गयाजी की गलियों से गुजरते हुए अब आपको सिर्फ सड़क, दुकान और भीड़ नहीं दिखेगी। दीवारें भी कुछ कहती नजर आएंगी। कहीं भगवान विष्णु के चरण दिखाई देंगे। कहीं गरुड़ नजर आएंगे। कहीं गयासुर व धर्मशिला की पौराणिक कथा होगी। तो कहीं अक्षयवट के नीचे माता सीता के पिंडदान का प्रसंग जीवंत होगा। यानी इस बार पितृपक्ष में गया आने वाले लाखों श्रद्धालु सिर्फ पिंडदान नहीं करेंगे। वे चलते-चलते गया का इतिहास पढ़ेंगे जानेंगे। बस फर्क इतना होगा कि यह इतिहास किताब में नहीं होगा। दीवारों पर रंगों में लिखा होगा। गयाजी शहर की दीवारों पर पेंटिंग की 2 तस्वीरें देखिए जिला प्रशासन और नीति आयोग के सहयोग से ‘पेंट द सिटी’ कैंपेन पितृपक्ष मेला 2026 को लेकर शहर की तैयारियां जोर पकड़ चुकी हैं। इसी कड़ी में जिला प्रशासन और नीति आयोग के सहयोग से ‘पेंट द सिटी’ कैंपेन शुरू किया गया है। इसके तहत गया की प्रमुख दीवारों को कैनवास बनाया जा रहा है। स्थानीय कलाकार ब्रश और रंगों के जरिए शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को दीवारों पर उतार रहे हैं। काम की शुरुआत फल्गु नदी के गायत्री घाट से हो चुकी है। लेकिन बारिश जरूर कलाकारों की परीक्षा ले रही है।कभी बूंदें रंगों पर गिरती हैं। कभी गीली दीवार ब्रश को रोक देती है। लेकिन कलाकार रुकने को तैयार नहीं हैं। गायत्री घाट पर इन दिनों पांच स्थानीय कलाकार अपने-अपने डिजाइन को आकार देने में जुटे हैं। कोई बारीक रेखाएं खींच रहा है। कोई रंग भर रहा है। कोई दूर खड़े होकर अपनी बनाई तस्वीर को निहार रहा है। कुछ ऐसा ही माहौल है जैसे दीवारें धीरे-धीरे अपनी पुरानी खामोशी तोड़ रही हों। डीएम शशांक शुभंकर की सोच से शुरू हुआ अभियान नीति आयोग के कंसल्टेंट (जिला प्रशासन) मनमोहन बताते हैं कि गया की दीवारों को सिर्फ रंगने का विचार नहीं था। मकसद था कि इन दीवारों पर गया की पहचान दिखाई दे। उन्होंने बताया कि डीएम शशांक शुभंकर की सोच थी कि शहर की दीवारों पर गया की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को उकेरा जाए।इसके लिए ‘पेंट द सिटी’ के तहत प्रतियोगिता कराई गई। कलाकारों से डिजाइन मंगवाए गए। इनमें से बेहतर डिजाइन का चयन किया गया। चयनित कलाकारों को अलग-अलग दीवारें आवंटित की गई हैं। पहले चरण में गायत्री घाट पर पांच स्थानीय कलाकार काम कर रहे पूरे अभियान के लिए करीब 30 स्थानीय कलाकारों की टीम चुनी गई है। गायत्री घाट के साथ देवघाट, पितामहेश्वर, अक्षयवट और संवाद सदन जैसे महत्वपूर्ण स्थानों को भी इसमें शामिल किया गया है। इसके बाद रेलवे स्टेशन, जेपीएन अस्पताल और जिला हाई स्कूल सहित शहर के दूसरे प्रमुख स्थानों की दीवारों को भी चित्रों से सजाया जाएगा। यानी पितृपक्ष तक शहर के कई हिस्सों में दीवारों का रंग-रूप बदलने वाला है। एक दीवार पर सीता का पिंडदान, दूसरी पर गयासुर की कथा गया कॉलेज गया के एमबीए विभाग की प्रोफेसर और कलाकार प्रज्ञा ने अपनी पेंटिंग के