कजरी तीज: बदला परदेस, नहीं बदली अपनों की याद, राजस्थान से हुब्बल्ली तक आज भी जिंदा है मायके और मिट्टी से जुड़ाव

कजरी तीज: बदला परदेस, नहीं बदली अपनों की याद, राजस्थान से हुब्बल्ली तक आज भी जिंदा है मायके और मिट्टी से जुड़ाव

मिट्टी से जुड़ी यादों को फिर से जीने का अवसर
हुब्बल्ली समेत उत्तर कर्नाटक में बसे राजस्थानी परिवारों की महिलाओं के लिए कजरी तीज सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि मायके, बचपन और अपनी मिट्टी से जुड़ी यादों को फिर से जीने का अवसर है। फर्क इतना है कि पहले परदेस पति के लिए था, आज कई महिलाओं के लिए यही परदेस उनका अपना शहर बन चुका है। राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों से वर्षों पहले हुब्बल्ली आकर बसे परिवारों की महिलाएं अब यहीं की जिंदगी का हिस्सा हैं। बच्चों की पढ़ाई, परिवार का कारोबार और वर्षों से बनी सामाजिक पहचान ने हुब्बल्ली को उनका घर बना दिया है। फिर भी सावन और तीज आते ही राजस्थान का गांव, मायके का आंगन और रिश्तेदारों के साथ मनाया गया त्योहार आंखों के सामने आ जाता है।

तीज आती है तो मायके की बहुत याद आती है
हुब्बल्ली में रहने वाली राजस्थानी महिलाओं के लिए सबसे बड़ा भावनात्मक जुड़ाव आज भी मायके से है। पहले तीज पर बेटियों को मायके बुलाने की परंपरा थी। मां-बेटी का मिलन, हाथों में मेहंदी, झूले और लोकगीतों से घर उत्सवमय हो जाता था। अब दूरी अधिक है और कामकाज व पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कई बार मायके जाना संभव नहीं हो पाता। मोबाइल वीडियो कॉल ने दूरी जरूर कम की है, लेकिन मायके के आंगन में बैठकर परिवार के साथ तीज मनाने का अहसास नहीं दे पाता।

बोली की दूरी भी महसूस होती है
हुब्बल्ली में रहने वाली महिलाओं ने यहां की संस्कृति को अपनाया है। कई महिलाएं कन्नड़ समझती-बोलती हैं और स्थानीय समाज के साथ घुल-मिल गई हैं। लेकिन घर में राजस्थानी या मारवाड़ी बोली सुनाई देती है तो अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस होता है। नई पीढ़ी के बच्चों के लिए यह दूरी और बड़ी चुनौती है। वे हुब्बल्ली में जन्मे और पले-बढ़े हैं। ऐसे में दादी-नानी के गीत, राजस्थानी बोली और तीज की पुरानी परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना माताओं की जिम्मेदारी भी बन गया है।

त्योहार वही, तरीका बदल गया
पहले तीज पर घरों में महिलाएं सामूहिक रूप से लोकगीत गाती थीं। अब हुब्बल्ली में भी राजस्थानी परिवार तीज मनाते हैं, लेकिन उसका स्वरूप बदल गया है। कई परिवार सामूहिक आयोजन करते हैं। महिलाएं सजती-संवरती हैं, मेहंदी लगाती हैं और गीत-संगीत के साथ पर्व मनाती हैं। फिर भी कहीं न कहीं यह सवाल बना रहता है—क्या त्योहार मनाने भर से उस मिट्टी की कमी पूरी हो सकती है, जहां बचपन बीता था?

दादी-नानी के विरह से आज की दूरी तक
कजरी तीज के पुराने गीतों में पति के परदेस जाने की पीड़ा थी। आज हुब्बल्ली में रहने वाली महिलाओं का परदेस कुछ अलग है। पति और परिवार साथ हैं, लेकिन मायका दूर है, बचपन दूर है, अपनी बोली का सहज संसार दूर है और कई बार वह सामूहिकता भी दूर है, जिसमें तीज का असली आनंद था। यही कजरी तीज की कहानी को आज भी प्रासंगिक बनाता है। सदियां बदलीं, परदेस की परिभाषा बदली, लेकिन अपनों की याद और अपनी मिट्टी से जुड़ाव का भाव आज भी वही है।

सावन के आंगन की याद आज भी ताजा
हुब्बल्ली में निवास कर रही राजस्थान मूल की नेनूदेवी पटेल कहती हैं, आज का विरह मीलों की दूरी का नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और संस्कृति से धीरे-धीरे दूर होते जाने की टीस है। दादी-नानी के गीत अब वीडियो कॉल तक सिमट गए हैं, जहां अपनों की तस्वीर तो है, लेकिन सावन के उस पुराने आंगन का स्पर्श नहीं।

त्योहार की रौनक में भी मायके की कमी
हुब्बल्ली में निवास कर रही राजस्थान मूल की मूर्तिदेवी डी. विश्नोई कहती हैं, आज कजरी तीज का विरह मायके और अपनों से दूर होने की टीस बन गया है। शृंगार और त्योहार की रौनक के बीच भी पूरे परिवार का साथ न होना मन में अधूरापन छोड़ देता है और अपनी जड़ों से जुडऩे की चाह और गहरी हो जाती है।

प्रेम, आस्था और विरह का पर्व है कजरी तीज
हुब्बल्ली में निवास कर रही राजस्थान मूल की कमला देवासी कहती हैं, कजरी तीज महिलाओं के लिए प्रेम, आस्था और विरह का पर्व है। परदेस में दूर बैठे पति की सुख-समृद्धि और रक्षा की कामना के साथ मनाया जाने वाला यह त्योहार आज भी रिश्तों की गहराई और अपनों के प्रति भावनाओं को जीवंत करता है।

अपनों की दूरी भीड़ में अकेलापन देती है
हुब्बल्ली में निवास कर रही राजस्थान मूल की सुगनादेवी विश्नोई कहती हैं, आज त्योहारों की रौनक के बीच भी अपनों का साथ न होना एक अलग तरह का अकेलापन देता है। कजरी तीज पर परिवार और मायके की याद इस दूरी को और महसूस कराती है, मानो भीड़ के बीच भी अपना कोई बहुत दूर हो।

दादी-नानी के गीतों में आज भी बसा बचपन
हुब्बल्ली में निवास कर रही राजस्थान मूल की नीतू कोठारी कहती हैं, मेरे लिए कजरी तीज बचपन की उन यादों को फिर से जीने का अवसर है, जब दादी-नानी के विरह भरे गीत पूरे घर में गूंजते थे। आज समय बदला है, लेकिन मायके, अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुडऩे की कसक अब भी वही है।

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