आनंद मोहन के सिक्के ने NDA को मात दी:पटना में 30 साल बाद BJP हारी; जनसुराज ने कैसे दी भाजपा को मात

आनंद मोहन के सिक्के ने NDA को मात दी:पटना में 30 साल बाद BJP हारी;  जनसुराज ने कैसे दी भाजपा को मात

शिक्षक कोटे की MLC के 4 सीटों पर हुए चुनाव में इस बार पूरा समीकरण बदल गया है। एक तरफ जहां वर्षों से पटना शिक्षक क्षेत्र पर एकाधिकार रखने वाले BJP के नवल किशोर यादव पहली बार MLC का चुनाव लड़े संजीव कुमार के सामने चारों खाने चित्त हो गए। सारण में आनंद मोहन के कैंडिडेट के सामने सभी पार्टियों के धुरंधर ने घुटने टेक दिए। वहीं, NDA के गढ़ मिथिला में जनसुराज ने अपना परचम लहरा दिया। तिरहुत में नरेंद्र प्रसाद ने एक बार फिर से BJP की वापसी कराई है। भास्कर के एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में पढ़िए शिक्षकों ने कैसे इस बार उच्च सदन में हर दल के नेता को जगह दी है। पटना शिक्षक-संजीव ने 30 साल बाद कराई भूमिहार की वापसी MLC चुनाव में सबसे दिलचस्प मुकाबला पटना के दोनों सीटों पर देखने को मिला। दिल की धड़कनें बढ़ा देने वाली पटना शिक्षक सीट पर लगभग 18 घंटे तक चली काउंटिंग के बाद नतीजे घोषित किए गए। प्रथम वरीयता की गिनती में BJP के नवल किशोर यादव 48 वोट से आगे रहे। इसके बाद दूसरे वरीयता के वोटों की गिनती में RJD के डॉ. संजीव आगे हुए। इसके बाद एक बार फिर से काउंटिंग हुई। RJD के संजीव 1057 वोटों से जीत दर्ज की। इसके साथ ही 30 साल बाद यानी कि 1996 के बाद यहां भूमिहार कैंडिडेट जीतने में सफल हुए। 1996 के चुनाव में नवल किशोर यादव ने कांग्रेस के दिग्गज नेता पीएन शर्मा को हरा कर इस सीट पर कब्जा किया था। इसके बाद से लगातार इस सीट पर पिछले 5 चुनाव नवल किशोर यादव चुनाव जीतते आ रहे थे। नवल किशोर के खिलाफ नाराजगी और फर्जी वोटर्स पर सख्ती ने बिगाड़ा खेल नवल किशोर यादव के खिलाफ पटना के प्रोफेसर और शिक्षकों में भारी नाराजगी थी। सीनेट बैठकों से लेकर अलग-अलग मीटिंग में उनकी कंट्रोवर्सी कई बार सामने आ चुकी थी। इसके कारण भी इस बार शिक्षकों ने उनसे दूरी बनाई और वोट नहीं किया। इसके अलावा इस बार चुनाव से 3 महीने पहले से ही पर्वत्ता के पूर्व विधायक संजीव कुमार ने काम करना शुरू कर दिया था। नए वोटर्स को जोड़ने के साथ उनका फोकस फर्जी वोटर्स का पहले नाम कटवाने से लेकर उन्हें बूथ से आने तक रोकने पर था। वे वोटिंग के दिन तक इस प्रयास में लगे रहे और कुछ हद तक सफल रहे। इस पूरे नैरेटिव ने इस बार चुनाव के समीकरण को बदल दिया। तिरहुत शिक्षक- आप ने बिगाड़ा संजय सिंह का खेल, BJP की वापसी तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में एक बार फिर से ‌BJP ने वापसी कर ली है। लगातार दो चुनाव से हारते आ रहे नरेंद्र प्रसाद यादव ने इस बार 1311 वोट से जीत दर्ज की है। इन्हें 3662 वोट मिले। वहीं, दूसरे नंबर पर निर्दलीय भूषण झा रहे। जबकि सिटिंग CPI समर्थित संजय सिंह तीसरे नंबर पर रहे। इन्हें कुल 1967 वोट मिले। जनसुराज समर्थित श्यामनंदन कुमार यादव 1458 