झीरम हमले में 10 आरोपी दोषी, 29 जानें गई थी:भूपेश बोले- NIA ने लीपापोती की, भाजपा बोली- कौन सी पर्ची लेकर घूमते थे बघेल

झीरम हमले में 10 आरोपी दोषी, 29 जानें गई थी:भूपेश बोले- NIA ने लीपापोती की, भाजपा बोली- कौन सी पर्ची लेकर घूमते थे बघेल

झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में 5 सितंबर को जगदलपुर की NIA कोर्ट ने सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया। 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई हुई थी, इनमें एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी। अभियोजन पक्ष ने 101 गवाहों के बयान और दस्तावेज पेश किए थे। 10 अगस्त को अंतिम बहस के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था। फैसले के बाद पूर्व CM भूपेश बघेल ने NIA पर लीपापोती का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बड़े नक्सली नेताओं और षड्यंत्र की जांच नहीं हुई, जबकि भाजपा षड्यंत्रकारियों को बचा रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण देव ने पलटवार करते हुए कहा कि फैसला NIA की सशक्त जांच और न्यायपालिका की निष्पक्षता का नतीजा है। उन्होंने बघेल से पूछा- “जेब में कौन-सी पर्ची लेकर घूमते थे?” 25 मई 2013 के हमले में दिग्गज कांग्रेस नेताओं समेत 29 लोगों की मौत हुई थी, इनमें 10 पुलिसकर्मी थे और 38 लोग घायल हुए थे। आरोपियों के वकील अरविंद चौधरी ने कहा कि वे फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और हाईकोर्ट जाएंगे। एक आरोपी के बेटे ने भी पिता को फंसाए जाने का दावा किया। NIA ने लीपापोती का काम किया- भूपेश पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। लेकिन एनआईए ने जिस प्रकार से जांच की, उसमें कोई बड़े नक्सली नेता नहीं थे। उनको बचाया गया, जबकि एफआईआर में उनके नाम थे। दूसरी बात, इसमें षड्यंत्रों की जांच नहीं की गई। तीसरी बात, इतनी जघन्य घटना घटी, किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। एनआईए ने लीपापोती का काम किया। इसलिए हमने एसआईटी का गठन किया। एनआईए ने उसे लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दी, जिसमें हमें हर जगह सफलता मिली। दुर्भाग्य की बात रही कि हमारी सरकार चली गई। झीरम हमला राजनीतिक षड्यंत्र और सुपारी किलिंग थी- बैज इस फैसले पर पीसीसी चीफ दीपक बैज ने कहा कि बस्तर जानता है कि कांग्रेस नेताओं और जवानों की हत्या राजनीतिक षड्यंत्र और सुपारी किलिंग थी। सत्ता हासिल करने के लिए हत्याएं कराई गई थीं। जिन 10 लोगों को आरोपी बनाया गया, वे बड़े नक्सली नहीं थे। हमले की प्लानिंग करने वाले बड़े नक्सली लीडरों पर कार्रवाई नहीं हुई। वहीं महेंद्र कर्मा की बेटी तूलिका कर्मा ने कहा कि अभी भाजपा की सरकार है। घटना के समय भी भाजपा की सरकार थी। एनआईए भी उन्हीं के इशारों पर चला। घटना के वक्त जो लोग मौजूद थे उन्हें ही पूछताछ के लिए बुलाया ही नहीं गया। न्याय के नाम पर खानापूर्ति कर दी गई। नंदकुमार पटेल के बेटे और विधायक उमेश पटेल ने कहा कि 10 आरोपियों को दोषी करार दिया गया है। कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। लेकिन षड्यंत्रों की जांच को लेकर मांग की गई थी। इसे लेकर आगे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। साजिश करने वाले खुलेआम घूम रहे- प्रत्यक्षदर्शी झीरम हमले के प्रत्यक्षदर्शी और आरडीए के पूर्व उपाध्यक्ष शिव सिंह ठाकुर ने कहा कि झीरम के पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हुआ है। हमले के पीछे कौन थे? उनका सच बाहर आना चाहिए। जिन्होंने साजिश की वो खुले आम घूम रहे हैं। बता दें कि शिव सिंह ठाकुर को हमले के दौरान पीठ पर गोली लगी थी। कांग्रेस महामंत्री ने कहा कि हमारी रैली को सुरक्षा नहीं दी गई। सुकमा में सभा को सुरक्षा नहीं दी गई। शुरू से इस पर संशय रहा है। हमे न्याय नहीं मिला, आगे कानून के एक्सपर्ट से बात करके कोर्ट जाएंगे। भाजपा के नेता नहीं चाहते कि सही तथ्य सामने आए। नेता प्रतिपक्ष डॉ चरणदास महंत ने कहा कि डीजीपी-एसपी तक को काफिले की खबर दी गई थी। फिर संवेदनशील रूट से सुरक्षा बल किसने हटाए..? काफिले से सुरक्षा हटाना महज लापरवाही नहीं, सुनियोजित साजिश थी। अब जानिए झीरम घाटी हमले के बारे में ? दरअसल, 2013 के आखिर में छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने थे। रमन सिंह मुख्यमंत्री थे। 