अलीगढ़ की सियासत में ‘अनजान लेखक’ का तंज:पोस्ट आते ही नेताओं के मोबाइल गर्म, इशारा किसकी ओर… पहचानने वालों की कमी नहीं

अलीगढ़ की सियासत में ‘अनजान लेखक’ का तंज:पोस्ट आते ही नेताओं के मोबाइल गर्म, इशारा किसकी ओर… पहचानने वालों की कमी नहीं

अलीगढ़ की सियासत में इन दिनों नेताओं के बयानों से ज्यादा कुछ फेसबुक पोस्ट सुर्खियां बटोर रही हैं। पोस्ट करने वाला कौन है, यह किसी को ठीक-ठीक नहीं मालूम… लेकिन पोस्ट किसके लिए है, इसे समझने वाले राजनीतिक गलियारों में खूब हैं। नाम सीधे नहीं लिए जाते, मगर इशारा इतना साफ होता है कि संबंधित खेमे तक बात पहुंचते-पहुंचते चर्चा का विषय बन जाती है।
‘हरिगढ़ का सत्य’, ‘दरी बिछाओ मंच’, ‘भैयाजी अध्यक्ष बनने की तैयारी में’… ऐसे नामों से चल रहे फेसबुक अकाउंट लंबे समय से अलीगढ़ की राजनीति पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। किसी नेता की सक्रियता हो, संगठन में पद की दौड़ हो, किसी दावेदार की अचानक बढ़ी राजनीतिक हलचल हो या किसी कार्यक्रम में आगे की कुर्सी की कवायद… सोशल मीडिया पर तंज के रूप में उसका ‘पोस्टमार्टम’ दिखाई दे जाता है। और यही इन अकाउंटों की खासियत भी है पोस्ट कुछ पंक्तियों की, लेकिन उसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा कई घंटों की।
नाम नहीं, इशारा काफी… और इशारा समझने वाले भी कम नहीं
इन अकाउंटों की पोस्ट का अंदाज सीधा बयान देने वाला नहीं है। शब्दों के पीछे संकेत होते हैं, संकेतों के पीछे राजनीतिक संदर्भ और संदर्भ ऐसा कि पार्टी के भीतर बैठे लोग उसे अपने हिसाब से जोड़ लेते हैं। किसी दावेदार की सक्रियता पर तंज, किसी पद की दौड़ पर कटाक्ष, संगठन में चल रही कवायद पर व्यंग्य या किसी नेता की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर चुटकी—इन पोस्टों में स्थानीय राजनीति की वही बातें दिखाई देती हैं, जिनकी चर्चा बंद कमरों और चाय की दुकानों पर होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां बातचीत कुछ लोगों तक रहती है और यहां पोस्ट के बाद पूरा राजनीतिक सर्किल उसे पढ़ लेता है।
असली मसाला—‘इतनी अंदर की खबर आती कहां से है?’
राजनीतिक लोगों के बीच इन अकाउंटों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल की है। आखिर इन पोस्टों में स्थानीय राजनीति की इतनी बारीकियां आती कहां से हैं? किसी दावेदार की गतिविधि पर टिप्पणी हो या संगठन में चल रही अंदरूनी कवायद का संदर्भ—पोस्ट पढ़ने वाले कई बार यह अंदाजा लगाने लगते हैं कि लिखने वाले की नजर राजनीतिक घटनाक्रम पर काफी करीब से है। यहीं से दूसरा सवाल पैदा होता है कि क्या कोई अंदर की जानकारी पहुंचाता है, या सोशल मीडिया पर नजर रखने वाला यह पूरा खेल अपने स्तर पर ही समझता है? इसका सार्वजनिक और पुष्ट जवाब फिलहाल नहीं है।
शिकायतें भी हुईं, लेकिन ‘चेहरा’ अब तक सामने नहीं
इन अकाउंटों की पोस्ट को लेकर पूर्व में पुलिस तक शिकायतें पहुंचने की चर्चाएं भी रही हैं। मगर इनके पीछे कौन है, इस सवाल का कोई स्पष्ट सार्वजनिक निष्कर्ष सामने नहीं आया। नतीजा यह कि अकाउंट चलते रहे, पोस्ट आती रहीं और इनके पीछे मौजूद व्यक्ति या समूह की पहचान को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी चलती रहीं।
यानी अकाउंट का चेहरा फेसबुक पर मौजूद है, लेकिन उसे चलाने वाला चेहरा अब भी पर्दे के पीछे है।
चुनावी मौसम में बढ़ा ‘तंज का ट्रैफिक’
अब विधानसभा चुनाव की तैयारियों का दौर है। अलीगढ़ की अलग-अलग सीटों पर राजनीतिक दलों के संभावित दावेदार सक्रिय हैं। भाजपा में संगठनात्मक गतिविधियां और पदाधिकारियों के चयन को लेकर हलचल है। सपा में भी कई नाम अपनी-अपनी दावेदारी को लेकर सक्रिय हैं। कांग्रेस और बसपा में भी संभावित प्रत्याशियों और संगठनात्मक समीकरणों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं। ऐसे में सोशल मीडिया के इन अकाउंटों को भी जैसे नया ‘कंटेंट’ मिल गया है। कहीं अध्यक्ष बनने की तैयारी पर कटाक्ष है तो कहीं टिकट की दौड़ पर व्यंग्य। कहीं संगठन में जगह बनाने की कवायद चर्चा में है तो कहीं किसी नेता की बढ़ती सक्रियता को लेकर तंज।
भाजपा पर ज्यादा फोकस, मगर कहानी सिर्फ भाजपा तक नहीं
इन अकाउंटों पर भाजपा से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम अपेक्षाकृत ज्यादा चर्चा में दिखाई देते हैं। संगठन में चल रही गतिविधियों, पदाधिकारियों की कवायद और संभावित दावेदारों को लेकर तंजिया पोस्ट खूब चर्चा बटोरती हैं।
हालांकि सपा, कांग्रेस और बसपा से जुड़े घटनाक्रम भी इस सोशल मीडिया राजनीति से पूरी तरह बाहर नहीं हैं। जहां राजनीतिक दावेदारी है, वहां सोशल मीडिया का तंज भी पहुंच जाता है।
पोस्ट डालने वाला कौन? यही सबसे बड़ा ‘सस्पेंस’
अलीगढ़ की राजनीति में इन अकाउंटों की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा उनकी पोस्ट नहीं, बल्कि पोस्ट के पीछे का अनजान चेहरा है। राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग लोगों के नामों को लेकर कयास लगते रहे हैं, लेकिन किसी को इन अकाउंटों का संचालक बताने की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए कयास अपनी जगह हैं और तथ्य अपनी जगह। फिलहाल इतना जरूर है कि चुनावी मौसम में अलीगढ़ की राजनीति सिर्फ मंचों और बैठकों में नहीं, फेसबुक की टाइमलाइन पर भी खूब दिखाई दे रही है। किसी का टिकट अभी तय नहीं हुआ, किसी का पद अभी पक्का नहीं हुआ और किसी की दावेदारी अभी अंतिम नहीं हुई… लेकिन फेसबुक पर इनके ‘पोस्टर’ पहले ही लगने लगे हैं। और हर नई पोस्ट के बाद वही पुराना सवाल फिर लौट आता है ‘भाई, ये लिख कौन रहा है?’ जवाब किसी के पास पक्का नहीं… लेकिन पोस्ट पढ़कर मुस्कुराने, चिढ़ने और अपने-अपने मतलब निकालने वालों की कमी नहीं है।

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