लखनऊ में जन संस्कृति मंच की ओर से कैफी आजमी एकेडमी के सभागार में ‘चार कवि-चार किताबें’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें शैलेश पंडित, उमेश पंकज, विमल किशोर और कौशल किशोर के नए कविता संग्रहों का विमोचन हुईं । कार्यक्रम की अध्यक्षता अयोध्या से आए कवि और आलोचक स्वप्निल श्रीवास्तव ने की। स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि चारों कवि अपने समय की विसंगतियों को कविता में दर्ज करते हैं। उनकी रचनाओं में समय का दुख-दर्द, हंसी-खुशी और सामाजिक बदलाव की उम्मीद दिखाई देती है। ये कवि उन समुदायों की बात करते हैं, जो विकास के दौर में भी हाशिए पर हैं। उनकी कविताओं में प्रतिरोध के साथ परिवर्तन की उम्मीद भी है। उन्होंने कहा कि चारों कवियों के विषयों में कुछ समानताएं हैं, लेकिन उनकी भाषा, कहन, बिंब, प्रतीक और अनुभव अलग हैं। कवियों ने सुनाईं अपनी रचनाएं कार्यक्रम में कवियों ने अपने संग्रहों से चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। विमल किशोर ने कविता को जीवन की ऊष्मा और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बताया। वहीं, कौशल किशोर ने कहा कि कविता किसी तय तरीके से नहीं बनती। जीवन के अनुभवों और प्रेम के अलग-अलग पड़ावों से कविता आकार लेती है। शैलेश पंडित की कविताओं में व्यवस्था और सच के बीच का संघर्ष दिखाई दिया। उन्होंने चुनौतियों के बीच सच का परचम उठाने की बात कही। वहीं, उमेश पंकज ने सच को सामने लाने को नैतिक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि सच सुनने वाले भले कम हों, लेकिन पूरी तरह गायब नहीं हैं। कवि का काम केवल सुनना नहीं, जरूरत पड़ने पर बोलना भी है। चारों कवियों की कविताओं की समीक्षा कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कविताओं पर चर्चा हुई। प्रो. नलिन रंजन सिंह ने शैलेश पंडित की कविताओं पर विचार रखे। प्रो. सूरज बहादुर थापा ने कौशल किशोर की रचनाओं की समीक्षा की। डॉ. उषा राय ने विमल किशोर की कविताओं पर बात की। आशीष सिंह ने उमेश पंकज की रचनाओं की समीक्षा की। वक्ताओं ने कविताओं के माध्यम से समकालीन कविता की खूबियों और सीमाओं पर भी चर्चा की।

