जमुई कांड: लापरवाही के जिम्मेदार 5 चेहरे:थानाध्यक्ष को 40 घंटे तक पता नहीं चला छेड़खानी हुई; पेट्रोलिंग इंचार्ज SI, बीट कांस्टेबल क्या कर रहे थे?

जमुई कांड: लापरवाही के जिम्मेदार 5 चेहरे:थानाध्यक्ष को 40 घंटे तक पता नहीं चला छेड़खानी हुई; पेट्रोलिंग इंचार्ज SI, बीट कांस्टेबल क्या कर रहे थे?

जमुई जिला मुख्यालय से करीब 15 KM दूर मड़वा पहाड़ है। 19 सितंबर की शाम 7 बजे यहां 14 साल की छात्रा के साथ बदसलूकी की गई। कुछ आरोपियों ने उसके साथ बैड टच किया और पूरी घटना का वीडियो बना लिया। हालांकि, घटना के दिन पुलिस को न तो इस वारदात की जानकारी मिल पाई और न ही वायरल वीडियो की भनक लगी। घटना के दो दिन बाद 21 सितंबर को पुलिस जागी और कार्रवाई शुरू हुई। घटना का वीडियो भी 19 सितंबर की रात करीब 9 बजे जमुई के लोकल सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपलोड होने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल है- जिला मुख्यालय से महज 15 किमी दूर इतनी बड़ी घटना हो गई और पुलिस इससे दो दिन तक अनजान कैसे रही? क्या पुलिस को जानकारी तभी मिलेगी, जब पीड़ित खुद थाने पहुंचेंगे? साइबर थाना उस समय क्या कर रहा था? क्या उसकी नजर क्राइम से ज्यादा सोशल मीडिया पर नेताओं की आलोचना करने वाले लोगों की ID पर रहती है? हालांकि, पुलिस ने जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई करते हुए पहले तीन नाबालिगों को पकड़ा। इसके अगले दिन दो मुख्य आरोपी नंदन और हरेराम को गिरफ्तार किया गया। वीडियो वायरल करने के आरोप में तीन अन्य आरोपियों पर भी कार्रवाई की गई, लेकिन सवाल सिर्फ गिरफ्तारी का नहीं है। पहले घटना से जुड़ी तस्वीरें देखिए… क्या इस पूरे मामले में पुलिस की लापरवाही सामने आई है? पुलिस की लोकल इंटेलिजेंस फेल कैसे हुई? साइबर सेल को 38 घंटे बाद भी वीडियो के बारे में क्यों नहीं पता चला? पढ़िए जमुई कांड में लापरवाही के जिम्मेदार चेहरे कौन हैं… फेस– 1. थानाध्यक्ष अमरेंद्र कुमार (SHO) जिम्मेदारी क्या थी: लोकल नेटवर्क से मामले का पता लगाना थानाध्यक्ष की जिम्मेदारी थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और अपराध की निगरानी के लिए पूरी पुलिस व्यवस्था को सक्रिय रखना है। संवेदनशील घटनाओं की जानकारी तुरंत लेना, शिकायत मिलने पर FIR दर्ज करना, गश्ती व्यवस्था की समीक्षा करना और गांवों से आने वाली जानकारियों पर तुरंत कार्रवाई करना उसकी पहली जिम्मेदारी है। नाबालिग से जुड़े अपराध के मामले में पीड़ित तक पुलिस की पहुंच, उसकी सुरक्षा और आरोपियों की पहचान भी बड़ी जिम्मेदारी है। थाना क्षेत्र में लगातार अपराध की आशंका वाले स्थानों और रास्तों की निगरानी के लिए पेट्रोलिंग की प्रभावी व्यवस्था भी SHO को सुनिश्चित करनी होती है। इस मामले में यह सवाल जरूरी है कि घटना के बाद करीब 40 घंटे तक थाना स्तर पर इसकी जानकारी क्यों नहीं पहुंची? क्या उपलब्ध पुलिस नेटवर्क ने घटना की कोई सूचना वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई थी? लापरवाही: 40 घंटे तक घटना पता ही नहीं चली घटना के बाद लंबे समय तक थाना स्तर पर जानकारी नहीं पहुंचना पुलिस की सूचना-प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। यह जांच जरूरी है कि SHO अमरेंद्र कुमार ने गश्ती, बीट व्यवस्था और गांव से मिलने वाली जानकारियों की नियमित समीक्षा की थी या नहीं? और घटना के बाद पुलिस ने खुद से संज्ञान क्यों नहीं लिया? 