गोरखपुर में सोमवार को बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में देर शाम कजरी महोत्सव हुआ। पूरे शहर को लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया। जैसे ही मंच से कजरी की पहली लहर गूंजी। पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट और उत्साह से भर उठा। संस्कृति विभाग के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव का शुभारंभ जनपद न्यायाधीश राजकुमार सिंह और प्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने दीप प्रज्वलित कर किया। उद्घाटन के साथ ही कार्यक्रम ने रफ्तार पकड़ी और कजरी-लोकगीतों का सिलसिला देर तक चलता रहा।
मलिनी अवस्थी ने गाया… बरसे बदरिया सावन की, भींजे अँगना-डोर, कजरी गावे सजनी, भींजे मन का छोर, पिया बिना सावन सूना, भीगे नैना-नैन, माटी की खुशबू संग, गूंजे कजरी के चैन… लोक कलाकारों ने भी बिखेरा अपनी कला का जादू महोत्सव का सबसे खास आकर्षण रहीं मालिनी अवस्थी। जैसे ही उन्होंने अपनी सुमधुर आवाज में कजरी के सुर छेड़े, पूरा सभागार झूम उठा। उनके गीतों में पूर्वांचल की मिट्टी की खुशबू, सावन की मिठास और लोक जीवन की भावनाएं साफ झलक रही थीं। तालियों और सुरों से गूंजता रहा प्रेक्षागृह हर प्रस्तुति पर दर्शक तालियों से उनका स्वागत करते रहे और कई लोग खुद भी गीतों की धुन पर झूमते नजर आए। उनकी प्रस्तुति ने महोत्सव को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया। जौनपुर के गायक राजकुमार तिवारी, गोरखपुर की इंदु गुप्ता और सविता त्रिपाठी ने भी अपनी शानदार प्रस्तुतियों से माहौल को और जीवंत बना दिया। कजरी और पारंपरिक लोकगीतों की इन प्रस्तुतियों ने दर्शकों को पूर्वांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम किया। पूरे कार्यक्रम के दौरान बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह लोकगीतों की मधुर धुनों और दर्शकों की तालियों से गूंजता रहा। माहौल ऐसा था कि हर कोई इस सांस्कृतिक उत्सव में डूबा नजर आया। लोक संस्कृति के संरक्षण का सशक्त संदेश विशेषज्ञों का मानना है कि कजरी पूर्वांचल की पहचान है और ऐसे आयोजन इसे जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इससे लोक कलाकारों को मंच मिलता है और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का मौका मिलता है। महोत्सव में जनप्रतिनिधि, अधिकारी, कलाकार और बड़ी संख्या में आमजन की मौजूदगी रही। बेहतर व्यवस्थाओं और शानदार प्रस्तुतियों के चलते यह आयोजन पूरी तरह सफल रहा और लोगों के दिलों में अपनी खास छाप छोड़ गया।

