तेज आवाज पर कान बंद करता बच्चा:नई चीज देखते ही खाना छोड़ देती थी बच्ची; माता-पिता समझे जिद, निकले ऑटिज्म के संकेत

तेज आवाज पर कान बंद करता बच्चा:नई चीज देखते ही खाना छोड़ देती थी बच्ची; माता-पिता समझे जिद, निकले ऑटिज्म के संकेत

तेज आवाज सुनते ही बच्चा दोनों कान बंद कर लेता है। टीवी की आवाज थोड़ी बढ़ते ही परेशान होकर कमरे से बाहर जाने लगता है। माता-पिता इसे बच्चे का डर या ज्यादा संवेदनशील होना मानकर सोचते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ वह खुद ठीक हो जाएगा। इसी तरह कुछ बच्चे गिनी-चुनी चीजें ही खाते हैं और प्लेट में नई चीज देखते ही उसे छूने से मना कर देते हैं। परिवार इसे खाने का नखरा समझता है। कुछ बच्चों में खिलौनों को एक खास क्रम में लगाने, एक ही गतिविधि बार-बार दोहराने या नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया कम देने जैसे व्यवहार भी दिखाई देते हैं। इन्हें कई बार जिद, नखरा या बदमाशी मानकर रोकने की कोशिश की जाती है। लेकिन कुछ मामलों में ऐसे व्यवहार के पीछे संवेदी जरूरत, विकासात्मक अंतर या ऑटिज्म से जुड़े लक्षण हो सकते हैं। हर बच्चे में ऐसा व्यवहार ऑटिज्म का संकेत हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन यदि ऐसे बदलाव लगातार दिखाई दें और बच्चे के भाषा विकास, सामाजिक व्यवहार या रोजमर्रा की गतिविधियों पर असर पड़ रहा हो तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। केस-1 : मिक्सर की आवाज सुनते ही कान बंद कर लेता था कारोबारी के दो साल के बेटे आरव (नाम बदला हुआ) का व्यवहार घर में सामान्य था। वह खेलता था और अपनी पसंद के खिलौनों में व्यस्त रहता था। लेकिन जैसे ही किचन में मिक्सर चलता, वह तुरंत दोनों कानों पर हाथ रख लेता। कई बार रोते हुए मां के पास भागकर आता। प्रेशर कुकर की सीटी या अचानक तेज आवाज होने पर भी उसकी यही प्रतिक्रिया होती थी। टीवी की आवाज थोड़ी बढ़ते ही वह बेचैन होकर कमरे से बाहर जाने की कोशिश करता। शुरुआत में माता-पिता को लगा कि बच्चा तेज आवाज से डरता है। परिवार में भी यही कहा गया कि अभी छोटा है, धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी। लंबे समय तक परेशानी बनी रहने पर परिवार ने विशेषज्ञ से सलाह ली। जांच के बाद ऑटिज्म का पता चला। आरव पिछले छह महीने से थेरेपी ले रहा है और अब तेज आवाज को लेकर उसकी परेशानी पहले के मुकाबले कम हुई है। केस-2 : नई चीज प्लेट में आते ही खाने से मना कर देती थी आईटी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी की तीन साल की बेटी सिया (नाम बदला हुआ) खाने को लेकर बेहद चुनिंदा थी। वह घर में बनी कुछ गिनी-चुनी चीजें ही आसानी से खाती थी। एक दिन मां ने उसकी प्लेट में नई सब्जी रखी। सिया ने उसे खाने से तो मना किया ही, उसे छूने से भी इंकार कर दिया और प्लेट छोड़कर चली गई। माता-पिता कई बार उसे समझाकर एक निवाला खिलाने की कोशिश करते, लेकिन नई चीज मुंह में जाते ही वह उसे बाहर निकाल देती। कुछ खाद्य पदार्थों की गंध से भी वह परेशान हो जाती थी। परिवार इसे खाने का नखरा मानता रहा। विशेषज्ञ से सलाह लेने के बाद ऑटिज्म का पता चला। केस-3 : खिलौने अपनी जगह से हटते ही परेशान हो जाता था दो साल का कबीर कारों से खेलता था, लेकिन उसका खेलने का तरीका थोड़ा अलग था। वह सभी कारों को एक सीधी लाइन में लगाता और काफी देर तक उसी क्रम में देखता रहता। अगर कोई कार अपनी जगह से हट जाती तो वह तुरंत उसे वापस उसी स्थान पर रख देता। एक दिन मां ने खेलते समय कारों को दूसरी तरफ कर दिया। कबीर परेशान होकर रोने लगा और कारों को दोबारा उसी क्रम में लगाने लगा। मां को लगा कि बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए जिद कर रहा है। लेकिन ऐसे व्यवहार को केवल जिद मानकर रोकने के बजाय विशेषज्ञ से उसकी पूरी विकासात्मक स्थिति की जांच कराना जरूरी हो सकता है। व्यवहार बदलने से पहले उसका मतलब समझना जरूरी ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट और ऑटिज्म विशेषज्ञ डॉ. सुभाष गर्ग के मुताबिक माता-पिता अक्सर बच्चे के व्यवहार को देखकर सवाल करते हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। कई बार परिवार इसे जिद या अनुशासन की समस्या मान लेता है, जबकि उसके पीछे संवेदी या विकासात्मक जरूरत