दिग्विजय बोले; सिंधिया-कमलनाथ के ईगो के कारण गिरी हमारी सरकार:’सिलावट को पीसीसी चीफ, गोविंद राजपूत को डिप्टी सीएम बनाना चाहते थे ज्योतिरादित्य’

दिग्विजय बोले; सिंधिया-कमलनाथ के ईगो के कारण गिरी हमारी सरकार:’सिलावट को पीसीसी चीफ, गोविंद राजपूत को डिप्टी सीएम बनाना चाहते थे ज्योतिरादित्य’

पूर्व मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने वर्ष 2020 में मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार गिरने के पीछे के असल कारणों से पर्दा उठाया है। उज्जैन से अयोध्या तक निकाली जा रही ‘शिवधाम से रामधाम सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ के दौरान दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के आपसी ‘ईगो’ (अहंकार) तथा अफसरशाही के टकराव के कारण गिरी। दिग्विजय सिंह के अनुसार, 2018 में सरकार बनने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। बाद में जब कमलनाथ ने उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) का अध्यक्ष बनने का विकल्प दिया, तो सिंधिया ने इसे ठुकरा दिया। सिंधिया चाहते थे कि उनके समर्थक तुलसी सिलावट को पीसीसी चीफ और गोविंद सिंह राजपूत को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए। कमलनाथ इसके लिए तैयार नहीं हुए। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच तनाव बढ़ता गया। लुटियंस दिल्ली में 23 सफदरजंग रोड का सरकारी बंगला रिटेन करने की कोशिश और ग्वालियर-चंबल संभाग में कलेक्टर-एसपी के तबादलों को लेकर खींचतान ने आग में घी का काम किया, जिसके चलते आखिरकार कांग्रेस सरकार गिर गई। पढ़िए दिग्विजय सिंह से बातचीत के प्रमुख अंश- भास्कर: आपने अपनी इस यात्रा का नाम ही ‘सनातन’ रख दिया है, जबकि सनातन का पेटेंट तो आज भाजपा ले चुकी है? दिग्विजय: नाम ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ है। भाजपा का सनातन से कोई लेना-देना नहीं है। सनातन हजारों साल पुराना है, जबकि आरएसएस और वीएचपी तो कल की पैदाइश हैं। इन्होंने ‘सनातन’ और ‘सत्य सनातन’ नाम से सोशल मीडिया हैंडल रजिस्टर्ड करा रखे हैं, जिन पर फॉलोअर्स नगण्य हैं। ये केवल प्रचार करते हैं, जबकि इनके कर्म सनातन के मूल विचारों के विपरीत हैं। भास्कर: आप ‘जेन-ज़ी’ (Gen Z), युवाओं और जंतर-मंतर के आंदोलनों से खुद को कैसे जोड़ते हैं? दिग्विजय: इंसान उतना ही जवान होता है, जितना वह महसूस करता है। मैं 11 से 30 साल के युवाओं से निरंतर संवाद रखता हूं। मेरे पिता कहते थे कि बेटा जब 16 का हो जाए, तो उससे छोटे दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। जब अभिजीत दिपके ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का विचार रखा और कुछ ही घंटों में लाखों फॉलोअर्स जोड़ लिए, तो मुझे लगा कि यही युवाओं की ताकत है जो भाजपा की नफरत की राजनीति को हरा सकती है। भास्कर: भाजपा से आपका यह सीधा टकराव किस बात को लेकर है? दिग्विजय: मेरी लड़ाई व्यक्तियों से नहीं, भाजपा की विभाजनकारी विचारधारा से है। वे देश के सांप्रदायिक सौहार्द, संविधान और ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को खत्म कर रहे हैं। सनातन का मूल आधार है—’धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो।’ संघ इसका ठीक उल्टा करता है। जब मैं यह कहता हूं तो वे मुझे हिंदू-विरोधी या मुसलमान कह देते हैं। ‘हिंदू’ शब्द तो फारसी से आया है, हमारा मूल धर्म सनातन है। मैंने गीता (तिलक और गांधी जी दोनों के भाष्य), कुरान के दो तर्जुमे, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहिब पढ़े हैं; सबका सार सिर्फ इंसानियत है। भास्कर: खेल और इंजीनियरिंग से राजनीति में आपका पदार्पण कैसे हुआ? दिग्विजय: मेरी रुचि कभी राजनीति में नहीं थी। बोर्डिंग स्कूल डेली कॉलेज और फिर जीएसआईटीएस से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की। हमेशा प्रथम श्रेणी में पास हुआ। क्रिकेट (विकेटकीपर/ओपनर), फुटबॉल (डिफेंडर), हॉकी (सेंटर फॉरवर्ड) और स्क्वैश का चार-पांच साल सेंट्रल जोन चैंपियन रहा। इलिनोइ यूनिवर्सिटी (अमेरिका) से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में मास्टर्स का बुलावा आ गया था, लेकिन 1967 में पिताजी के निधन के बाद मां के कहने पर मुझे राघोगढ़ रुकना पड़ा। 1969 में राघोगढ़ नगरपालिका चुनाव में 3 कांग्रेस, 3 जनसंघ और 2 मजदूर पार्टी के जीते। गतिरोध के बीच सबने कहा कि ‘यह बाहर से पढ़ा राजा आया है, इसे बना दो।’ और मैं निर्विरोध अध्यक्ष बन गया। भास्कर: सिंधिया राजघराने और आपके परिवार की पुरानी रंजिश कैसे खत्म हुई? दिग्विजय: 18वीं सदी में दौलतराव सिंधिया की अंग्रेजों से संधि के बाद सात-आठ पीढ़ियों तक हमारा टकराव चला। आजादी के बाद 1952 में जब मेरे पिता निर्दलीय विधायक बने और जीवाजीराव महाराज मध्य भारत के राजप्रमुख थे, तो जीवाजीराव जी ने पिताजी को डिनर पर बुलाकर कहा, “राजपाट तो दोनों के चले गए, अब कड़वाहट छोड़कर मिला जाए।” वहां से मित्रता शुरू हुई। राजमाता विजयाराजे सिंधिया मुझे दूसरे बेटे की तरह मानती थीं। 1977 की भीषण कांग्रेस विरोधी लहर में जब मैं राघोगढ़ से लड़ा, तो उन्होंने और माधवराव जी ने मेरे पूरे क्षेत्र में एक भी भाषण मेरे खिलाफ नहीं दिया। भास्कर: माधवराव सिंधिया को कांग्रेस में लाने वाले आप ही थे? दिग्विजय: हां, 1980 के चुनाव से पहले माधवराव जी जनता पार्टी से इस्तीफा देकर निर्दलीय थे। संजय गांधी जी ने मुझसे साफ कहा, “दिग्विजय, यदि तुम माधवराव को कांग्रेस में नहीं लाए, तो समझ लेना।” मैं अर्जुन सिंह जी की मदद से मुंबई गया, जहां सिंधिया जी ‘उगता सूरज’ चुनाव चिह्न के पोस्टर बनवा रहे थे। मैंने समझाया कि संघ की विचारधारा आपके स्वभाव के अनुकूल नहीं है और कांग्रेस में राजा-महाराजाओं की जगह है। वे तैयार हुए और संजय जी से मिलने के बाद दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली। भास्कर: अयोध्या मामले में आपने नरसिम्हा राव सरकार के दौरान कोई गुप्त मिशन भी किया था? दिग्विजय: 1994-95 में, जब मैं मुख्यमंत्री था, प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद राम जन्मभूमि विवाद को गैर-राजनीतिक बनाकर धर्माचार्यों को सौंपना चाहते थे। इसके लिए ‘रामालय ट्रस्ट’ बना। शंकराचार्यों के हस्ताक्षर जरूरी थे। राव साहब के आदेश पर मैं और उनके विशेष सचिव मिस्टर प्रसाद गुप्त रूप से सरकारी चार्टर विमान से रात को वाराणसी पहुंचे। नाव के जरिए स्वामी रामनरेशाचार्य जी के श्रीमठ पहुंचे और उन्हें साथ लेकर रात 11 बजे अपने दीक्षा गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी को जगाया। लंबी चर्चा के बाद स्वामी स्वरूपानंद जी को रामालय ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाना तय हुआ। राव साहब ने खुद दोनों संतों के चरण स्पर्श किए और 67 एकड़ अधिग्रहीत भूमि ट्रस्ट को सौंपने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन 1996 में सरकार जाने से वह काम अधूरा रह गया। भास्कर: नर्मदा परिक्रमा का संकल्प कैसे जागा और परिवार का इसमें क्या साथ रहा? दिग्विजय: 2001-02 में जब मैं मुख्यमंत्री था, मंडला सर्किट हाउस में भोर में तीन-चार बार मेरी नींद खुली और अंतर्मन में नर्मदा परिक्रमा का स्पष्ट संदेश गूंजा। मैंने गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी को बताया, तो उन्होंने पैदल परिक्रमा का आदेश दिया। राजनीतिक व्यस्तताओं के चलते यह 2017 में संभव हुआ। इस बीच मेरी पहली पत्नी आशा (आशु) जी, जिनसे 1969 में विवाह हुआ था और जिन्होंने चार बेटियों व जयवर्धन के लालन-पालन से लेकर घर की पूरी जिम्मेदारी संभालकर मुझे राजनीति की खुली छूट दी थी, 2013 में शांत हो गईं। उनके जाने के बाद अमृता जी मेरे जीवन में आईं। 2017 में जब मैंने परिक्रमा की, तो अमृता ने मेरे साथ पूरी नर्मदा परिक्रमा पैदल की; वे एक दिन भी गाड़ी में नहीं बैठीं। इस यात्रा का मूल विचार भी अमृता का ही था और मेरी पत्नी अमृता ने इस साधना में मेरा पूरा साथ निभाया। भास्कर: 2018 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के गिरने की असल वजह क्या थी? दिग्विजय: 2018 में 114 में से 90 से अधिक विधायक कमलनाथ जी के साथ थे और 20-22 ज्योतिरादित्य सिंधिया जी के साथ। सिंधिया जी मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन संख्याबल नहीं था। कमलनाथ जी ने उन्हें पीसीसी अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन वे नहीं माने। इसके अलावा, लोकसभा चुनाव हारने के बाद सिंधिया जी लुटियंस दिल्ली का अपना 23 सफदरजंग रोड वाला सरकारी बंगला मध्य प्रदेश कोटे से रीटेन कराना चाहते थे, पर कमलनाथ जी इसके लिए तैयार नहीं हुए। विवाद सुलझाने के लिए मैंने शोभना भरतिया जी के घर पर सुनील मित्तल की मौजूदगी में डिनर रखवाया। वहां बातचीत के दौरान कमलनाथ जी सिंधिया जी पर बिफर पड़े और बोले, “व्हाट डू यू थिंक ऑफ योरसेल्फ ज्योतिरादित्य? आई एम द चीफ मिनिस्टर!” जब मैंने बीच-बचाव किया तो कमलनाथ जी ने मुझे भी चुप करा दिया। बाद में ग्वालियर संभाग के तबादलों को लेकर मैंने और ज्योतिरादित्य जी ने मिलकर एक सहमति सूची बनाई और दोनों के दस्तखत कराकर कमलनाथ जी को दी। लेकिन डेढ़ महीने तक आदेश जारी नहीं हुए। जब मैंने कमलनाथ जी से पूछा तो उन्होंने कहा, “दिग्विजय, एम आई अ फूल? यदि तुम दोनों एक हो जाओगे तो मेरी क्या स्थिति रहेगी?” इसी आपसी अविश्वास और प्रशासनिक अहंकार की वजह से सरकार चली गई। भास्कर: आप पर सुपर सीएम होने और उस सरकार को रिमोट से चलाने का आरोप भी लगा था? दिग्विजय: यह पूरी तरह गलतफहमी थी। उस सरकार के एक मंत्री ने तो सार्वजनिक रूप से कहा था कि दिग्विजय सिंह माफिया चला रहे हैं। सच यह है कि कमलनाथ जी को मुख्यमंत्री बनाने में मेरी बड़ी भूमिका थी और मैं अपनी निष्ठा के प्रति हमेशा अडिग रहा। यदि किसी ने मुझ पर एक प्रतिशत भी उपकार किया हो, तो वह भले मेरा साथ छोड़ दे, मैं उसका साथ कभी नहीं छोड़ता। मैं कबीर के दोहे पर चलता हूं—’कबीरा खड़ा बाज़ार में, सबकी माँगे ख़ैर। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।’ भास्कर: आपके किले पर भगवा ध्वज रहता है, आप एकादशी-गुरुवार का व्रत रखते हैं, फिर भी हिंदू-विरोधी की छवि क्यों? दिग्विजय: इसमें मीडिया का बड़ा हाथ है। मैं नित्य आधा घंटा पूजा के बाद ही अन्न ग्रहण करता हूं। चारों धाम कर चुका हूं। जब मैं यूपी का प्रभारी था, तो गोरखनाथ मठ के तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ जी के सबके सामने पैर छूता था। आज भी योगी आदित्यनाथ मिलते हैं तो मैं उनके चरण स्पर्श करता हूं, क्योंकि यह सम्मान उस पवित्र नाथ पीठ का है। लेकिन मैं योगी आदित्यनाथ की राजनीति की निंदा करता हूं, क्योंकि वे गुरु गोरखनाथ के सर्वसमावेशी आदर्शों के खिलाफ काम करते हैं। गोरखनाथ मठ के लिए ऐतिहासिक रूप से भूमि अवध के नवाब ने दी थी, क्योंकि तत्कालीन सूफी संत और मठ के महंत में गहरी मित्रता थी। भास्कर: आप जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलनों में जाने वाले थे, फिर क्यों रुके? दिग्विजय: जब संसद घेराव की तैयारी थी, मैंने कांग्रेस के युवा नेता सौरभ से बात कर सुबह 8 बजे जाने का तय किया था। लेकिन जयराम रमेश ने फोन पर साफ कहा, “व्हाट ब्लडी नॉनसेंस दिग्विजय, तुम्हें वहां जाने की कोई जरूरत नहीं है।” पार्टी के कहने पर मैं उस दिन रुका, लेकिन अब मैं निश्चित रूप से युवाओं के बीच जाऊंगा। सोशल मीडिया पर ध्रुव राठी जैसे स्वतंत्र आवाजों को मैं 2011 से समर्थन दे रहा हूं, जिनका एक वीडियो आधे घंटे में 10 लाख लोग देख लेते हैं। आज की राजनीति की चाबी इसी ‘जेन-ज़ी’ पीढ़ी के पास है। भास्कर: ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ (उज्जैन से अयोध्या) का वास्तविक मकसद क्या है? दिग्विजय: यह लगभग 950 से 1000 किलोमीटर की पदयात्रा है। हम राष्ट्रपति महोदया के नाम एक डिजिटल याचिका जारी कर रहे हैं। हमारे सीधे सवाल हैं—क्या राजनीति में धर्म का हथियार की तरह इस्तेमाल सही है? क्या वोट चोरी और धार्मिक स्थलों के नाम पर चंदा वसूली की लूट पर निष्पक्ष जांच और सजा नहीं होनी चाहिए? यह यात्रा सनातन धर्म के मूल नैतिक मूल्यों और संविधान की रक्षा का खुला शंखनाद है। अब कमलनाथ और सिंधिया के बीच मतभेदों की शुरुआत से लेकर सरकार गिरने तक की पूरी कहानी पढ़िए…. दिग्विजय सिंह कहते हैं कि…. 2018 में हमारी सरकार बनी। मैं सिंधिया जी को समझाता था कि आपके साथ विधायक नहीं जाएंगे। कमलनाथ जी को ही मुख्यमंत्री बनाना है। लेकिन इनकी अपनी महत्वाकांक्षा थी। ये कहते थे, “राजा, मुझे मुख्यमंत्री बनाओ। आई एम द फ्यूचर।” मैंने कहा, “ठीक है।” वे मेरी बड़ी इज्जत करते थे। मैंने कहा, “चलो भाई, देखते हैं।” हमारे 114 विधायक जीतकर आए थे। इनमें से 90 से ज्यादा कमलनाथ जी के साथ थे, जबकि इनके साथ 20-22 विधायक थे। कमलनाथ जी ने इन्हें प्रस्ताव दिया कि आप पीसीसी अध्यक्ष बन जाइए और आपके किसी साथी को उपमुख्यमंत्री बना देंगे। लेकिन ये तैयार नहीं हुए। इन्होंने कहा, “नहीं, तुलसी सिलावट को पीसीसी अध्यक्ष बना दो और गोविंद सिंह राजपूत या किसी और को उपमुख्यमंत्री बना दो।” कमलनाथ जी ने कहा, “ये दोनों पद तो मैं नहीं दूंगा। आप पीसीसी अध्यक्ष बन जाइए और आपके साथ किसी को उपमुख्यमंत्री बना लेंगे।” लेकिन ये तैयार नहीं हुए। खैर, दोनों के बीच तनातनी चलती रही। दोनों अहंकारी थे। शोभना भरतिया जी, जो हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़ी हैं, उनके पिता के.