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे। संजय सिंह के हार का सबसे बड़ा कारण जनसुराज को ही माना जा रहा है। जनसुराज ने पहले भूषण झा को अपना कैंडिडेट बनाया था। लेकिन चुनाव से ठीक पहले उन्होंने भूषण झा को बदल कर श्याम नंदन यादव को अपना कैंडिडेट बना दिया। ऐसा माना जा रहा है कि श्यामनंदन यादव ने पूरी तरह संजय सिंह का वोट काटा है। अगर इनके वोट संजय सिंह में जोड़ देते हैं तो संजय सिंह आसानी से इस चुनाव को जीत सकते थे। नरेंद्र सिंह का नेटवर्क और सरकार-संगठन ने निभाई अहम भूमिका नरेंद्र प्रसाद सिंह खुद रिटायर्ड प्रोफेसर रहे हैं। 1996 से 2008 तक तीन बार लगातार इस सीट से जीतते आ रहे थे। 2014 में JDU-BJP के अलगाव का खामियाजा इन्हें भुगतना पड़ा था। ऐसे में इस सीट पर इनका अपना एक नेटवर्क है, जो इस चुनाव में इनके काम आया। यही कारण है कि दो चुनाव हारने के बाद भी पार्टी इन पर भरोसा जताई थी। इनके नेटवर्क के अलावा सरकार के मंत्री और संगठन के नेताओं ने भी नरेंद्र प्रसाद सिंह की जीत में अहम भूमिका निभाई है। मुजफ्फरपुर के पॉलिटिकल एनालिस्ट शिशिर कुमार बताते हैं, ‘चुनाव के आखिर तक संजय सिंह लीड लेते हुए दिखाई दे रहे थे, लेकिन शिक्षकों को लेकर सरकार की एक के बाद एक घोषणाओं ने यहां समीकरण बदल दिया। BJP की रणनीति यहां कॉलेज के प्रोफेसर पर फोकस करने के बजाय स्कूल के शिक्षकों को साधने की रही। उनकी ये रणनीति सफल हुई।’ सारण शिक्षक- आनंद मोहन का सिक्का चला, बागी ने पलटी बाजी NDA के टॉप लीडरशिप ने सबसे ज्यादा पसीना सारण में बहाया था। यहां वे सिटिंग अफाक अहमद को रोकने की कोशिश में लगे रहे और उनका पूरा समीकरण बिगाड़ दिया BJP से बागी होकर चुुनाल राहुल राज ने। सारण शिक्षक सीट पर राहुल राज ने निर्दलीय चुनाव लड़कर NDA, महागठबंधन और सिटिंग जनसुराज सर्थित कैंडिडेट को पटखनी दी है। यहां फैसला पहली वरीयता की जगह दूसरी वरीयता के वोटों से हुई। पहली वरीयता में राहुल राज को 2723 वोट मिले। जबकि दूसरे नंबर पर रहे जदयू के आनंद पुष्कर को 2440 वोट मिले। वहीं, सिटिंग MLC अफाक अहमद मात्र 1999 वोट ही हासिल कर पाए। जबकि दूसरी वरीयता में इन्होंने 1815 वोट से जीत दर्ज की। अब इस जीत के पीछे के कारण जानिए बागी होने के बाद भी लोकल भाजपाइयों ने सपोर्ट किया चुनाव में बागी होने के बाद भी बीजेपी के लोकल समर्थकों ने JDU के कैंडिडेट पुष्कर आनंद की जगह निर्दलीय राहुल को सपोर्ट किया। राहुल पिछले तीन साल से सारण शिक्षक सीट से एमएलसी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। उनकी मानें तो उन्हें बीजेपी नेतृत्व से आश्वासन भी मिला था। लेकिन, गठबंधन के तहत ये सीट JDU के कोटे में जाने के कारण उनकी दावेदारी समाप्त हो गई। ऐसे में JDU कैंडिडेट को सपोर्ट करने की बजाय वे खुद मैदान में उतर गए। राजपूत सियासत का भी मिला फायदा दरअसल, NDA की तरफ से 8 में से एक भी सीट पर राजपूत कैंडिडेट को मौका नहीं दिया गया था। ऐसे आनंद मोहन ने NDA के खिलाफ जाकर BJP के बागी राहुल राज को अपना