुलपति ने प्रोफेसर डुआर्टे को नालंदा विश्वविद्यालय में छह माह बिताने, विद्यार्थियों से संवाद करने और अपने शोध को आगे बढ़ाने का औपचारिक आमंत्रण भी दिया। आईसीसीआर की विशेष टिप्पणी और यजुर्वेद के संदर्भों के साथ सत्र का समापन कार्यक्रम में नई दिल्ली स्थित आईसीसीआर मुख्यालय के उप महानिदेशक राजेश रंजन ने विशेष टिप्पणी प्रस्तुत की और वैश्विक स्तर पर भारतीय सांस्कृतिक व बौद्धिक संपदा के आदान-प्रदान के महत्व को रेखांकित किया। व्याख्यान का विधिवत समापन डॉ. सौरव कुमार द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने यजुर्वेद के शांति व समन्वयकारी विचारों का उल्लेख करते हुए अतिथियों का आभार जताया। इस अकादमिक विमर्श में विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के तत्वावधान में एक गरिमामयी विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अकादमिक सत्र का मुख्य विषय “सिंधु-सरस्वती सभ्यता से गंगा तक: भू-जलवायु परिवर्तन, पाठ्य परंपराएं और भारतीय सभ्यता का सातत्य” रहा। इस अंतरराष्ट्रीय विमर्श में पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन स्थित लिसोफोना विश्वविद्यालय के प्रख्यात शोधकर्ता एवं विद्वान प्रोफेसर जोस कार्लोस रिबेरो डी कैलाजन्स डुआर्टे ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। प्राचीन मुहरों और भाषाई संरचनाओं पर शोध, साक्ष्यों की व्याख्या पर बल प्रोफेसर डुआर्टे ने अपने संबोधन में प्राचीन मुहरों और ऐतिहासिक भाषाई संरचनाओं पर किए गए अपने गहन शोध के निष्कर्षों को साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की प्राचीनतम सभ्यताओं और उसकी आज तक चली आ रही ज्ञान परंपराओं के बीच एक अटूट व सुदृढ़ संबंध है। भू-जलवायु परिवर्तनों और साहित्यिक ग्रंथों के संदर्भों को जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि शोध का मूल उद्देश्य साक्ष्यों को प्रामाणिकता के साथ सामने रखना होना चाहिए, जिससे तथ्यों की विवेकपूर्ण, संतुलित और निष्पक्ष व्याख्या का दायरा हमेशा बना रहे। औपनिवेशिक सोच से मुक्ति और पारंपरिक ज्ञान के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत: कुलपति सत्र की अध्यक्षता कर रहे नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में हमें अपनी विरासत में मिले ज्ञान के ढांचों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा और अपनी सोच को वि-औपनिवेशिक करने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे। अपनी बौद्धिक परंपराओं को स्वतंत्र और मौलिक दृष्टिकोण से समझना समय की मांग है। इस अवसर पर कुलपति ने प्रोफेसर डुआर्टे को नालंदा विश्वविद्यालय में छह माह बिताने, विद्यार्थियों से संवाद करने और अपने शोध को आगे बढ़ाने का औपचारिक आमंत्रण भी दिया। आईसीसीआर की विशेष टिप्पणी और यजुर्वेद के संदर्भों के साथ सत्र का समापन कार्यक्रम में नई दिल्ली स्थित आईसीसीआर मुख्यालय के उप महानिदेशक राजेश रंजन ने विशेष टिप्पणी प्रस्तुत की और वैश्विक स्तर पर भारतीय सांस्कृतिक व बौद्धिक संपदा के आदान-प्रदान के महत्व को रेखांकित किया। व्याख्यान का विधिवत समापन डॉ. सौरव कुमार द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने यजुर्वेद के शांति व समन्वयकारी विचारों का उल्लेख करते हुए अतिथियों का आभार जताया। इस अकादमिक विमर्श में विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।  

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