10 साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जीत के लिए जोर लगा रही थी। पार्टी पूरे राज्य में परिवर्तन यात्रा शुरू करने वाली थी। 25 मई को सुकमा में परिवर्तन रैली की गई। रैली के बाद कांग्रेस नेताओं का काफिला सुकमा से जगदलपुर जा रहा था। इसमें करीब 25 गाड़ियां थीं। इन गाड़ियों में 200 नेता-कार्यकर्ता थे। सबसे आगे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कवासी लखमा थे। कांग्रेस की पूरी टॉप लीडरशिप एक काफिले में थी साथ ही उनके पीछे महेंद्र कर्मा और मलकीत सिंह गैदू की गाड़ी थी। उनके पीछे बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार चल रहे थे। यानी छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पूरी टॉप लीडरशिप इस काफिले में थी। दोपहर करीब 3:40 बजे काफिला झीरम घाटी में पहुंचा। यहीं नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता बंद कर दिया। गाड़ियां रुकते ही 200 से ज्यादा नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। हमले में नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की मौके पर ही मौत हो गई। करीब डेढ़ घंटे तक फायरिंग होती रही। महेंद्र कर्मा को नक्सलियों ने मारी थी 100 गोलियां शाम करीब 5:30 बजे नक्सली पहाड़ों से उतरकर नीचे आए और एक-एक गाड़ी चेक की। एक गाड़ी में उन्हें सलवा जुडूम आंदोलन शुरू करने वाले महेंद्र कर्मा मिल गए। आंदोलन की वजह से नक्सली महेंद्र कर्मा को दुश्मन समझते थे। उन्होंने बेरहमी से महेंद्र कर्मा की हत्या कर दी। उन्हें करीब 100 गोलियां मारी गईं। चश्मदीदों के मुताबिक, नक्सलियों ने कुछ नेताओं को नाम लेकर पहचाना और उन्हें गोली मारी। हमला पूरी योजना के साथ किया गया। नक्सलियों ने जगह का चुनाव, बम लगाने और भागने तक की पूरी तैयारी कर रखी थी। खुफिया एजेंसियों को हमले की कोई भनक नहीं थी। एनआईए ने 2013 में केस रजिस्टर्ड किया था एनआईए ने 2013 में केस रजिस्टर्ड किया, जिसका नंबर RC-06/2013/NIA/DLI है। 23 दिसंबर 2023 को एनआईए ने राष्ट्रीय अखबारों में ‘झीरम घाटी हत्याकांड एनआईए केस में वांछित’ शीर्षक से विज्ञापन जारी किया था। इसमें 19 आरोपी नक्सलियों के नाम, पते समेत तमाम जानकारी जारी की थी। इसमें पहला नाम नक्सली लीडर देवजी का था। इसके अलावा बारसे सुक्का ऊर्फ देवा का भी नाम उस सूची में था। एनआईए ने विज्ञापन में लिखा- इन माओवादी के संबंध में किसी भी प्रकार की सूचना देने या गिरफ्तार करवाने में सहयोग करने वाले को उचित इनाम दिया जाएगा। 2 जांच आयोग, NIA-SIT की जांच अलग नरसंहार में अब तक दो न्यायिक जांच आयोग बने हैं। 2013 में विशेष न्यायिक जांच आयोग जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में बना था। उसे सुरक्षा में चूक, एसओपी, रैली आयोजकों की भूमिका, पुलिस-बलों का समन्वय की जांच करना था। 2013 में ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए को इसकी जांच सौंप दी गई थी। 2018 में कांग्रेस सरकार आने पर एसआईटी बनी। इसमें कथित राजनीतिक षड्यंत्रों की जांच करने का दावा किया गया था। फिर 2021 में दूसरा न्यायिक जांच आयोग बना। इस आयोग की जिम्मेदारी जस्टिस सतीश अग्निहोत्री और जस्टिस गुलाम मिन्हाजुद्दीन को सौंपी गई थी। …………………… झीरम कांड से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… झीरम घाटी में 32 कत्ल, नक्सली हमला या सुपारी किलिंग:12 साल से जांच ही चल रही, पीड़ित बोले- असली कातिल अब भी बाहर ‘मेरा बेटा मनोज सुबह सोकर उठा था। तभी तीन लोग बुलाने आए। बोले, फूल लेने जगदलपुर चलना है। बेटे ने मुझसे कहा- जगदलपुर जा रहा हूं। बस यही उससे आखिरी बात थी। मैं आखिरी बार उसका चेहरा भी नहीं देख पाई। आज भी लगता है कि वो आएगा और कहेगा- मम्मी, जल्दी से खाना दे दो।’ पढ़ें पूरी खबर…

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