लिए मधुबनी कला को आधार बनाया है। उनका डिजाइन सिर्फ सुंदर चित्र नहीं है। इसके पीछे एक पूरी कहानी है। प्रज्ञा ने रामायण के उस प्रसंग को चुना है जिसमें माता सीता अक्षयवट के समक्ष पिंडदान करती हैं। उनके चित्र में यह धार्मिक प्रसंग मधुबनी कला की शैली में दिखाई देगा। इसके साथ गया और बोधगया के जुड़ाव को भी चित्र के जरिए दिखाने की कोशिश की गई है। इसके लिए मंडला आर्ट, मछली और कमल जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रज्ञा कहती हैं कि दीवार पर धार्मिक चित्र बनाना उनके लिए सिर्फ एक पेंटिंग बनाना नहीं है। यह बेहद शांतिदायक और पावन अनुभव है। बारिश के बावजूद वह और दूसरे कलाकार पूरे उत्साह से काम कर रहे हैं। पेंटिंग को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इनेमल ऑयल-बेस्ड पेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे चित्रों के वाटरप्रूफ रहने और लंबे समय तक टिके रहने की उम्मीद है। सफेद दीवारों को रंगों में बदलते देखना खुशी देता है स्थानीय कलाकार वंदना कुमारी भी इस अभियान का हिस्सा हैं। वह मधुबनी कला की पेशेवर कलाकार हैं। उन्होंने अपनी पेंटिंग में भगवान विष्णु के चरण, उनके वाहन गरुड़ और मधुबनी पैटर्न पर आधारित कलाकृतियों को जगह दी है। वंदना के लिए यह मौका थोड़ा खास है। वह कहती हैं कि गया में पहली बार स्थानीय कलाकारों को इतने बड़े स्तर पर अपनी कला दिखाने का अवसर मिला है। जब लोग उनके पास से गुजरते हैं तो कई बार रुक जाते हैं। दीवार को देखते हैं फिर पेंटिंग को देखते हैं। और हम कलाकार से उसके बारे में पूछते हैं। यह छोटी-सी बात कलाकारों का उत्साह बढ़ा देती है। वंदना कहती हैं कि सफेद दीवारों को रंगों से सजते देखना आम लोगों के साथ कलाकारों के लिए भी खुशी की बात है। मशीरा के लिए दीवार पर पेंटिंग करना पहला अनुभव
एमएससी गणित की छात्रा मशीरा सबा के लिए यह अभियान और भी खास है। उन्होंने ‘पेंट द सिटी’ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। चयन के बाद उन्हें दीवार पर अपनी कल्पना उतारने का मौका मिला। मशीरा दीवार पर गयासुर और धर्मशिला से जुड़े पौराणिक प्रसंग को मधुबनी शैली में उकेर रही हैं। वह कहती हैं कि मधुबनी बिहार की पारंपरिक लोक कला है। इसलिए उन्होंने इसी शैली के जरिए गया और बिहार की संस्कृति को सामने रखने की कोशिश की है। सबसे खास बात यह है कि दीवार पर इतनी बड़ी पेंटिंग बनाना उनका पहला अनुभव है। उनके हाथ में ब्रश है। सामने ऊंची दीवार है। और उस दीवार पर धीरे-धीरे एक कहानी जन्म ले रही है। शायद यही इस पूरे अभियान की सबसे खूबसूरत तस्वीर है। पितृपक्ष में श्रद्धालुओं को मिलेगा रंगों में गया गया का पितृपक्ष सिर्फ एक मेला नहीं है। यह शहर की सदियों पुरानी धार्मिक पहचान का हिस्सा है। देश-विदेश से लोग यहां अपने पितरों के लिए पिंडदान करने आते हैं। ऐसे में शहर की दीवारों पर उन्हीं परंपराओं और कथाओं को जगह दी जा रही