समर्थन दिया। बात केवल आनंद मोहन के सपोर्ट तक सीमित नहीं रही। लोकल राजपूत पॉलिटिक्स का फायदा भी राहुल को मिला। सूत्रों की मानें तो पर्दे के पीछे रहकर NDA के बड़े नेताओं ने भी उन्हें अपना समर्थन दिया ताकि लोकल बैलेंस न बिगड़े। पुष्कर क्यों हारे- CPI से आए पुष्कर को नहीं मिली स्वीकार्यता दरअसल पुष्कर NDA के लिए आयातित कैंडिडेट थे, जो चुनाव से पहले ही (8 फरवरी 2026) JDU में शामिल हुए थे। इनके पिता केदारनाथ पांडेय सारण शिक्षक सीट के एक कद्दावर नेता थे। वे यहां से 5 बार चुनाव जीत चुके थे। उन्होंने कई दलों में रहकर अपनी राजनीति की थी, लेकिन आखिरी समय में वे CPI से जुड़े थे। 2022 में निधन के वक्त वे CPI से जुड़े हुए। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र पुष्कर आनंद भी इसी पार्टी से उपचुनाव लड़े, लेकिन तब निर्दलीय अफाक अहमद ने उन्हें हरा दिया था। इसके बाद इस चुनाव में JDU उन्हें अपना कैंडिडेट घोषित किया था। इसे लोकल लेवल पर NDA के किसी नेता ने स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि प्रदेश स्तर के नेताओं ने तो पुष्कर की जीत के लिए खूब पसीने बहाए, लेकिन ग्राउंड लेवल पर जरूरी सपोर्ट नहीं मिल पाया। दरभंगा शिक्षक- आखिरी समय में सीट बदलना NDA को पड़ा भारी दरभंगा में जनसुराज ने सबसे बड़ा उलटफेर किया है। यहां से जनसुराज के कैंडिडेट डॉ. सुरेश प्रसाद राय (S.P.Ray) 324 वोट से जीत हासिल की है। इन्होंने कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को हराया है। एसपी राय पुराने भाजपाई थे। चुनाव से कुछ दिन पहले ही इन्होंने जनसुराज की सदस्यता ली थी। शिक्षक की नौकरी के बाद ये लगातार BJP में एक्टिव थे। शिक्षक प्रकोष्ठ के प्रदेश स्तर के सह संयोजक तक रह चुके हैं। पिछला चुनाव इसी सीट पर इन्होंने BJP के कैंडिडेट के रूप में लड़ा था। कांग्रेस के मदन मोहन झा से हार कर दूसरे स्थान पर रहे थे। इस बार BJP-JDU ने अपनी सीटें बदल ली। ‌BJP दरभंगा ग्रेजुएट पर लड़ीं और JDU शिक्षक सीट पर लड़ी। नाराज एसपी राय ने BJP का साथ छोड़कर जनसुराज का दामन थाम लिया। इसका फायदा मिथिलांचल में जनसुराज को मिला और विधानसभा के बाद अब विधान परिषद में भी उनके एक कैंडिडेट पहुंच गए। कांग्रेस से ज्यादा इसका नुकसान NDA को हुआ। कांग्रेस से नाराजगी, JDU के कमजोर कैंडिडेट का जनसुराज को मिला लाभ मदनमोहन झा पिछले दो चुनाव से लगातार इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे थे। ऐसे में उनके खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी थी। लोगों में खासकर शिक्षकों में उनके खिलाफ नाराजगी थी। NDA की तरफ से आखिरी समय में JDU ने घनश्याम राय को अपना कैंडिडेट बना दिया था। स्थिति ये थी कि इलाके के शिक्षकों के बीच उनकी पहचान तक नहीं थी। इसका सीधा लाभ जनसुराज को मिला। सुरेश राय पिछले कई वर्षों से लगातार इस इलाके में काम करते आ रहे थे। मदन मोहन झा को हराने में निर्दलीय रामदेव राय की भी अहम भूमिका रही। 