2. ड्यूटी पर तैनात SI धनंजय कुमार/पेट्रोलिंग अधिकारी जिम्मेदारी क्या थी: पेट्रोलिंग कर इलाके सुरक्षा सुनिश्चित करना पेट्रोलिंग पर तैनात SI धनंजय कुमार की मुख्य जिम्मेदारी अपने निर्धारित क्षेत्र में लगातार गश्त करना, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना और किसी घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचना है। उसे अपने क्षेत्र के सेंसेटिव प्लेस, सुनसान रास्तों, स्कूल-कॉलेज और आने-जाने वाले मेन रास्तों की जानकारी होनी चाहिए। पेट्रोलिंग के दौरान स्थानीय लोगों, दुकानदारों और अन्य सोर्स से क्षेत्र की स्थिति की जानकारी लेना भी पुलिसिंग का हिस्सा है। किसी अपराध की जानकारी मिलने पर SI को तुरंत थाना प्रभारी को अपडेट करना और जरूरत के अनुसार कार्रवाई शुरू करनी होती है। इस मामले में यह जांच का विषय है कि घटना वाले इलाके में पेट्रोलिंग किस समय और किस रास्ते पर थी? उस दौरान पुलिसकर्मी वहां से गुजरे या नहीं? क्या किसी स्थानीय व्यक्ति से घटना की जानकारी मिली? क्या 40 घंटे तक किसी से कोई संपर्क हुआ ही नहीं? लापरवाही कहां हुई: पेट्रोलिंग ही सवालों के घेरे में है अगर घटना पुलिस की निर्धारित पेट्रोलिंग सीमा में हुई और इसके बावजूद ड्यूटी पर मौजूद अधिकारी को इसकी जानकारी नहीं मिली, तो पेट्रोलिंग पर ही सवाल उठता है। जांच में पेट्रोलिंग लॉग, GPS लोकेशन, ड्यूटी चार्ट और उस समय की गतिविधियों का मिलान करना चाहिए क्या वो पेट्रोलिंग पर गए थे। 3. बीट कांस्टेबल जिम्मेदारी क्या थी: संदिग्ध स्थानों की जानकारी देना बीट कांस्टेबल पुलिस और गांव/मोहल्ले के बीच सबसे सीधा संपर्क होता है। उसकी जिम्मेदारी अपने बीट क्षेत्र के लोगों, विवादित परिवारों, संदिग्ध गतिविधियों और संवेदनशील स्थानों की जानकारी रखना है। उसे स्थानीय स्तर पर होने वाली छोटी-बड़ी घटनाओं की सूचना थाना प्रभारी तक पहुंचानी होती है। स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील रास्तों और स्थानों की जानकारी भी बीट पुलिसिंग का हिस्सा है। घटना जैसी स्थिति में बीट कांस्टेबल से अपेक्षा होती है कि वह स्थानीय लोगों से जानकारी लेकर घटना की पुष्टि करे। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों को समय पर सूचना दें। इस मामले में यह जांच जरूरी है कि संबंधित बीट कांस्टेबल को घटना की जानकारी कब मिली? उसने किन लोगों से संपर्क किया? क्या उसने घटना के बाद कोई स्थानीय सूचना थाना स्तर तक पहुंचाई थी? लापरवाही कहां हुई: थाने को बताया ही नहीं, ड्यूटी पर भी सवाल अगर बीट क्षेत्र में हुई गंभीर घटना की जानकारी बीट कांस्टेबल तक स्थानीय स्तर पर पहुंची थी, लेकिन उसने उसे थाना तक नहीं पहुंचाया, तो यह गंभीर चूक मानी जाएगी। और अगर उन्हें इस घटना की जानकारी ही नहीं मिल पाई तो ये और बड़ी लापरवाही है। जांच में उसके बीट रजिस्टर, स्थानीय संपर्क और घटना के बाद की गतिविधियों की पड़ताल जरूरी है। 