Waardenburg Syndrome Cause: आपने कभी न कभी ऐसे व्यक्ति को जरूर देखा होगा जिसकी दोनों आंखों का रंग एक-दूसरे से बिलकुल अलग होता है जैसे एक आंख नीली और दूसरी भूरी। या फिर बचपन से ही सिर के सामने के बालों में सफेद रंग की एक लट दिखाई देती है। पहली नज़र में यह केवल एक अनोखा या सुंदर शारीरिक लक्षण लग सकता है। यह एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी (Genetic Condition) का संकेत हो सकता है। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में वार्डनबर्ग सिंड्रोम (Waardenburg Syndrome) कहा जाता है। आइए समझते हैं कि यह सिंड्रोम क्या है, ऐसा क्यों होता है और इसके मुख्य लक्षण क्या हैं।
वार्डनबर्ग सिंड्रोम क्या है?
इंडियन जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी, वेनेरोलॉजी एंड लेप्रोलॉजी (IJDVL) के अनुसार, वार्डनबर्ग सिंड्रोम एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है जो शरीर में रंग बनाने वाली कोशिकाओं (Melanocytes) को प्रभावित करती है। ये कोशिकाएं हमारी त्वचा, बालों और आंखों का रंग तय करती हैं। इसके अलावा, ये कोशिकाएं हमारे कान के अंदरूनी हिस्से को सही तरीके से काम करने में भी मदद करती हैं। जब इन कोशिकाओं का विकास ठीक से नहीं हो पाता, तो इंसान की आंखों का रंग असामान्य हो जाता है, बालों में समय से पहले सफ़ेद धब्बे या लट आ जाती है, और कई मामलों में सुनने की क्षमता (Hearing Power) पर भी असर पड़ता है।
यह बीमारी क्यों और कैसे होती है?
क्लीवलैंड क्लिनिक के मुताबिक, वार्डनबर्ग सिंड्रोम एक आनुवंशिक (Genetic) बीमारी है। इसका मतलब है कि यह बीमारी जीन में बदलाव या म्यूटेशन (Mutation) के कारण होती है और माता-पिता से बच्चे में पहुंच सकती है। अगर माता या पिता में से किसी एक को भी यह सिंड्रोम है, तो उनके बच्चे में इसके पहुँचने की 50 प्रतिशत संभावना होती है। हालांकि, कई मामलों में ऐसा भी देखा गया है कि परिवार में पहले किसी को यह बीमारी नहीं थी, फिर भी बच्चे में नया म्यूटेशन होने से यह सिंड्रोम विकसित हो गया।
वार्डनबर्ग सिंड्रोम के मुख्य लक्षण
इस सिंड्रोम के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ लोगों में बेहद हल्के लक्षण दिखते हैं, जबकि दूसरों में यह ज़्यादा असर दिखाता है। इसके सबसे आम लक्षण इस प्रकार हैं;
- आंखों के रंग में बदलाव।
- बालों में सफेद लट।
- सुनने में परेशानी (बहरापन)।
- आंखों के बीच दूरी।
- त्वचा पर सफेद धब्बे।
क्या इसके अलग-अलग प्रकार होते हैं?
डॉक्टरों ने वार्डनबर्ग सिंड्रोम को मुख्य रूप से 4 अलग-अलग प्रकारों (Types 1 to 4) में बांटा है;
- टाइप 1- इसमें आंखों के बीच दूरी ज़्यादा होती है, बालों में सफ़ेद लट होती है और सुनने में थोड़ी बहुत समस्या हो सकती है।
- टाइप 2- इसमें आंखों के बीच दूरी सामान्य होती है, लेकिन बहरेपन (सुनने की क्षमता में कमी) की समस्या ज़्यादा देखी जाती है।
- टाइप 3- इसमें ऊपर बताए गए लक्षणों के साथ-साथ हाथों या उंगलियों की हड्डियों और जोड़ों में भी थोड़ी कमज़ोरी या बनावट में अंतर होता है।
- टाइप 4- यह बेहद दुर्लभ है, इसमें त्वचा और बालों के लक्षणों के साथ-साथ आंतों से जुड़ी गंभीर बीमारी (Hirschsprung disease) भी हो सकती है, जिससे कब्ज या पेट साफ न होने की समस्या रहती है।
क्या इसका इलाज संभव है?
यह एक जेनेटिक बीमारी है, इसलिए इसे पूरी तरह से ठीक या जड़ से समाप्त नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके लक्षणों का सही समय पर प्रबंधन (Management) करके मरीज को एक सामान्य और बेहतर जिंदगी दी जा सकती है, अगर बच्चे को सुनने में समस्या है, तो जन्म के तुरंत बाद या बचपन में ही हियरिंग ऐड (कान की मशीन) या कॉक्लियर इम्प्लांट (Cochlear Implant) लगवाकर उसकी सुनने की क्षमता को ठीक किया जा सकता है। चमकीली नीली आंखों या त्वचा के सफ़ेद धब्बों को धूप के सीधे असर से बचाने के लिए सनग्लासेस और सनस्क्रीन का इस्तेमाल किया जाता है। अगर परिवार में यह सिंड्रोम पहले से मौजूद है, तो शादी या बच्चा पैदा करने से पहले जेनेटिक काउंसलर से सलाह लेना मददगार साबित होता है।