1735 वोट के साथ ये तीसरे स्थान पर रहे। ये वोट अगर कांग्रेस को मिलता तो उनकी जीत आसानी से हो सकती थी। शिक्षक कोटे की MLC के 4 सीटों पर हुए चुनाव में इस बार पूरा समीकरण बदल गया है। एक तरफ जहां वर्षों से पटना शिक्षक क्षेत्र पर एकाधिकार रखने वाले BJP के नवल किशोर यादव पहली बार MLC का चुनाव लड़े संजीव कुमार के सामने चारों खाने चित्त हो गए। सारण में आनंद मोहन के कैंडिडेट के सामने सभी पार्टियों के धुरंधर ने घुटने टेक दिए। वहीं, NDA के गढ़ मिथिला में जनसुराज ने अपना परचम लहरा दिया। तिरहुत में नरेंद्र प्रसाद ने एक बार फिर से BJP की वापसी कराई है। भास्कर के एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में पढ़िए शिक्षकों ने कैसे इस बार उच्च सदन में हर दल के नेता को जगह दी है। पटना शिक्षक-संजीव ने 30 साल बाद कराई भूमिहार की वापसी MLC चुनाव में सबसे दिलचस्प मुकाबला पटना के दोनों सीटों पर देखने को मिला। दिल की धड़कनें बढ़ा देने वाली पटना शिक्षक सीट पर लगभग 18 घंटे तक चली काउंटिंग के बाद नतीजे घोषित किए गए। प्रथम वरीयता की गिनती में BJP के नवल किशोर यादव 48 वोट से आगे रहे। इसके बाद दूसरे वरीयता के वोटों की गिनती में RJD के डॉ. संजीव आगे हुए। इसके बाद एक बार फिर से काउंटिंग हुई। RJD के संजीव 1057 वोटों से जीत दर्ज की। इसके साथ ही 30 साल बाद यानी कि 1996 के बाद यहां भूमिहार कैंडिडेट जीतने में सफल हुए। 1996 के चुनाव में नवल किशोर यादव ने कांग्रेस के दिग्गज नेता पीएन शर्मा को हरा कर इस सीट पर कब्जा किया था। इसके बाद से लगातार इस सीट पर पिछले 5 चुनाव नवल किशोर यादव चुनाव जीतते आ रहे थे। नवल किशोर के खिलाफ नाराजगी और फर्जी वोटर्स पर सख्ती ने बिगाड़ा खेल नवल किशोर यादव के खिलाफ पटना के प्रोफेसर और शिक्षकों में भारी नाराजगी थी। सीनेट बैठकों से लेकर अलग-अलग मीटिंग में उनकी कंट्रोवर्सी कई बार सामने आ चुकी थी। इसके कारण भी इस बार शिक्षकों ने उनसे दूरी बनाई और वोट नहीं किया। इसके अलावा इस बार चुनाव से 3 महीने पहले से ही पर्वत्ता के पूर्व विधायक संजीव कुमार ने काम करना शुरू कर दिया था। नए वोटर्स को जोड़ने के साथ उनका फोकस फर्जी वोटर्स का पहले नाम कटवाने से लेकर उन्हें बूथ से आने तक रोकने पर था। वे वोटिंग के दिन तक इस प्रयास में लगे रहे और कुछ हद तक सफल रहे। इस पूरे नैरेटिव ने इस बार चुनाव के समीकरण को बदल दिया। तिरहुत शिक्षक- आप ने बिगाड़ा संजय सिंह का खेल, BJP की वापसी तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में एक बार फिर से ‌BJP ने वापसी कर ली है। लगातार दो चुनाव से हारते आ रहे नरेंद्र प्रसाद यादव ने इस बार 1311 वोट से जीत दर्ज की है। इन्हें 3662 वोट मिले। वहीं, दूसरे नंबर पर निर्दलीय भूषण झा रहे। जबकि सिटिंग CPI समर्थित संजय सिंह तीसरे नंबर पर रहे। इन्हें कुल 1967 वोट मिले। जनसुराज समर्थित श्यामनंदन कुमार यादव 1458 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे। संजय सिंह के हार का सबसे बड़ा कारण जनसुराज को ही माना जा रहा है। जनसुराज