पानी से मौतें। बच्चों की दवाई से मौतें। इलाज के अभाव में मौतें। …और अब जहरीली शराब जिंदगियां लील गई। हर जांच, सख्ती, सुधार…और एक्शन के लिए यहां लाशें गिनी जाती हैं। क्यों? क्यों जिंदगी यहां इतनी सस्ती होती जा रही है। सरकार के पास हर घटना का अपना-अपना जवाब हो सकता है। शराब के लिए आबकारी जिम्मेदार है, बच्चों के लिए स्वास्थ्य विभाग, हत्या के लिए पुलिस और रिश्वत के लिए संबंधित कर्मचारी। जनता के लिए ये चार विभाग नहीं हैं, ये एक ही सरकार है। और सरकार से सवाल भी एक ही है…आखिर हो क्या रहा है? सागर में सिस्टम पहले क्यों एक्टिव नहीं हुआ? सबसे बड़ा सवाल सागर का है। जहरीली शराब लोगों तक पहुंचती रही और सिस्टम को भनक तक नहीं लगी। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जो रातोरात आसमान से गिर गई। इसे बनाया गया, पहुंचाया गया, बेचा गया और लोगों ने खरीदा। इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी निगरानी कहां थी? पुलिस क्या कर रही थी? आबकारी विभाग क्या कर रहा था? प्रशासन किसका इंतजार कर रहा था? जब मौतें हो गईं तब टीमें दौड़ पड़ीं, जांच शुरू हो गई, जिम्मेदारी तय करने की बात होने लगी। …लेकिन जब यह शराब बनाई और बेची जा रही थी, तब इसे रोकने वाला सिस्टम कहां था? अगर निगरानी मजबूत थी तो जहरीली शराब लोगों तक पहुंची कैसे? बालाघाट में मॉनिटरिंग क्यों नहीं हो सकी? बालाघाट की तस्वीर और ज्यादा बेचैन करती है। आदिवासी बच्चों की मौत को केवल बीमारी, कुपोषण या दूसरे चिकित्सकीय कारणों के आंकड़ों में समेट देना आसान है। सरकार रिपोर्ट दिखा सकती है, विभाग कारण बता सकता है, अधिकारी सफाई दे सकते हैं। एक मां-बाप के लिए बच्चा किसी रिपोर्ट का नंबर नहीं होता। सवाल यह है कि उसकी हालत बिगड़ने से पहले सरकारी तंत्र कहां था? जिस इलाके में बच्चों की सेहत पहले से कमजोर है, वहां निगरानी कितनी थी? स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी पहुंची थी? अगर सिस्टम इतना ही मजबूत था तो इतनी मौतों के बाद ही उसकी नींद क्यों खुली? गरीब और आदिवासी इलाकों में जिम्मेतारों की मौजूदगी सिर्फ योजनाओं के पोस्टर और आंकड़ों में क्यों दिखाई देती है? सरकार की असली ताकत तब दिखाई देती है जब घटना होने से पहले उसका सिस्टम खतरे को पकड़ ले। जहरीली शराब बिकने से पहले पकड़ में आए, बच्चे गंभीर होने से पहले स्वास्थ्य तंत्र की नजर में आएं। अपराधी वारदात करने से पहले कानून से डरें और पुलिसकर्मी-सरकारी अफसर रिश्वत लेने की सोचने से पहले अपनी नौकरी और कार्रवाई का डर महसूस करे…यही सुशासन है। समस्या यह नहीं है कि सरकार कार्रवाई नहीं कर रही। समस्या यह है कि सरकार की कार्रवाई बार-बार घटना के बाद क्यों दिखाई देती है? हादसा हो गया तो अफसर पहुंच गए। मौत हो गई तो जांच बैठ गई। यानी सिस्टम का अलार्म तभी बजता है जब नुकसान हो चुका होता है। इससे बड़ा सिस्टम फेल्योर क्या होगा? सरकार को यह समझना होगा कि जनता हर बार यह नहीं पूछेगी कि कितने लोगों को पकड़ा गया। वह धीरे-धीरे यह पूछना शुरू कर देगी कि जिन्हें पकड़ना पड़ा, उन्हें रोकने वाला सिस्टम कहां था? यही सवाल सरकार के लिए सबसे असहज है और होना भी चाहिए। मध्यप्रदेश में विकास की बड़ी बातें हो रही हैं। निवेश आ रहा है, सड़कें बन रही हैं, शहर बदल रहे हैं, योजनाओं के आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। यह सब जरूरी है। …लेकिन सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा किसी बड़े मंच पर नहीं होती। उसकी परीक्षा सागर के उस परिवार में होती है जिसने जहरीली शराब से अपना आदमी खोया है। उसकी परीक्षा बालाघाट के उस घर में होती है जहां बच्चे की मौत के बाद मां सवाल लेकर बैठी है। सागर में शराब, बालाघाट में बीमारी-कुपोषण, इंदौर में दूषित पानी, छिंदवाड़ा में जहरीला सिरप….इन घटनाओं को, त्रासदी को खबरों की तरह पढ़ना आसान है, लेकिन इन्हें एक साथ पढ़िए तो तस्वीर ज्यादा गंभीर दिखाई देती है। यह किसी एक विभाग की विफलता का सवाल नहीं रह जाता। यह शासन की संवेदनशीलता, निगरानी और जवाबदेही का सवाल बन जाता है। सरकार हर घटना को अपवाद बताकर आगे बढ़ सकती है, लेकिन जनता के बीच जमा हो रही बेचैनी को अपवाद नहीं कहा जा सकता। सरकार, अपराध हो जाना आपकी नाकामी नहीं है। लेकिन खतरे के संकेत दिखते रहें और आपका सिस्टम सोता रहे…यह जरूर आपकी नाकामी है।

