अयोध्या को समझे बिना भारत की पहचान पूरी नहीं हो सकती। यह भारत का मर्म स्थल है और देश को जब भी नए पुनर्जागरण की जरूरत होगी, अयोध्या उसे नई ऊर्जा देगी। शनिवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय कला मंच के दो दिवसीय साहित्य महोत्सव ‘शब्द रंग’ में हनुमन्न निवास के महंत मिथिलेशनंदिनीशरण ने यह बात कही। महोत्सव के पहले दिन दूसरे सत्र में ‘वैदिक एवं लौकिक वाङ्मय में श्री अयोध्या एवं श्रीराम’ विषय पर चर्चा हुई। महंत ने कहा कि अयोध्या ऐसी भूमि है, जहां दिन और रात का भेद समाप्त हो जाता है। यह केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है। अयोध्या को जानने विदेशी भी पहुंचे महंत मिथिलेशनंदिनीशरण ने कहा कि अयोध्या को जानने और समझने के लिए केवल भारतीय ही नहीं, विदेशी भी यहां आए। फादर जोसेफ टेफेन्थैलर, हेंस बेकर और विलियम फिंच जैसे लोगों के साथ राय बहादुर लाला सीताराम ने भी अयोध्या पर लिखा। उनके मुताबिक, भारत को समझने की कोशिश में अयोध्या को जानना जरूरी रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनमानस में अयोध्या और राम की गहरी छाप है। इसी वजह से बच्चे के जन्म पर गाए जाने वाले सोहर में मां की तुलना कौशल्या और बच्चे की तुलना राम से की जाती है। यह लोक परंपरा में अयोध्या और राम के महत्व को दिखाता है। ‘जिस हृदय में राम, वही अयोध्या’ भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि जिस हृदय में राम निवास करते हैं, वही अयोध्या है। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति ‘सोई अवध जहं राम निवासू’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अयोध्या के आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक स्वरूप हैं। तीर्थ नगरियों और सामान्य नगरों के अंतर को समझने के लिए सांस्कृतिक दृष्टि जरूरी है। अतीत से विषय लेकर वर्तमान को देखता है रचनाकार हिंदी साहित्य के विद्वान आचार्य डॉ. जनार्दन उपाध्याय ने कहा कि रचनाकार अपनी श्रेष्ठ रचनाओं के विषय अतीत से लेता है, वर्तमान को बारीकी से देखता है और भविष्य की संभावनाओं को सामने रखता है। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महानगर संघचालक प्रो. विक्रमा प्रसाद पांडेय सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।