के. बिड़ला के जमाने से मेरे साथ अच्छे संबंध रहे हैं। वे मुझ पर बहुत मेहरबान थे। शोभना जी के माधवराव सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया, दोनों के साथ भी अच्छे पारिवारिक संबंध थे। मैं शोभना जी के पास गया और कहा, “शोभना जी, यह सरकार गिर जाएगी।” उन्होंने पूछा, “क्यों दिग्विजय जी, क्या हो गया?” मैंने कहा, “कमलनाथ जी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की आपस में नहीं पट रही है। आप एक काम कीजिए, ज्योतिरादित्य जी को बुला लीजिए और मुझे भी बुला लीजिए। उनसे पूछिए कि मुझसे उन्हें क्या शिकायत है?” उन्होंने दोनों को बुला लिया। मैंने ज्योतिरादित्य जी से पूछा, “महाराज, मुझे बताइए, मुझसे क्या शिकायत है?” मैं उन्हें आज भी महाराज ही कहता हूं। उन्होंने कहा, “आपसे कोई शिकायत नहीं है।” मैंने पूछा, “फिर?” उन्होंने कहा, “मुझे मुख्यमंत्री साहब से शिकायत है।” मैंने कहा, “ठीक है, शिकायत है तो क्या करें?” सरकारी बंगला खाली नहीं करना चाहते थे सिंधिया इसी बीच 2019 के लोकसभा चुनाव हो गए और ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार गए। उनका 23 सफदरजंग रोड वाला मकान माधवराव सिंधिया के जमाने से उनके पास था। दिल्ली के लुटियंस इलाके में सरकारी बंगला होना बहुत बड़ी ताकत है। दिनेश सिंह जी लंबे समय तक इंदिरा गांधी के साथ रहे थे। लेकिन जब जनता पार्टी बनी, तो उनके सामने शर्त रखी गई कि अगर वे जनता पार्टी में आ जाएंगे, तभी उन्हें मकान खाली करने से राहत मिलेगी और 1 त्यागराज मार्ग का बंगला मिल सकता है। वे जनता पार्टी में चले गए। के.सी. पंत साहब कांग्रेस से मंत्री रहे थे। 1977 में चुनाव हारने के बाद अपना मकान बचाए रखने के लिए वे भी जनता पार्टी में चले गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी चाहते थे कि उनका बंगला उनके पास बना रहे। कमलनाथ से बंगले के लिए की थी बात हर राज्य सरकार के पास दिल्ली में छह बंगलों का विकल्प होता है, जिनका इस्तेमाल अधिकारी या मंत्री जैसे लोग कर सकते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ जी से कहा कि छह में से एक बंगला, 23 सफदरजंग रोड वाला, उन्हें दे दिया जाए, ताकि वह मकान उनके पास बना रहे। लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्हें वह बंगला खाली करना था। चूंकि, कमलनाथ जी की पूरी पढ़ाई कलकत्ता में हुई थी। शोभना भरतिया की पढ़ाई भी कलकत्ता में हुई थी। कमलनाथ जी उन्हें पहले से जानते थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया से उनकी मुलाकात बाद में हुई थी। मैंने शोभना जी से कहा, “आप ऐसा कीजिए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ जी को अपने घर खाने पर बुला लीजिए।” उन्होंने कहा, “दिग्विजय जी, एक काम और करते हैं। एयरटेल वाले सुनील मित्तल को भी बुला लेते हैं, क्योंकि उनकी और कमलनाथ जी की अच्छी दोस्ती है।” मैंने कहा, “ठीक है।” डिनर तय हो गया। मैं समय पर पहले पहुंच गया। कमलनाथ जी मेरे बाद पहुंचे। उन्होंने मुझसे कहा, “दिग्विजय, मैं शोभना से अकेले में कुछ बात करना चाहता हूं। क्या आपको कोई आपत्ति है, अगर हम अलग से मिल लें?” मैंने कहा, “ठीक है, मुझे कोई समस्या नहीं है।” वे शोभना