हो सकती है। बच्चा कान बंद कर रहा है तो संभव है कि उसे कोई आवाज असहज लग रही हो। किसी चीज को छूने से बच रहा है तो उसके पीछे बनावट या स्पर्श के प्रति संवेदनशीलता हो सकती है। इसी तरह बार-बार एक ही गतिविधि करने के पीछे भी अलग-अलग कारण हो सकते हैं। इसलिए बच्चे को डांटने या उसका व्यवहार जबरदस्ती बदलने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। इसी अनुभव से लिखी ‘द सेंसेरी चाइल्ड’ बच्चों के ऐसे व्यवहार को समझने और माता-पिता को आसान भाषा में जानकारी देने के उद्देश्य से डॉ. सुभाष गर्ग ने ‘द सेंसेरी चाइल्ड : ए प्रैक्टिकल गाइड टू अंडरस्टैंडिंग ऑटिज्म स्पेक्ट्रम बियॉन्ड बिहेवियर’ किताब लिखी है। 194 पेज की इस किताब में ऑटिज्म को केवल बच्चे के दिखाई देने वाले व्यवहार या लक्षणों तक सीमित रखने के बजाय उसके पीछे की संवेदी जरूरतों और व्यक्तिगत अनुभव को समझने पर जोर दिया गया है। किताब का उद्देश्य माता-पिता को यह समझाना है कि बच्चे के किसी व्यवहार को तुरंत जिद या नखरा मानने के बजाय उसके पीछे के कारण को समझने की कोशिश की जाए। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के पेरेंट्स को यह किताब निशुल्क उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है। डेढ़-दो साल के बाद इन बदलावों पर रखें नजर ऑटिज्म से जुड़े संकेत शुरुआती उम्र में दिखाई दे सकते हैं। कई बार माता-पिता बच्चे के देर से बोलने, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया कम देने या दूसरे बच्चों से कम घुलने-मिलने को लेकर कुछ समय और इंतजार करते रहते हैं। यदि भाषा, सामाजिक व्यवहार या प्रतिक्रिया में लगातार अंतर दिखाई दे रहा है तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। पेरेंट्स खुद को दोष देने के बजाय बच्चे को समझें बच्चे के व्यवहार में बदलाव दिखने पर माता-पिता के मन में कई सवाल आते हैं—क्या हमारी परवरिश में कमी है? क्या बच्चा खुद ठीक हो जाएगा? क्या वह सिर्फ जिद कर रहा है? विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे समय में माता-पिता को खुद को दोष देने के बजाय बच्चे के व्यवहार को समझने पर ध्यान देना चाहिए। यदि संकेत लगातार बने हुए हैं तो समय पर विशेषज्ञ की मदद लेना अधिक महत्वपूर्ण है। थेरेपी से बच्चे की जरूरत के मुताबिक मदद ऑटिज्म में हर बच्चे की जरूरत अलग हो सकती है। बच्चे की स्थिति के अनुसार ऑक्यूपेशनल थैरेपी, स्पीच थैरेपी, व्यवहार संबंधी सहायता और अन्य विकासात्मक हस्तक्षेप दिए जा सकते हैं। उद्देश्य बच्चे की संचार क्षमता, सामाजिक सहभागिता, रोजमर्रा के कौशल और संवेदी जरूरतों में मदद करना होता है। एकल परिवार को ऑटिज्म का कारण मानना सही नहीं एकल परिवार में बच्चों को दादा-दादी या अन्य रिश्तेदारों के साथ कम समय मिलने से सामाजिक बातचीत और खेल के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि संयुक्त परिवार का टूटना या एकल परिवार में रहना ऑटिज्म का कारण है, ऐसा वैज्ञानिक रूप से स्थापित नहीं है। माता-पिता बच्चे के साथ बातचीत, खेल और रोजमर्रा की गतिविधियों में पर्याप्त समय दें। बच्चे को दूसरे बच्चों के साथ खेलने और सामाजिक गतिविधियों में शामिल होने के अवसर देना उसके विकास के लिए मददगार हो सकता है। मोबाइल-टैबलेट सीमित रखें, बातचीत और खेल बढ़ाएं छोटे बच्चों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम भाषा, सामाजिक बातचीत, नींद और सीखने जैसी गतिविधियों के लिए उपलब्ध समय को प्रभावित कर सकता है। इसलिए बच्चों को मोबाइल और टैबलेट का सीमित और उम्र के अनुरूप उपयोग कराना बेहतर है। माता-पिता बच्चों के साथ आमने-सामने बातचीत करें, खेलें, कहानी सुनाएं और उन्हें घर से बाहर खेलने तथा दूसरे बच्चों के साथ समय बिताने के अवसर दें। ये खबर भी पढ़ें… पिता की जॉब टीनएजर्स को बना रही एंग्जायटी का शिकार भोपाल के स्कूल जाने वाले किशोरों पर हुई एक रिसर्च ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। करीब 53% बच्चे किसी न किसी स्तर की चिंता (एंग्जायटी) से जूझ रहे हैं। यह बर्डन ऑफ एंग्जायटी अमंग स्कूल-गोइंग अडोलेसेंट्स इन अर्बन भोपाल: ए क्रॉस-सेक्शनल स्टडी क्यूरियस जर्नल ऑफ मेडिकल साइंस में प्रकाशित हुआ है।पूरी खबर पढ़ें

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