इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) में आउटसोर्सिंग से फोरमैन अनुदेशक के पदों को भरने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी शासनादेश वैधानिक सेवा नियमावली का उल्लंघन नहीं कर सकता। हालांकि कोर्ट ने विभाग को नियमावली के तहत नियमित प्रक्रिया से भर्ती जारी रखने की छूट दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने अखिलेश कुमार सिंह की याचिका पर उनके अधिवक्ता सुनील कुमार व वीरेंद्र कुमार गौतम और सरकारी वकील को सुनकर दिया है। क्या तर्क दिए गए जानिये याची की ओर से अधिवक्ता द्वय ने कहा कि गत 24 जून को एक शासनादेश जारी कर फोरमैन अनुदेशक के पदों को आउटसोर्सिंग के जरिए भरने की मंजूरी दी गई है। यह कदम उत्तर प्रदेश राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (अनुदेशक और फोरमैन अनुदेशक) सेवा नियमावली 2021 के नियमों का खुला उल्लंघन है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकारी वकील से पूछा कि क्या सेवा नियमावली को दरकिनार कर कोई शासनादेश जारी किया जा सकता है? लेकिन सरकारी वकील कोई स्पष्टीकरण पेश नहीं कर सके।
इस पर कोर्ट ने कानून की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि कोई भी शासनादेश लागू वैधानिक नियमों को खत्म या अतिक्रमित नहीं कर सकता। न ही कार्यपालिका के आदेश से सेवा नियमावली के विरुद्ध कोई प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसी के साथ कोर्ट ने 24 जून 2026 के विवादित शासनादेश को अगले आदेश तक स्थगित रखने का निर्देश देते हुए याचिका पर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याची को प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।