4. गांव का चौकीदार जिम्मेदारी क्या थी: लोकल नेटवर्क से घटना पर अपडेट रहना गांव का चौकीदार पुलिस की लोकल इंफॉर्मेशन सिस्टम का जरूरी पार्ट होता है। उसका काम गांव में होने वाली असामान्य गतिविधियों, झगड़े, अपराध और सामाजिक तनाव की जानकारी पुलिस तक पहुंचाना है। वह ग्रामीणों के बीच मौजूद रहता है, इसलिए कई घटनाओं की शुरुआती जानकारी पुलिस तक पहुंचाने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। घटना के बाद अगर गांव में पीड़ित परिवार, आरोपी या प्रत्यक्षदर्शियों के बीच चर्चा हुई थी, तो चौकीदार से अपेक्षा होती है कि वह इसकी जानकारी संबंधित थाना या बीट पुलिस को दे। खासकर नाबालिग से जुड़ी गंभीर घटना में सूचना छिपाने की जगह तत्काल पुलिस तक पहुंचना जरूरी है। इसलिए जांच में यह देखा जाना चाहिए कि चौकीदार को घटना की जानकारी कब हुई? उसने किससे संपर्क किया? क्या उसने घटना की सूचना पुलिस को दी? लापरवाही कहां हुई: थाने में सूचना पहुंचाई ही नहीं यदि चौकीदार को घटना की जानकारी समय रहते मिल गई थी और उसने पुलिस को सूचित नहीं किया, तो स्थानीय सूचना तंत्र की बड़ी चूक मानी जाएगी। और अगर उसे भी घटना की जानकारी नहीं थी, तो सवाल यह है कि गांव की पुलिस-सूचना व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों थी? 5. साइबर DSP – अभिषेक कुमार जिम्मेदारी क्या थी: वायरल वीडियो को सबसे पहले टेकडाउन करवाना साइबर सेल की जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर सामने आने वाली गंभीर और आपराधिक सामग्री की निगरानी, पहचान और संबंधित थाने/वरिष्ठ अधिकारियों तक सूचना पहुंचाने में सहायता करना है। खासकर नाबालिग से जुड़े यौन अपराध का वीडियो वायरल होने पर पुलिस को तेजी से डिजिटल एविडेंस को सुरक्षित करना होता है। वीडियो के सोर्स की पहचान करने के साथ ही आरोपियों और पीड़ितों की पहचान भी करना होता है। टेक्निकल हेल्प करने और वीडियो के प्रसार को रोकने की कार्रवाई करने का काम साइबर सेल का होता है। इस मामले में पुलिस ने वायरल वीडियो के आधार पर आरोपियों की पहचान की और सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की। इसी वजह से जांच का एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वीडियो के बड़े स्तर पर प्रसारित होने से पहले या शुरुआती चरण में साइबर सेल को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? क्या कोई डिजिटल मॉनिटरिंग अलर्ट मौजूद था या नहीं? लापरवाही कहां हुई: वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित होने के बावजूद साइबर सेल को शुरुआती स्तर पर इसकी जानकारी नहीं मिलना डिजिटल मॉनिटरिंग की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है। हालांकि वायरल मैटर की हर पोस्ट खुद पुलिस तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं; इसलिए जांच में वास्तविक वायरलिटी और सेल की निगरानी व्यवस्था दोनों देखनी चाहिए। VIDEO VIRAL होने पर जानकारी मिली- SP जमुई एसपी विश्वजीत दयाल ने बताया कि 21 सितंबर को वायरल वीडियो के संज्ञान में आने के बाद पुलिस को मामले की जानकारी मिली। इसके बाद वायरल वीडियो के आधार पर पीड़िता की पहचान की गई। पीड़िता के बयान के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई। एसपी ने बताया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद SDPO जमुई के नेतृत्व में SIT का गठन किया गया। टीम लगातार सूचना जुटाने और संभावित ठिकानों पर छापेमारी कर रही थी। मामले में वीडियो में दिखाई दे रहे तीन नाबालिग को पहले पकड़ा गया। इसके बाद पीड़िता का वीडियो सोशल मीडिया और यूट्यूब समेत अन्य प्लेटफॉर्म पर वायरल करने वालों के खिलाफ अलग से कार्रवाई शुरू की गई। इस मामले में साइबर थाने में भी प्राथमिकी दर्ज की गई है। करीब 225 ID पर FIR किया गया है। इसके साथ ही मुख्य आरोपी नंदन और हरेराम को भी अरेस्ट कर लिया गया है। जमुई जिला मुख्यालय से करीब 15 KM दूर मड़वा पहाड़ है। 