गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी को मिलेगा नया लुक:महिलाओं को सिखाई ग्लेज कलरिंग की तकनीक, प्रोडक्ट की बढ़ेगी बिक्री- कमाई

गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी को मिलेगा नया लुक:महिलाओं को सिखाई ग्लेज कलरिंग की तकनीक, प्रोडक्ट की बढ़ेगी बिक्री- कमाई

गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी को अब और सुंदर, मजबूत और टिकाऊ बनाने की तैयारी है। इसके लिए अंशिमा टैराकोटा में महिलाओं की एक वर्कशॉप आयोजित की गई। उत्तर प्रदेश उद्योग निदेशालय के निर्देश पर IIT कानपुर की टीम यहां पहुंची और जिले के अलग-अलग गांवों से आई सैकड़ों महिलाओं को ग्लेज कलरिंग की ट्रेनिंग दी। ट्रेनिंग में महिलाओं को बताया गया कि टेराकोटा ज्वेलरी पर किस तरह रंग किया जाए, जिससे उसका रंग जल्दी न निकले और प्रोडक्ट की क्वालिटी बेहतर हो। इस पहल का उद्देश्य गोरखपुर के टेराकोटा को नई पहचान दिलाने के साथ इससे जुड़ी महिलाओं की कमाई बढ़ाना भी है। पसीने से रंग निकलने की समस्या होगी दूर टेराकोटा ज्वेलरी बनाने वाली महिलाओं के सामने सबसे बड़ी परेशानी उसका रंग जल्दी उतरना है। कई बार ज्वेलरी पहनने पर पसीने के संपर्क में आने से रंग निकलने लगता है। इससे ज्वेलरी की खूबसूरती खराब हो जाती है। कुछ रंगों में इस्तेमाल होने वाले केमिकल त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। IIT कानपुर की टीम ने महिलाओं को ऐसे रंगों और ग्लेज का इस्तेमाल करना सिखाया, जिससे ज्वेलरी का रंग ज्यादा समय तक बना रहे और उसकी क्वालिटी बेहतर हो। सही तरीके से ग्लेजिंग करने से प्रोडक्ट को साफ करना भी आसान हो सकता है। 60 पैसे के सामान की कीमत 60 रुपये तक पहुंचने का उदाहरण वर्कशॉप में कारीगरों की कमाई बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। आयोजकों के अनुसार, बेहतर फिनिशिंग और वैल्यू बढ़ने से पहले जिस सामान के लिए कुम्हारों को करीब 60 पैसे मिलते थे, उसकी कीमत 60 रुपये तक पहुंचने का उदाहरण दिया गया। इसका मकसद महिलाओं और कारीगरों को यह समझाना है कि सामान की क्वालिटी बेहतर होने से उसकी बाजार में कीमत भी बढ़ सकती है। कुम्हारों की आय बढ़ाने पर काम कर रहे IIT कानपुर से आए विशेषज्ञ अंकित ने बताया कि संस्थान उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों के ODOP यानी वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट से जुड़े सामान की क्वालिटी सुधारने के लिए काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि टेराकोटा ज्वेलरी में रंग उतरने की समस्या को दूर करना जरूरी है। कई बार पसीने के कारण रंग निकलने लगता है। ऐसे में महिलाओं को सही रंग और ग्लेज का इस्तेमाल करने की जानकारी दी गई, जिससे ज्वेलरी ज्यादा टिकाऊ और सुरक्षित बन सके। उन्होंने बताया कि टीम का मुख्य उद्देश्य कारीगरों के उत्पादों को बेहतर बनाकर उनकी आय बढ़ाने में मदद करना है। टेराकोटा को ग्लोबल मार्केट तक पहुंचाने की तैयारी वर्कशॉप में मौजूद संगीता पांडेय ने बताया कि इस ट्रेनिंग के जरिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। उनका उद्देश्य है कि गोरखपुर के ODOP टेराकोटा को देश के साथ विदेशों में भी पहचान मिले। उन्होंने बताया कि पहले टेराकोटा से मुख्य रूप से मूर्तियां, सजावटी सामान और दूसरी वस्तुएं बनाई जाती थीं। अब इसी कला से ज्वेलरी भी तैयार की जा रही है, जिसे लोग पसंद कर रहे हैं। उनका मानना है कि जैसे-जैसे इन प्रोडक्ट की मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे इन्हें बनाने वाली महिलाओं की कमाई बढ़ने की संभावना भी मजबूत होगी। औरंगाबाद में महिलाओं की हालत देखकर लिया था संकल्प अंशिमा टैराकोटा की संचालक कल्याणी कीर्ति सिंह ने बताया कि महिलाओं को टेराकोटा का काम सिखाने का विचार उन्हें कई साल पहले आया था। वह औरंगाबाद गई थीं, जहां उन्होंने महिलाओं की खराब आर्थिक स्थिति देखी। वहां टेराकोटा की मूर्तियां भी देखीं, जिनकी बनावट और फिनिशिंग में सुधार की जरूरत थी। इसी दौरान उन्होंने तय किया कि वह खुद टेराकोटा का काम सीखेंगी और दूसरी महिलाओं को भी यह हुनर सिखाएंगी। कल्याणी ने बताया कि उन्होंने बंगाल से मूर्तियां मंगवाईं और उनके मोल्ड तैयार किए। इसके बाद महिलाओं को टेराकोटा के सामान बनाने की ट्रेनिंग देना शुरू किया। आज करीब 300 से 400 महिलाएं उनसे जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं अलग-अलग तरह के टेराकोटा प्रोडक्ट बनाना सीखती हैं और इस काम के जरिए कमाई भी करती हैं। उनके साथ जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। दिवाली पर बिके महिलाओं का बनाया सामान वर्कशॉप में पहुंचीं आराधना मिश्रा ने बताया कि वह कल्याणी कीर्ति सिंह को काफी समय से जानती हैं। टेराकोटा के सामान बनाने और महिलाओं को यह काम सिखाने के लिए कल्याणी की मेहनत दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस दिवाली कल्याणी और उनसे जुड़ी महिलाओं द्वारा तैयार किया गया सामान अच्छी मात्रा में बिके, ताकि उन्हें अपनी मेहनत का पूरा पैसा मिल सके।
वर्कशॉप में शामिल विभा ने बताया कि वह पिछले पांच साल से कल्याणी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि कल्याणी महिलाओं को टेराकोटा के प्रोडक्ट बनाना सिखाने के साथ उन्हें कमाई का रास्ता भी देती हैं। वह छोटी बच्चियों से लेकर महिलाओं तक को यह काम सिखाती हैं। इससे महिलाओं को नया हुनर सीखने, अपनी पहचान बनाने और आर्थिक रूप से मजबूत होने का अवसर मिलता है। अंशिमा टैराकोटा में आयोजित इस वर्कशॉप के जरिए पारंपरिक कला को नई तकनीक से जोड़ने की कोशिश की गई। ग्लेज कलरिंग से ज्वेलरी का रंग टिकाऊ बनाने और प्रोडक्ट की क्वालिटी सुधारने पर जोर दिया गया। इससे गोरखपुर के टेराकोटा को बड़े बाजार तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, बेहतर प्रोडक्ट और अच्छी बिक्री से इस काम से जुड़ी महिलाओं की कमाई बढ़ने की उम्मीद है।

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