ने पहले भूषण झा को अपना कैंडिडेट बनाया था। लेकिन चुनाव से ठीक पहले उन्होंने भूषण झा को बदल कर श्याम नंदन यादव को अपना कैंडिडेट बना दिया। ऐसा माना जा रहा है कि श्यामनंदन यादव ने पूरी तरह संजय सिंह का वोट काटा है। अगर इनके वोट संजय सिंह में जोड़ देते हैं तो संजय सिंह आसानी से इस चुनाव को जीत सकते थे। नरेंद्र सिंह का नेटवर्क और सरकार-संगठन ने निभाई अहम भूमिका नरेंद्र प्रसाद सिंह खुद रिटायर्ड प्रोफेसर रहे हैं। 1996 से 2008 तक तीन बार लगातार इस सीट से जीतते आ रहे थे। 2014 में JDU-BJP के अलगाव का खामियाजा इन्हें भुगतना पड़ा था। ऐसे में इस सीट पर इनका अपना एक नेटवर्क है, जो इस चुनाव में इनके काम आया। यही कारण है कि दो चुनाव हारने के बाद भी पार्टी इन पर भरोसा जताई थी। इनके नेटवर्क के अलावा सरकार के मंत्री और संगठन के नेताओं ने भी नरेंद्र प्रसाद सिंह की जीत में अहम भूमिका निभाई है। मुजफ्फरपुर के पॉलिटिकल एनालिस्ट शिशिर कुमार बताते हैं, ‘चुनाव के आखिर तक संजय सिंह लीड लेते हुए दिखाई दे रहे थे, लेकिन शिक्षकों को लेकर सरकार की एक के बाद एक घोषणाओं ने यहां समीकरण बदल दिया। BJP की रणनीति यहां कॉलेज के प्रोफेसर पर फोकस करने के बजाय स्कूल के शिक्षकों को साधने की रही। उनकी ये रणनीति सफल हुई।’ सारण शिक्षक- आनंद मोहन का सिक्का चला, बागी ने पलटी बाजी NDA के टॉप लीडरशिप ने सबसे ज्यादा पसीना सारण में बहाया था। यहां वे सिटिंग अफाक अहमद को रोकने की कोशिश में लगे रहे और उनका पूरा समीकरण बिगाड़ दिया BJP से बागी होकर चुुनाल राहुल राज ने। सारण शिक्षक सीट पर राहुल राज ने निर्दलीय चुनाव लड़कर NDA, महागठबंधन और सिटिंग जनसुराज सर्थित कैंडिडेट को पटखनी दी है। यहां फैसला पहली वरीयता की जगह दूसरी वरीयता के वोटों से हुई। पहली वरीयता में राहुल राज को 2723 वोट मिले। जबकि दूसरे नंबर पर रहे जदयू के आनंद पुष्कर को 2440 वोट मिले। वहीं, सिटिंग MLC अफाक अहमद मात्र 1999 वोट ही हासिल कर पाए। जबकि दूसरी वरीयता में इन्होंने 1815 वोट से जीत दर्ज की। अब इस जीत के पीछे के कारण जानिए बागी होने के बाद भी लोकल भाजपाइयों ने सपोर्ट किया चुनाव में बागी होने के बाद भी बीजेपी के लोकल समर्थकों ने JDU के कैंडिडेट पुष्कर आनंद की जगह निर्दलीय राहुल को सपोर्ट किया। राहुल पिछले तीन साल से सारण शिक्षक सीट से एमएलसी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। उनकी मानें तो उन्हें बीजेपी नेतृत्व से आश्वासन भी मिला था। लेकिन, गठबंधन के तहत ये सीट JDU के कोटे में जाने के कारण उनकी दावेदारी समाप्त हो गई। ऐसे में JDU कैंडिडेट को सपोर्ट करने की बजाय वे खुद मैदान में उतर गए। राजपूत सियासत का भी मिला फायदा दरअसल, NDA की तरफ से 8 में से एक भी सीट पर राजपूत कैंडिडेट को मौका नहीं दिया गया था। ऐसे आनंद मोहन ने NDA के खिलाफ जाकर BJP के बागी राहुल राज को अपना समर्थन दिया। बात केवल आनंद मोहन के सपोर्ट तक सीमित नहीं रही। लोकल राजपूत पॉलिटिक्स का फायदा भी राहुल को मिला। सूत्रों की मानें