पानी नहाने लायक भी नहीं है, लेकिन आस्था का सवाल है, इसलिए डुबकी लगानी पड़ती है। देवास से सिद्धवट घाट पर पितरों का तर्पण करने पहुंचे कमल यादव जब शिप्रा से बाहर निकले तो बोले, इतने पवित्र स्थान पर इतना गंदा पानी, आम जनता का क्या होगा? उनकी चिंता उन हजारों श्रद्धालुओं की भी है, जो श्राद्धपक्ष में देशभर से यहां आते हैं। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) की अगस्त रिपोर्ट भी शिप्रा के पानी की खराब स्थिति की पुष्टि करती है। सिद्धवट घाट का पानी लगातार दूसरे महीने ‘NOT SATISFACTORY’ (असंतोषजनक) पाया गया। आखिर शिप्रा का पानी आचमन तो दूर, स्नान के लायक भी क्यों नहीं रहा? इसमें प्रदूषण कितना है और सेहत पर इसका क्या असर पड़ सकता है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए भास्कर ने एक्सपर्ट से बात की और जिम्मेदार विभागों से भी उनका पक्ष जाना। पढ़िए रिपोर्ट सेहत पर असर: दूषित पानी से संक्रमण का खतरा वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अनिल डोंगरे के मुताबिक, दूषित पानी के सीधे या अप्रत्यक्ष संपर्क से संक्रमण का खतरा रहता है। ऐसे पानी से डायरिया और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। डॉ. डोंगरे के मुताबिक, दूषित पानी से पेचिश, टाइफाइड और हेपेटाइटिस-A जैसी बीमारियों का खतरा हो सकता है। जल-गुणवत्ता में बदलाव का जलीय जीवों पर भी असर पड़ सकता है। क्या कहते हैं श्रद्धालु ‘थाली में पानी लिया तो हरा दिखा, कुछ दिन में कीड़े पड़ जाएंगे’ सिद्धवट घाट पर कर्मकांड कराने वाले पंडित राजेश त्रिवेदी ने थाली में शिप्रा का पानी भरकर दिखाया। पानी हरा दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा, ‘आमतौर पर बारिश में शिप्रा का पानी साफ रहता है, लेकिन इस बार कम बारिश के कारण पानी मटमैला और हरा हो गया है। कुछ दिनों में इसमें कीड़े पड़ जाएंगे।’ राजस्थान की श्रद्धालु बोलीं- पानी साफ होता तो डुबकी लगाती राजस्थान के किशनगढ़ की रहने वाली सीमा कहा ‘मैं पहली बार यहां आई हूं। दूर से ही पानी हरा और गंदा दिख रहा है। परिवार के लोग अंदर उतरे, लेकिन मैंने सिर्फ पानी के छींटे लिए।पानी साफ होता तो जरूर डुबकी लगाती।’ वहीं इंदौर के विनोद जाटव ने कहा ‘पानी देखकर निराश हूं। यहां स्नान कर लिया है, लेकिन अब बाहर जाकर साफ पानी से दोबारा नहाना पड़ेगा। डर है कि कहीं चर्म रोग या दूसरी बीमारी न हो जाए।’ स्कंद पुराण में शिप्रा को गंगा से 10 गुना पुण्यदायी बताया गया है धार्मिक मान्यता के अनुसार, सिद्धवट का विशेष महत्व है। पंडित त्रिवेदी के मुताबिक, स्कंद पुराण के अवंतिका खंड के 49वें अध्याय में शिप्रा की उत्पत्ति भगवान विष्णु की तर्जनी से और गंगा की उत्पत्ति उनके चरणों से बताई गई है। उत्तरवाहिनी होने के कारण शिप्रा को मोक्ष के लिए गंगा से दस गुना अधिक पुण्यदायी माना गया है। प्रदूषण में भूमिका वाले 3 प्रमुख नाले 2026 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की संयुक्त समिति ने उज्जैन के 14 नालों की जांच की। रिपोर्ट के मुताबिक, हाटकेश्वर, पीलियाखाल और भैरवगढ़ नाले पूरी तरह टैप नहीं हुए हैं। हाटकेश्वर और पीलियाखाल से घरेलू सीवेज नदी में पहुंच रहा है, जबकि भैरवगढ़ नाले से हैंड-ब्लॉक प्रिंटिंग इकाइयों का केमिकलयुक्त पानी शिप्रा में मिलने की बात सामने आई। इन नालों के पानी में BOD 48 से 70 mg/L तक पाया गया। पॉल्यूशन बोर्ड अधिकारी बोले-हर महीने रिपोर्ट भेजते हैं मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उज्जैन के रीजनल अधिकारी दीपक काले ने कहा कि नदियों के प्रदूषण की नियमित जांच की जाती है। सिद्धवट के पानी की रिपोर्ट भी हर महीने नगर निगम और PHE को भेजी जाती है, ताकि संबंधित विभाग आगे कार्रवाई कर सकें। ‘सिंहस्थ से पहले सभी नालों को बंद कर देंगे’ उज्जैन नगर निगम के जलकार्य प्रभारी प्रकाश शर्मा ने माना कि सिद्धवट पर गंदे पानी की समस्या पुरानी है। उन्होंने कहा कि प्रिंटिंग प्रेस का केमिकलयुक्त पानी शिप्रा में मिल रहा है। इसे रोकने के लिए नमामि गंगे और कान्ह डक्ट प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जिनकी लागत 900 करोड़ रुपए बताई गई है।

