नालंदा में जन्माष्टमी, शुभ मुहूर्त पर प्री-प्लांड सिजेरियन का क्रेज:ज्योतिषाचार्यों से समय निकलवाकर ऑपरेशन थियेटर पहुंचे दंपती, सिजेरियन डिलीवरी में 50 फीसदी की बढ़ोतरी

नालंदा में जन्माष्टमी, शुभ मुहूर्त पर प्री-प्लांड सिजेरियन का क्रेज:ज्योतिषाचार्यों से समय निकलवाकर ऑपरेशन थियेटर पहुंचे दंपती, सिजेरियन डिलीवरी में 50 फीसदी की बढ़ोतरी

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर नालंदा जिले के मैटरनिटी अस्पतालों में आस्था और आधुनिक चिकित्सा का अनूठा तालमेल देखने को मिला। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर अपने घर ‘लड्डू गोपाल’ और ‘राधा’ के आगमन को लेकर दंपतियों में जबरदस्त उत्साह दिखा। आम दिनों की तुलना में शहर के प्रमुख निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में करीब 45 से 50 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया है। दर्जनभर से अधिक परिवारों ने पहले से ही जन्माष्टमी के शुभ मुहूर्त में प्रसव की तारीख और समय बुक करा रखा था। ‘डॉक्टर साहब, ठीक 12 बजे चीरा लगाइए’ शहर के निजी अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टरों को परिजनों की इस अनोखी जिद से जूझना पड़ रहा है। ममता मदर एंड चाइल्ड हॉस्पिटल की डॉ. ममता कौशाम्बी ने बताया कि सुबह दो सामान्य रूप से सिजेरियन हुए, जिनमें बेटियों ने जन्म लिया। वहीं, कुछ दंपतियों ने बाकायदा समय तय कराया है। एक मरीज ने तो जिद ठान ली कि भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था, इसलिए डिलीवरी ठीक 12:00 बजे ही हो। आधी रात को पूरी सर्जिकल टीम के साथ माइक्रो-सेकंड का तालमेल बिठाना चिकित्सकीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन मां और बच्चे की सुरक्षा जांचने के बाद ही हामी भरी गई। ‘निशीथ काल’ और रोहिणी नक्षत्र का आकर्षण प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य मोहन कुमार मिश्रा ने बताया कि जन्माष्टमी का पूजन ‘निशीथ व्यापिनी’ होता है, जो मध्य रात्रि का समय है। इस बार हर्षण योग और रोहिणी नक्षत्र के संयोग ने इस दिन को अत्यंत फलदायी बना दिया है। मिश्रा बताते हैं कि करीब 6 से 7 दंपतियों ने बच्चे के जन्म के सटीक शुभ मुहूर्त के लिए संपर्क किया था। मध्य रात्रि 12 बजे का समय विशेष मंगलकारी माना जाता है। इसी मान्यता के चलते कई माता-पिता ने डॉक्टरों से ठीक आधी रात को डिलीवरी कराने का आग्रह किया। आस्था बनाम मेडिकल रिस्क: डॉक्टरों की चेतावनी वरिष्ठ स्त्री रोग व शिशु रोग विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि केवल ‘मुहूर्त’ के फेर में गर्भकाल के 37 हफ्ते पूरे होने से पहले डिलीवरी कराना नवजात के लिए घातक हो सकता है। समय से पहले प्रसव से बच्चे के फेफड़े अविकसित रह सकते हैं और उसे एनआईसीयू की जरूरत पड़ सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि वे केवल उन्हीं मामलों में तय समय पर सर्जरी कर रहे हैं, जो ‘फुल टर्म’ प्रेगनेंसी हैं और जिनमें सिजेरियन पहले से अनिवार्य था। अस्पतालों में उत्सव का माहौल बढ़ती मांग के बीच मैटरनिटी विंग्स को पीले पर्दों, मोरपंख और बांसुरी के थीम पर सजाया गया। नवजातों को पीले वस्त्र पहनाए गए। नामकरण को लेकर भी परिजनों में आधुनिक ट्रेंड दिख रहा है; बालकों के लिए ‘कियान’, ‘ऋधान’, ‘देवर्ष’ और कन्याओं के लिए ‘राध्या’ व ‘नित्या’ जैसे नाम चुने जा रहे हैं। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर नालंदा जिले के मैटरनिटी अस्पतालों में आस्था और आधुनिक चिकित्सा का अनूठा तालमेल देखने को मिला। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर अपने घर ‘लड्डू गोपाल’ और ‘राधा’ के आगमन को लेकर दंपतियों में जबरदस्त उत्साह दिखा। आम दिनों की तुलना में शहर के प्रमुख निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में करीब 45 से 50 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया है। दर्जनभर से अधिक परिवारों ने पहले से ही जन्माष्टमी के शुभ मुहूर्त में प्रसव की तारीख और समय बुक करा रखा था। ‘डॉक्टर साहब, ठीक 12 बजे चीरा लगाइए’ शहर के निजी अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टरों को परिजनों की इस अनोखी जिद से जूझना पड़ रहा है। ममता मदर एंड चाइल्ड हॉस्पिटल की डॉ. ममता कौशाम्बी ने बताया कि सुबह दो सामान्य रूप से सिजेरियन हुए, जिनमें बेटियों ने जन्म लिया। वहीं, कुछ दंपतियों ने बाकायदा समय तय कराया है। एक मरीज ने तो जिद ठान ली कि भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था, इसलिए डिलीवरी ठीक 12:00 बजे ही हो। आधी रात को पूरी सर्जिकल टीम के साथ माइक्रो-सेकंड का तालमेल बिठाना चिकित्सकीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन मां और बच्चे की सुरक्षा जांचने के बाद ही हामी भरी गई। ‘निशीथ काल’ और रोहिणी नक्षत्र का आकर्षण प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य मोहन कुमार मिश्रा ने बताया कि जन्माष्टमी का पूजन ‘निशीथ व्यापिनी’ होता है, जो मध्य रात्रि का समय है। इस बार हर्षण योग और रोहिणी नक्षत्र के संयोग ने इस दिन को अत्यंत फलदायी बना दिया है। मिश्रा बताते हैं कि करीब 6 से 7 दंपतियों ने बच्चे के जन्म के सटीक शुभ मुहूर्त के लिए संपर्क किया था। मध्य रात्रि 12 बजे का समय विशेष मंगलकारी माना जाता है। इसी मान्यता के चलते कई माता-पिता ने डॉक्टरों से ठीक आधी रात को डिलीवरी कराने का आग्रह किया। आस्था बनाम मेडिकल रिस्क: डॉक्टरों की चेतावनी वरिष्ठ स्त्री रोग व शिशु रोग विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि केवल ‘मुहूर्त’ के फेर में गर्भकाल के 37 हफ्ते पूरे होने से पहले डिलीवरी कराना नवजात के लिए घातक हो सकता है। समय से पहले प्रसव से बच्चे के फेफड़े अविकसित रह सकते हैं और उसे एनआईसीयू की जरूरत पड़ सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि वे केवल उन्हीं मामलों में तय समय पर सर्जरी कर रहे हैं, जो ‘फुल टर्म’ प्रेगनेंसी हैं और जिनमें सिजेरियन पहले से अनिवार्य था। अस्पतालों में उत्सव का माहौल बढ़ती मांग के बीच मैटरनिटी विंग्स को पीले पर्दों, मोरपंख और बांसुरी के थीम पर सजाया गया। नवजातों को पीले वस्त्र पहनाए गए। नामकरण को लेकर भी परिजनों में आधुनिक ट्रेंड दिख रहा है; बालकों के लिए ‘कियान’, ‘ऋधान’, ‘देवर्ष’ और कन्याओं के लिए ‘राध्या’ व ‘नित्या’ जैसे नाम चुने जा रहे हैं।  

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