है। गयाजी की गलियों से गुजरते हुए अब आपको सिर्फ सड़क, दुकान और भीड़ नहीं दिखेगी। दीवारें भी कुछ कहती नजर आएंगी। कहीं भगवान विष्णु के चरण दिखाई देंगे। कहीं गरुड़ नजर आएंगे। कहीं गयासुर व धर्मशिला की पौराणिक कथा होगी। तो कहीं अक्षयवट के नीचे माता सीता के पिंडदान का प्रसंग जीवंत होगा। यानी इस बार पितृपक्ष में गया आने वाले लाखों श्रद्धालु सिर्फ पिंडदान नहीं करेंगे। वे चलते-चलते गया का इतिहास पढ़ेंगे जानेंगे। बस फर्क इतना होगा कि यह इतिहास किताब में नहीं होगा। दीवारों पर रंगों में लिखा होगा। गयाजी शहर की दीवारों पर पेंटिंग की 2 तस्वीरें देखिए जिला प्रशासन और नीति आयोग के सहयोग से ‘पेंट द सिटी’ कैंपेन पितृपक्ष मेला 2026 को लेकर शहर की तैयारियां जोर पकड़ चुकी हैं। इसी कड़ी में जिला प्रशासन और नीति आयोग के सहयोग से ‘पेंट द सिटी’ कैंपेन शुरू किया गया है। इसके तहत गया की प्रमुख दीवारों को कैनवास बनाया जा रहा है। स्थानीय कलाकार ब्रश और रंगों के जरिए शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को दीवारों पर उतार रहे हैं। काम की शुरुआत फल्गु नदी के गायत्री घाट से हो चुकी है। लेकिन बारिश जरूर कलाकारों की परीक्षा ले रही है।कभी बूंदें रंगों पर गिरती हैं। कभी गीली दीवार ब्रश को रोक देती है। लेकिन कलाकार रुकने को तैयार नहीं हैं। गायत्री घाट पर इन दिनों पांच स्थानीय कलाकार अपने-अपने डिजाइन को आकार देने में जुटे हैं। कोई बारीक रेखाएं खींच रहा है। कोई रंग भर रहा है। कोई दूर खड़े होकर अपनी बनाई तस्वीर को निहार रहा है। कुछ ऐसा ही माहौल है जैसे दीवारें धीरे-धीरे अपनी पुरानी खामोशी तोड़ रही हों। डीएम शशांक शुभंकर की सोच से शुरू हुआ अभियान नीति आयोग के कंसल्टेंट (जिला प्रशासन) मनमोहन बताते हैं कि गया की दीवारों को सिर्फ रंगने का विचार नहीं था। मकसद था कि इन दीवारों पर गया की पहचान दिखाई दे। उन्होंने बताया कि डीएम शशांक शुभंकर की सोच थी कि शहर की दीवारों पर गया की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को उकेरा जाए।इसके लिए ‘पेंट द सिटी’ के तहत प्रतियोगिता कराई गई। कलाकारों से डिजाइन मंगवाए गए। इनमें से बेहतर डिजाइन का चयन किया गया। चयनित कलाकारों को अलग-अलग दीवारें आवंटित की गई हैं। पहले चरण में गायत्री घाट पर पांच स्थानीय कलाकार काम कर रहे पूरे अभियान के लिए करीब 30 स्थानीय कलाकारों की टीम चुनी गई है। गायत्री घाट के साथ देवघाट, पितामहेश्वर, अक्षयवट और संवाद सदन जैसे महत्वपूर्ण स्थानों को भी इसमें शामिल किया गया है। इसके बाद रेलवे स्टेशन, जेपीएन अस्पताल और जिला हाई स्कूल सहित शहर के दूसरे प्रमुख स्थानों की दीवारों को भी चित्रों से सजाया जाएगा। यानी पितृपक्ष तक शहर के कई हिस्सों में दीवारों का रंग-रूप बदलने वाला है। एक दीवार पर सीता का पिंडदान, दूसरी पर गयासुर की कथा गया कॉलेज गया के एमबीए विभाग की प्रोफेसर और कलाकार प्रज्ञा ने अपनी पेंटिंग के