इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस द्वारा अंतिम रिपोर्ट (फाइनल/क्लोजर रिपोर्ट) दाखिल किए जाने के बावजूद मजिस्ट्रेट केस डायरी की सामग्री के आधार पर सीधे संज्ञान ले सकता है और आरोपियों को तलब कर सकता है।
इसके लिए मजिस्ट्रेट पर सीआरपीसी की धारा 200 व 202 के तहत शिकायत प्रक्रिया अपनाने की बाध्यता नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन ने जीतू सोनी की याचिका पर उनके अधिवक्ता व अन्य को सुनकर दिया है। इसी के साथ कोर्ट ने सत्र अदालत के आदेश को रद्द करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट औरैया के तलब करने के आदेश को बहाल रखा। जानिये क्या है पूरा मामला मामले के तथ्यों के अनुसार 18 मार्च 2015 को बिधूना (औरैया) में सर्राफा दुकान बंद कर लौट रहे अनिल सोनी पर लाल रंग की पल्सर से आए सत्येंद्र उर्फ चुनमुन व नारायण ने जानलेवा हमला कर गोली मार दी थी। पुलिस जांच के दौरान घायल अनिल व वादी जीतू सोनी ने आरोपियों की पहचान की और मेडिकल रिपोर्ट में भी गोली लगने की पुष्टि हुई। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी। वादी ने इसके खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की। न्यायिक मजिस्ट्रेट औरैया ने रिपोर्ट खारिज की न्यायिक मजिस्ट्रेट औरैया ने क्लोजर रिपोर्ट खारिज कर सीआरपीसी की धारा 190(1)(बी) के तहत संज्ञान लेते हुए आरोपियों को आईपीसी की धारा 307 में तलब कर लिया। सत्र न्यायाधीश औरैया ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि मजिस्ट्रेट ने केस डायरी के आधार पर अपराध बनने का स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं किया था। याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के नज़ीरों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस रिपोर्ट पर मजिस्ट्रेट पुलिस के निष्कर्षों से बंधा नहीं होता। वह सीआरपीसी की धारा 190(1)(बी) के तहत केस डायरी में मौजूद गवाहों के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों पर खुद स्वतंत्र रूप से विचार कर आरोपियों को सम्मन जारी कर सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संज्ञान लेने और सम्मन जारी करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर सबूतों के विस्तृत मूल्यांकन या आरोपी के बचाव पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती। इसी के साथ हाईकोर्ट ने सत्र अदालत के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया और न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपियों को मुकदमे के लिए तलब करने के आदेश को पूरी तरह सही ठहराया।

