उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और ‘डीपफेक’ के दौर में अपराधी कितना भी तकनीक का आवरण ओढ़ ले, राज्य की वैज्ञानिक और विधिक क्षमता उसे खोज निकालेगी। मुख्यमंत्री लखनऊ स्थित उप्र राज्य फॉरेंसिक विज्ञान संस्थान में आयोजित तीन-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘टेक संगम 2026’ के दूसरे दिन के कार्यक्रम का उद्घाटन कर रहे थे। योगी ने कहा, ‘‘एआई हमारे लिए मददगार हो सकता है, लेकिन उसे निर्णायक नहीं बनना चाहिए।
प्रौद्योगिकी का संचालन मानव विवेक से होना चाहिए, न कि मनुष्य तकनीक के विवेक पर निर्भर हो जाए। पूरी तरह एआई पर निर्भरता भविष्य में संकट बन सकती है।’’
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्यों, फॉरेंसिक जांच और आधुनिक तकनीक के समन्वय से अपराध अनुसंधान को प्रभावी बनाने के साथ न्याय मिलने में होने वाली देरी को भी कम किया जा सकेगा। एक बयान के मुताबिक, इस अवसर पर उन्होंने क्वांटम फॉरेंसिक्स और विधिक अनुपालन के क्षेत्र में कार्य करने वाले सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का शुभारंभ किया।
साथ ही कंसेंट मैनेजमेंट पोर्टल लॉन्च किया, अभेद्य परियोजना की आधारशिला रखी और एआई इन कंस्ट्रक्शन पुस्तक का अनावरण किया। सम्मेलन में साइबर सुरक्षा, डिजिटल साक्ष्य, क्वांटम तकनीक, फॉरेंसिक विज्ञान और एआई के न्यायिक एवं प्रशासनिक उपयोग पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। मुख्यमंत्री ने प्रदेश में कानून-व्यवस्था में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए बताया, ‘‘करीब 100 एकड़ की जिस जमीन पर आज विश्वस्तरीय फॉरेंसिक संस्थान खड़ा है, उस पर कभी लखनऊ के एक बड़े भू-माफिया का कब्जा था।
उस समय पुलिस भी इस मामले में प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रही थी। वर्ष 2017 में पुलिस अधिकारियों से इसकी जानकारी मिलने के बाद जांच कराई गई और भू-माफिया के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई। दूसरी प्राथमिकी दर्ज होते ही उसने आत्मसमर्पण कर जमीन छोड़ दी।’’
आदित्यनाथ ने कहा कि एक दशक पहले लखनऊ में साइबर फॉरेंसिक और क्वांटम तकनीक जैसे विषयों पर चर्चा करना भी सपने जैसा लगता था।
आज उसी जमीन पर बना संस्थान प्रदेश में वैज्ञानिक जांच, आधुनिक अपराध अनुसंधान और तकनीकी शिक्षा को नई दिशा दे रहा है। फॉरेंसिक विज्ञान की उपयोगिता समझाते हुए मुख्यमंत्री ने लोकप्रिय टीवी सीरियल सीआईडी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि पहले लोग टेलीविजन पर देखते थे कि एक बाल या फिंगरप्रिंट के आधार पर अपराधी तक कैसे पहुंचा जाता है, लेकिन अब फॉरेंसिक विज्ञान और आधुनिक तकनीक की मदद से ऐसी जांच वास्तविक जीवन में संभव हो रही है।
न्याय मिलने में देरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक माफिया के मामले का जिक्र किया, जिसने वर्ष 1980 में पहला अपराध किया था, लेकिन साक्ष्यों के अभाव और डीएनए नमूने नष्ट होने के कारण उसे वर्ष 2022 में, यानी 42 साल बाद सजा मिल सकी। उन्होंने कहा कि यह उदाहरण बताता है कि अपराध की जांच में वैज्ञानिक साक्ष्य कितने महत्त्वपूर्ण हैं और समय पर साक्ष्य जुटाना न्याय प्रक्रिया के लिए क्यों जरूरी है। मुख्यमंत्री ने बताया कि नए आपराधिक कानूनों के तहत सात वर्ष से अधिक की सजा वाले अपराधों में फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाने पर विशेष जोर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए प्रदेश की सभी 18 पुलिस रेंज में फॉरेंसिक लैब विकसित की जा रही हैं, जिनमें से 12 लैब तैयार हो चुकी हैं, जबकि छह अन्य अंतिम चरण में हैं। आदित्यनाथ ने कहा कि इसके अतिरिक्त 150 से अधिक फॉरेंसिक वैन तैनात की गई हैं, जिससे घटनास्थल पर पहुंचकर साक्ष्य जुटाने और जांच को गति देने में मदद मिलेगी, जिसका उद्देश्य है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर विवेचना मजबूत हो और न्यायालयों में मामलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी कम हो। उन्होंने उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस की लॉ विद लैब्स यानी कानून और प्रयोगशाला के समन्वय की अवधारणा को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि विज्ञान और कानून को एक-दूसरे का पूरक बनना होगा।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक जांच की विश्वसनीयता और विधिक प्रक्रिया के अनुरूप साक्ष्यों का उपयोग न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाता है। वर्तमान दौर में डेटा और तकनीक विकास को प्रमुख आधार बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश एआई और डेटा सेंटर के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रदेश में पांच गीगावाट डेटा सेंटर क्षमता विकसित करना है एवं इसके लिए पांच बड़े ‘‘डेटा सेंटर क्लस्टर’’ विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
आदित्यनाथ ने नोएडा में उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब यूनिट स्थापित किए जाने का भी उल्लेख किया। मुख्यमंत्री के अनुसार, डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और एआई जैसे क्षेत्रों में निवेश से प्रदेश की तकनीकी क्षमता बढ़ेगी और नए अवसर पैदा होंगे। औद्योगिक विकास और निवेश के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 1947 से 2017 तक उत्तर प्रदेश में करीब 14 हजार उद्योग स्थापित हुए थे, जबकि 2017 के बाद 35 हजार नए उद्योग लगे हैं।
उन्होंने इस बदलाव का संबंध बेहतर कानून-व्यवस्था और निवेश के अनुकूल माहौल से जोड़ा। मुख्यमंत्री के मुताबिक, प्रदेश के पास करीब 75 हजार एकड़ का लैंड बैंक है और 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। लखनऊ स्थित एचसीएल सेंटर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 में वहां करीब 100 कर्मचारी काम करते थे, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 12,600 हो गई है।
उन्होंने कहा कि महिलाएं भी रात की शिफ्ट में काम कर रही हैं। मुख्यमंत्री ने इसे सुरक्षा के माहौल में आए बदलाव और महिलाओं की बढ़ती कार्यभागीदारी के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस के संस्थापक निदेशक डॉ. जी.के. गोस्वामी ने संस्थान की स्थापना और उपलब्धियों की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक अगस्त 2021 को इस संस्थान की आधारशिला रखी थी और इसमें डीएनए, साइबर और डिजिटल फॉरेंसिक सहित आधुनिक तकनीकी प्रयोगशालाएं विकसित की गई हैं। उन्होंने कहा कि यहां एआई, रोबोटिक्स और अन्य उभरती तकनीकों के माध्यम से अपराध अनुसंधान को मजबूत करने पर काम किया जा रहा है।