19 सितंबर की शाम 7 बजे यहां 14 साल की छात्रा के साथ बदसलूकी की गई। कुछ आरोपियों ने उसके साथ बैड टच किया और पूरी घटना का वीडियो बना लिया। हालांकि, घटना के दिन पुलिस को न तो इस वारदात की जानकारी मिल पाई और न ही वायरल वीडियो की भनक लगी। घटना के दो दिन बाद 21 सितंबर को पुलिस जागी और कार्रवाई शुरू हुई। घटना का वीडियो भी 19 सितंबर की रात करीब 9 बजे जमुई के लोकल सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपलोड होने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल है- जिला मुख्यालय से महज 15 किमी दूर इतनी बड़ी घटना हो गई और पुलिस इससे दो दिन तक अनजान कैसे रही? क्या पुलिस को जानकारी तभी मिलेगी, जब पीड़ित खुद थाने पहुंचेंगे? साइबर थाना उस समय क्या कर रहा था? क्या उसकी नजर क्राइम से ज्यादा सोशल मीडिया पर नेताओं की आलोचना करने वाले लोगों की ID पर रहती है? हालांकि, पुलिस ने जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई करते हुए पहले तीन नाबालिगों को पकड़ा। इसके अगले दिन दो मुख्य आरोपी नंदन और हरेराम को गिरफ्तार किया गया। वीडियो वायरल करने के आरोप में तीन अन्य आरोपियों पर भी कार्रवाई की गई, लेकिन सवाल सिर्फ गिरफ्तारी का नहीं है। पहले घटना से जुड़ी तस्वीरें देखिए… क्या इस पूरे मामले में पुलिस की लापरवाही सामने आई है? पुलिस की लोकल इंटेलिजेंस फेल कैसे हुई? साइबर सेल को 38 घंटे बाद भी वीडियो के बारे में क्यों नहीं पता चला? पढ़िए जमुई कांड में लापरवाही के जिम्मेदार चेहरे कौन हैं… फेस– 1. थानाध्यक्ष अमरेंद्र कुमार (SHO) जिम्मेदारी क्या थी: लोकल नेटवर्क से मामले का पता लगाना थानाध्यक्ष की जिम्मेदारी थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और अपराध की निगरानी के लिए पूरी पुलिस व्यवस्था को सक्रिय रखना है। संवेदनशील घटनाओं की जानकारी तुरंत लेना, शिकायत मिलने पर FIR दर्ज करना, गश्ती व्यवस्था की समीक्षा करना और गांवों से आने वाली जानकारियों पर तुरंत कार्रवाई करना उसकी पहली जिम्मेदारी है। नाबालिग से जुड़े अपराध के मामले में पीड़ित तक पुलिस की पहुंच, उसकी सुरक्षा और आरोपियों की पहचान भी बड़ी जिम्मेदारी है। थाना क्षेत्र में लगातार अपराध की आशंका वाले स्थानों और रास्तों की निगरानी के लिए पेट्रोलिंग की प्रभावी व्यवस्था भी SHO को सुनिश्चित करनी होती है। इस मामले में यह सवाल जरूरी है कि घटना के बाद करीब 40 घंटे तक थाना स्तर पर इसकी जानकारी क्यों नहीं पहुंची? क्या उपलब्ध पुलिस नेटवर्क ने घटना की कोई सूचना वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई थी? लापरवाही: 40 घंटे तक घटना पता ही नहीं चली घटना के बाद लंबे समय तक थाना स्तर पर जानकारी नहीं पहुंचना पुलिस की सूचना-प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। यह जांच जरूरी है कि SHO अमरेंद्र कुमार ने गश्ती, बीट व्यवस्था और गांव से मिलने वाली जानकारियों की नियमित समीक्षा की थी या नहीं? और घटना के बाद पुलिस ने खुद से संज्ञान क्यों नहीं लिया? 