तो पर्दे के पीछे रहकर NDA के बड़े नेताओं ने भी उन्हें अपना समर्थन दिया ताकि लोकल बैलेंस न बिगड़े। पुष्कर क्यों हारे- CPI से आए पुष्कर को नहीं मिली स्वीकार्यता दरअसल पुष्कर NDA के लिए आयातित कैंडिडेट थे, जो चुनाव से पहले ही (8 फरवरी 2026) JDU में शामिल हुए थे। इनके पिता केदारनाथ पांडेय सारण शिक्षक सीट के एक कद्दावर नेता थे। वे यहां से 5 बार चुनाव जीत चुके थे। उन्होंने कई दलों में रहकर अपनी राजनीति की थी, लेकिन आखिरी समय में वे CPI से जुड़े थे। 2022 में निधन के वक्त वे CPI से जुड़े हुए। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र पुष्कर आनंद भी इसी पार्टी से उपचुनाव लड़े, लेकिन तब निर्दलीय अफाक अहमद ने उन्हें हरा दिया था। इसके बाद इस चुनाव में JDU उन्हें अपना कैंडिडेट घोषित किया था। इसे लोकल लेवल पर NDA के किसी नेता ने स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि प्रदेश स्तर के नेताओं ने तो पुष्कर की जीत के लिए खूब पसीने बहाए, लेकिन ग्राउंड लेवल पर जरूरी सपोर्ट नहीं मिल पाया। दरभंगा शिक्षक- आखिरी समय में सीट बदलना NDA को पड़ा भारी दरभंगा में जनसुराज ने सबसे बड़ा उलटफेर किया है। यहां से जनसुराज के कैंडिडेट डॉ. सुरेश प्रसाद राय (S.P.Ray) 324 वोट से जीत हासिल की है। इन्होंने कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को हराया है। एसपी राय पुराने भाजपाई थे। चुनाव से कुछ दिन पहले ही इन्होंने जनसुराज की सदस्यता ली थी। शिक्षक की नौकरी के बाद ये लगातार BJP में एक्टिव थे। शिक्षक प्रकोष्ठ के प्रदेश स्तर के सह संयोजक तक रह चुके हैं। पिछला चुनाव इसी सीट पर इन्होंने BJP के कैंडिडेट के रूप में लड़ा था। कांग्रेस के मदन मोहन झा से हार कर दूसरे स्थान पर रहे थे। इस बार BJP-JDU ने अपनी सीटें बदल ली। ‌BJP दरभंगा ग्रेजुएट पर लड़ीं और JDU शिक्षक सीट पर लड़ी। नाराज एसपी राय ने BJP का साथ छोड़कर जनसुराज का दामन थाम लिया। इसका फायदा मिथिलांचल में जनसुराज को मिला और विधानसभा के बाद अब विधान परिषद में भी उनके एक कैंडिडेट पहुंच गए। कांग्रेस से ज्यादा इसका नुकसान NDA को हुआ। कांग्रेस से नाराजगी, JDU के कमजोर कैंडिडेट का जनसुराज को मिला लाभ मदनमोहन झा पिछले दो चुनाव से लगातार इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे थे। ऐसे में उनके खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी थी। लोगों में खासकर शिक्षकों में उनके खिलाफ नाराजगी थी। NDA की तरफ से आखिरी समय में JDU ने घनश्याम राय को अपना कैंडिडेट बना दिया था। स्थिति ये थी कि इलाके के शिक्षकों के बीच उनकी पहचान तक नहीं थी। इसका सीधा लाभ जनसुराज को मिला। सुरेश राय पिछले कई वर्षों से लगातार इस इलाके में काम करते आ रहे थे। मदन मोहन झा को हराने में निर्दलीय रामदेव राय की भी अहम भूमिका रही। 1735 वोट के साथ ये तीसरे स्थान पर रहे। ये वोट अगर कांग्रेस को मिलता तो उनकी जीत आसानी से हो सकती थी।  

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