लिए मधुबनी कला को आधार बनाया है। उनका डिजाइन सिर्फ सुंदर चित्र नहीं है। इसके पीछे एक पूरी कहानी है। प्रज्ञा ने रामायण के उस प्रसंग को चुना है जिसमें माता सीता अक्षयवट के समक्ष पिंडदान करती हैं। उनके चित्र में यह धार्मिक प्रसंग मधुबनी कला की शैली में दिखाई देगा। इसके साथ गया और बोधगया के जुड़ाव को भी चित्र के जरिए दिखाने की कोशिश की गई है। इसके लिए मंडला आर्ट, मछली और कमल जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रज्ञा कहती हैं कि दीवार पर धार्मिक चित्र बनाना उनके लिए सिर्फ एक पेंटिंग बनाना नहीं है। यह बेहद शांतिदायक और पावन अनुभव है। बारिश के बावजूद वह और दूसरे कलाकार पूरे उत्साह से काम कर रहे हैं। पेंटिंग को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इनेमल ऑयल-बेस्ड पेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे चित्रों के वाटरप्रूफ रहने और लंबे समय तक टिके रहने की उम्मीद है। सफेद दीवारों को रंगों में बदलते देखना खुशी देता है स्थानीय कलाकार वंदना कुमारी भी इस अभियान का हिस्सा हैं। वह मधुबनी कला की पेशेवर कलाकार हैं। उन्होंने अपनी पेंटिंग में भगवान विष्णु के चरण, उनके वाहन गरुड़ और मधुबनी पैटर्न पर आधारित कलाकृतियों को जगह दी है। वंदना के लिए यह मौका थोड़ा खास है। वह कहती हैं कि गया में पहली बार स्थानीय कलाकारों को इतने बड़े स्तर पर अपनी कला दिखाने का अवसर मिला है। जब लोग उनके पास से गुजरते हैं तो कई बार रुक जाते हैं। दीवार को देखते हैं फिर पेंटिंग को देखते हैं। और हम कलाकार से उसके बारे में पूछते हैं। यह छोटी-सी बात कलाकारों का उत्साह बढ़ा देती है। वंदना कहती हैं कि सफेद दीवारों को रंगों से सजते देखना आम लोगों के साथ कलाकारों के लिए भी खुशी की बात है। मशीरा के लिए दीवार पर पेंटिंग करना पहला अनुभव
एमएससी गणित की छात्रा मशीरा सबा के लिए यह अभियान और भी खास है। उन्होंने ‘पेंट द सिटी’ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। चयन के बाद उन्हें दीवार पर अपनी कल्पना उतारने का मौका मिला। मशीरा दीवार पर गयासुर और धर्मशिला से जुड़े पौराणिक प्रसंग को मधुबनी शैली में उकेर रही हैं। वह कहती हैं कि मधुबनी बिहार की पारंपरिक लोक कला है। इसलिए उन्होंने इसी शैली के जरिए गया और बिहार की संस्कृति को सामने रखने की कोशिश की है। सबसे खास बात यह है कि दीवार पर इतनी बड़ी पेंटिंग बनाना उनका पहला अनुभव है। उनके हाथ में ब्रश है। सामने ऊंची दीवार है। और उस दीवार पर धीरे-धीरे एक कहानी जन्म ले रही है। शायद यही इस पूरे अभियान की सबसे खूबसूरत तस्वीर है। पितृपक्ष में श्रद्धालुओं को मिलेगा रंगों में गया गया का पितृपक्ष सिर्फ एक मेला नहीं है। यह शहर की सदियों पुरानी धार्मिक पहचान का हिस्सा है। देश-विदेश से लोग यहां अपने पितरों के लिए पिंडदान करने आते हैं। ऐसे में शहर की दीवारों पर उन्हीं परंपराओं और कथाओं को जगह दी जा रही है।