2. ड्यूटी पर तैनात SI धनंजय कुमार/पेट्रोलिंग अधिकारी जिम्मेदारी क्या थी: पेट्रोलिंग कर इलाके सुरक्षा सुनिश्चित करना पेट्रोलिंग पर तैनात SI धनंजय कुमार की मुख्य जिम्मेदारी अपने निर्धारित क्षेत्र में लगातार गश्त करना, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना और किसी घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचना है। उसे अपने क्षेत्र के सेंसेटिव प्लेस, सुनसान रास्तों, स्कूल-कॉलेज और आने-जाने वाले मेन रास्तों की जानकारी होनी चाहिए। पेट्रोलिंग के दौरान स्थानीय लोगों, दुकानदारों और अन्य सोर्स से क्षेत्र की स्थिति की जानकारी लेना भी पुलिसिंग का हिस्सा है। किसी अपराध की जानकारी मिलने पर SI को तुरंत थाना प्रभारी को अपडेट करना और जरूरत के अनुसार कार्रवाई शुरू करनी होती है। इस मामले में यह जांच का विषय है कि घटना वाले इलाके में पेट्रोलिंग किस समय और किस रास्ते पर थी? उस दौरान पुलिसकर्मी वहां से गुजरे या नहीं? क्या किसी स्थानीय व्यक्ति से घटना की जानकारी मिली? क्या 40 घंटे तक किसी से कोई संपर्क हुआ ही नहीं? लापरवाही कहां हुई: पेट्रोलिंग ही सवालों के घेरे में है अगर घटना पुलिस की निर्धारित पेट्रोलिंग सीमा में हुई और इसके बावजूद ड्यूटी पर मौजूद अधिकारी को इसकी जानकारी नहीं मिली, तो पेट्रोलिंग पर ही सवाल उठता है। जांच में पेट्रोलिंग लॉग, GPS लोकेशन, ड्यूटी चार्ट और उस समय की गतिविधियों का मिलान करना चाहिए क्या वो पेट्रोलिंग पर गए थे। 3. बीट कांस्टेबल जिम्मेदारी क्या थी: संदिग्ध स्थानों की जानकारी देना बीट कांस्टेबल पुलिस और गांव/मोहल्ले के बीच सबसे सीधा संपर्क होता है। उसकी जिम्मेदारी अपने बीट क्षेत्र के लोगों, विवादित परिवारों, संदिग्ध गतिविधियों और संवेदनशील स्थानों की जानकारी रखना है। उसे स्थानीय स्तर पर होने वाली छोटी-बड़ी घटनाओं की सूचना थाना प्रभारी तक पहुंचानी होती है। स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील रास्तों और स्थानों की जानकारी भी बीट पुलिसिंग का हिस्सा है। घटना जैसी स्थिति में बीट कांस्टेबल से अपेक्षा होती है कि वह स्थानीय लोगों से जानकारी लेकर घटना की पुष्टि करे। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों को समय पर सूचना दें। इस मामले में यह जांच जरूरी है कि संबंधित बीट कांस्टेबल को घटना की जानकारी कब मिली? उसने किन लोगों से संपर्क किया? क्या उसने घटना के बाद कोई स्थानीय सूचना थाना स्तर तक पहुंचाई थी? लापरवाही कहां हुई: थाने को बताया ही नहीं, ड्यूटी पर भी सवाल अगर बीट क्षेत्र में हुई गंभीर घटना की जानकारी बीट कांस्टेबल तक स्थानीय स्तर पर पहुंची थी, लेकिन उसने उसे थाना तक नहीं पहुंचाया, तो यह गंभीर चूक मानी जाएगी। और अगर उन्हें इस घटना की जानकारी ही नहीं मिल पाई तो ये और बड़ी लापरवाही है। जांच में उसके बीट रजिस्टर, स्थानीय संपर्क और घटना के बाद की गतिविधियों की पड़ताल जरूरी है। 4. गांव का चौकीदार जिम्मेदारी क्या थी: लोकल नेटवर्क से घटना पर अपडेट रहना गांव का चौकीदार पुलिस की लोकल इंफॉर्मेशन सिस्टम का जरूरी पार्ट होता है। उसका काम गांव में होने वाली असामान्य गतिविधियों, झगड़े, अपराध और सामाजिक तनाव की जानकारी पुलिस तक पहुंचाना है। वह ग्रामीणों के बीच मौजूद रहता है, इसलिए कई घटनाओं की शुरुआती जानकारी पुलिस तक पहुंचाने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। घटना के बाद अगर गांव में पीड़ित परिवार, आरोपी या प्रत्यक्षदर्शियों के बीच चर्चा हुई थी, तो चौकीदार