जी से मिलने चले गए। इसके बाद ज्योतिरादित्य जी आए। उन्होंने पूछा, “राजा साहब, कमलनाथ जी आ गए?” मैंने कहा, “हां, आ गए हैं। वे शोभना जी से बातचीत कर रहे हैं।” यह देखकर उन्हें थोड़ा अटपटा लगा। फिर मैंने कहा कि उन्हें बता दीजिए कि सिंधिया जी आ गए हैं। डिनर पर कमलनाथ और सिंधिया के बीच हुआ विवाद इसके बाद बातचीत शुरू हुई। वहां चर्चा चलती रही। किसी बात पर कमलनाथ जी न जाने किस मूड में थे। उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया से कहा, “व्हाट डू यू थिंक ऑफ योरसेल्फ, ज्योतिरादित्य सिंधिया? व्हाट डू यू मीन? आई एम द चीफ मिनिस्टर ऑफ द स्टेट।” मैंने कहा, “आप कर क्या रहे हैं? हम सबको मिलकर काम करना है। हमने आप सबको बनाया है।” कमलनाथ जी बोले, “नो-नो-नो, कीप क्वाइट, दिग्विजय।” बस, वहीं से बात बिगड़नी शुरू हो गई। उसके बाद विवाद आगे बढ़ता गया। ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर था विवाद इसके बाद हमने तय किया कि दोनों के बीच विवाद की असली वजह क्या है। मामला ट्रांसफर-पोस्टिंग का था। हमने कहा कि ग्वालियर संभाग में पदस्थापना को लेकर दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया आपस में तय कर लेंगे और सरकार आदेश जारी कर देगी। इसमें एसपी, कलेक्टर, कमिश्नर, डीआईजी और आईजी जैसे अधिकारियों की पदस्थापना शामिल थी। यही पूरा विवाद था। मैं और सिंधिया जी बैठे और अगले ही दिन सूची बना ली। हम दोनों ने उस पर हस्ताक्षर किए और मैंने सूची कमलनाथ जी के पास भेज दी। मुझे इन चीजों से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। सरकार में जो अधिकारी आएगा, वह सरकार की बात सुनेगा। सरकार नहीं होगी तो वही अधिकारी हमारी ऐसी-तैसी करेगा। मेरे लिए बुनियादी सिद्धांत स्पष्ट होना जरूरी है। खैर, मैंने सूची भेजकर कहा कि आदेश जारी कर दीजिए। एक सप्ताह, दो सप्ताह, एक महीना और फिर डेढ़ महीना बीत गया, लेकिन आदेश जारी नहीं हुए। सिंधिया जी बार-बार फोन करते रहे, लेकिन आदेश नहीं निकले। आखिर मैंने कमलनाथ जी से कहा, “भैया, कर क्या रहे हो? आदेश जारी कर दो यार। सूची पर हम दोनों के दस्तखत हैं।” कमलनाथ जी ने मुझसे कहा, “दिग्विजय, एम आई अ फूल?” मैंने पूछा, “व्हाट हैपन्ड?” उन्होंने कहा, “अगर तुम दोनों साथ आ गए, तो फिर मेरी क्या हैसियत रह जाएगी?” मैंने कहा, “आप नेता हैं, आप मुख्यमंत्री हैं।” लेकिन उन्होंने कहा, “नो-नो-नो-नो, आई वोंट डू इट।” इसके बाद वे सूची में कमियां निकालने लगे। कहने लगे कि इसमें यह गलती है, वह गलती है। कोई अधिकारी अच्छा नहीं है, कोई ठीक नहीं है। मैंने कहा, “छोड़ो यार, सरकार बचाओ।” लेकिन इसी में सरकार चली गई। समन्वय दिग्विजय सिंह की ताकत है। मैंने जीवनभर समन्वय के जरिए ही राजनीति की है। मैं कबीर का अनुयायी हूं। कबीर ने कहा है- “कबीरा खड़ा बाजार में, सबकी मांगे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।” ये खबर भी पढ़ें… दिग्विजय ने पूछा- संघ का आदमी खुदा हो गया क्या? पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला। बुधवार को भोपाल में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने आरोप लगाया कि देश के संवैधानिक और शैक्षणिक संस्थानों पर संघ से जुड़े लोगों को बैठाया जा रहा है।पूरी खबर पढ़ें

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