आश्विन शुक्ल चतुर्थी में आज बुधवार को अनुराधा नक्षत्र और आयुष्मान योग के साथ सर्वार्थ अमृत सिद्धि योग व रवियोग में कुष्मांडा माता की पूजा होगी। ज्योतिषाचार्य राकेश झा ने बताया कि माता मंद व हल्की मुस्कान द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा पड़ा। देवी मां की उपासना श्रद्धालु को स्वाभाविक रूप से भवसागर से पार उतारने के लिए सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। माता कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधि-व्याधियों से विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाती है। इसीलिए अपनी लौकिक, परलौकिक उन्नति चाहने वाले उपासक को कूष्माण्डा देवी की उपासना करनी चाहिए। कूष्मांडा देवी का दिव्य स्वरूप मार्कण्डेय पुराण के अनुसार जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब माता कूष्माण्डा ने अपने ईषत हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी लिए इन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा कहा जाता है। इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों एवं निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं, इसलिए इस देवी को कुष्मांडा कहा जाता है। सूर्यलोक में निवास करने देवी है कूष्माण्डा ज्योतिषी झा के मुताबिक इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति केवल मां कूष्मांडा में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा से भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा आयु, यश, बल एवं आरोग्य प्राप्त होता है। यह देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है। कूष्माण्डा माता का मंत्र: सुरा सम्पूर्ण कलशं रूधिराप्लुत मेव च। दधाना हस्त पद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तुमे।। आश्विन शुक्ल चतुर्थी में आज बुधवार को अनुराधा नक्षत्र और आयुष्मान योग के साथ सर्वार्थ अमृत सिद्धि योग व रवियोग में कुष्मांडा माता की पूजा होगी। ज्योतिषाचार्य राकेश झा ने बताया कि माता मंद व हल्की मुस्कान द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा पड़ा। देवी मां की उपासना श्रद्धालु को स्वाभाविक रूप से भवसागर से पार उतारने के लिए सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। माता कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधि-व्याधियों से विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाती है। इसीलिए अपनी लौकिक, परलौकिक उन्नति चाहने वाले उपासक को कूष्माण्डा देवी की उपासना करनी चाहिए। कूष्मांडा देवी का दिव्य स्वरूप मार्कण्डेय पुराण के अनुसार जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब माता कूष्माण्डा ने अपने ईषत हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी लिए इन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा कहा जाता है। इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों एवं निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं, इसलिए इस देवी को कुष्मांडा कहा जाता है। सूर्यलोक में निवास करने देवी है कूष्माण्डा ज्योतिषी झा के मुताबिक इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति केवल मां कूष्मांडा में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा से भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा आयु, यश, बल एवं आरोग्य प्राप्त होता है। यह देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है। कूष्माण्डा माता का मंत्र: सुरा सम्पूर्ण कलशं रूधिराप्लुत मेव च। दधाना हस्त पद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तुमे।।