से अपेक्षा होती है कि वह इसकी जानकारी संबंधित थाना या बीट पुलिस को दे। खासकर नाबालिग से जुड़ी गंभीर घटना में सूचना छिपाने की जगह तत्काल पुलिस तक पहुंचना जरूरी है। इसलिए जांच में यह देखा जाना चाहिए कि चौकीदार को घटना की जानकारी कब हुई? उसने किससे संपर्क किया? क्या उसने घटना की सूचना पुलिस को दी? लापरवाही कहां हुई: थाने में सूचना पहुंचाई ही नहीं यदि चौकीदार को घटना की जानकारी समय रहते मिल गई थी और उसने पुलिस को सूचित नहीं किया, तो स्थानीय सूचना तंत्र की बड़ी चूक मानी जाएगी। और अगर उसे भी घटना की जानकारी नहीं थी, तो सवाल यह है कि गांव की पुलिस-सूचना व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों थी? 5. साइबर DSP – अभिषेक कुमार जिम्मेदारी क्या थी: वायरल वीडियो को सबसे पहले टेकडाउन करवाना साइबर सेल की जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर सामने आने वाली गंभीर और आपराधिक सामग्री की निगरानी, पहचान और संबंधित थाने/वरिष्ठ अधिकारियों तक सूचना पहुंचाने में सहायता करना है। खासकर नाबालिग से जुड़े यौन अपराध का वीडियो वायरल होने पर पुलिस को तेजी से डिजिटल एविडेंस को सुरक्षित करना होता है। वीडियो के सोर्स की पहचान करने के साथ ही आरोपियों और पीड़ितों की पहचान भी करना होता है। टेक्निकल हेल्प करने और वीडियो के प्रसार को रोकने की कार्रवाई करने का काम साइबर सेल का होता है। इस मामले में पुलिस ने वायरल वीडियो के आधार पर आरोपियों की पहचान की और सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की। इसी वजह से जांच का एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वीडियो के बड़े स्तर पर प्रसारित होने से पहले या शुरुआती चरण में साइबर सेल को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? क्या कोई डिजिटल मॉनिटरिंग अलर्ट मौजूद था या नहीं? लापरवाही कहां हुई: वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित होने के बावजूद साइबर सेल को शुरुआती स्तर पर इसकी जानकारी नहीं मिलना डिजिटल मॉनिटरिंग की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है। हालांकि वायरल मैटर की हर पोस्ट खुद पुलिस तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं; इसलिए जांच में वास्तविक वायरलिटी और सेल की निगरानी व्यवस्था दोनों देखनी चाहिए। VIDEO VIRAL होने पर जानकारी मिली- SP जमुई एसपी विश्वजीत दयाल ने बताया कि 21 सितंबर को वायरल वीडियो के संज्ञान में आने के बाद पुलिस को मामले की जानकारी मिली। इसके बाद वायरल वीडियो के आधार पर पीड़िता की पहचान की गई। पीड़िता के बयान के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई। एसपी ने बताया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद SDPO जमुई के नेतृत्व में SIT का गठन किया गया। टीम लगातार सूचना जुटाने और संभावित ठिकानों पर छापेमारी कर रही थी। मामले में वीडियो में दिखाई दे रहे तीन नाबालिग को पहले पकड़ा गया। इसके बाद पीड़िता का वीडियो सोशल मीडिया और यूट्यूब समेत अन्य प्लेटफॉर्म पर वायरल करने वालों के खिलाफ अलग से कार्रवाई शुरू की गई। इस मामले में साइबर थाने में भी प्राथमिकी दर्ज की गई है। करीब 225 ID पर FIR किया गया है। इसके साथ ही मुख्य आरोपी नंदन और हरेराम को भी अरेस्ट कर लिया गया है।  

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