अगले साल सत्ता का सबसे बड़ा दंगल उत्तर प्रदेश में देखने को मिलेगा। 2027 के फरवरी-मार्च में होने वाले विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अभी से बढ़ने लगी है। इसमें बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की भी एंट्री हो गई है। पार्टी की UP इकाई ने विधानसभा की सभी 403 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। करीब 21% दलित आबादी वाले UP में चिराग पासवान अकेले क्यों चुनाव लड़ेंगे। कहीं उसके पीछे भाजपा का दिमाग तो नहीं। क्या भाजपा बिहार में चिराग की सहनी वाली हालत करेगी। इन्हीं सवालों का जवाब आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। सवाल-1ः चिराग पासवान की पार्टी LJP(R) क्या UP में चुनाव लड़ेगी? जवाबः हां। पूर्वी UP के LJP(R) अध्यक्ष राजीव पासवान ने 6 मार्च को प्रयागराज में अकेले विधानसभा की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। राजीव पासवान ने स्पष्ट किया कि केंद्र में हमारी पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन में है, लेकिन उत्तर प्रदेश में किसी भी दल के साथ कोई गठबंधन नहीं किया जाएगा। पार्टी ‘यूपी फर्स्ट, यूपी वाले फर्स्ट’ के मिशन के साथ मैदान में उतरेगी और पूरी मजबूती से चुनाव की तैयारी कर रही है। हालांकि, पार्टी अध्यक्ष और मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री चिराग पासवान ने अब तक चुनाव लड़ने का ऐलान नहीं किया है। सवाल-2ः UP में अकेले चुनाव क्यों लड़ेगी LJP(R)? जवाबः चिराग के चुनाव लड़ने के पीछे 2 बड़ी स्ट्रेटजी हो सकती है। 1. मायावती के ढलान का फायदा उठाना चाहते हैं चिराग पासवान युवा हैं। लंबा राजनीतिक सफर है। उनके पिता दिवंगत रामविलास पासवान की पकड़ भले बिहार की राजनीति पर रही, लेकिन उनकी पहचान दलितों के राष्ट्रीय स्तर के नेता की भी थी। मायावती की उम्र हो रही है और वह अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे कर रही हैं। मायावती के बाद इस वक्त हिन्दी पट्टी में दलितों का कोई देशव्यापी चेहरा नहीं है। युवा नेता हैं तो उनकी पकड़ सीमित एरिया में ही है। चिराग उस स्पेस को भरने का प्रयास करना चाहते हैं। 2. दलित वोटरों को बांटकर भाजपा को पहुंचा सकते हैं फायदा चिराग पासवान के UP में चुनाव लड़ने के पीछे भाजपा की स्ट्रेटजी की संभावना है। दरअसल, भाजपा को दलित वोटरों के मायावती, सपा-कांग्रेस की तरफ जाने की आशंका है। 2024 लोकसभा चुनाव का रिजल्ट इसका उदाहरण है… लखनऊ के सीनियर जर्नलिस्ट शरत प्रधान कहते हैं, ‘2024 लोकसभा चुनाव में जिस आक्रामक तरीके से राहुल गांधी ने प्रचार की शुरुआत की और ‘संविधान खतरे में है’ का नैरेटिव सेट किया, उसका फायदा सपा को भी मिला। बड़ी संख्या में कांग्रेस की वजह से दलित वोटर्स INDIA के पक्ष में लामबंद हुए।’ सीनियर जर्नलिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव के झटके के बाद भाजपा UP में दलितों के बीच अलग-अलग प्लेयर खड़ा करना चाहती है। ताकि वोटों का बंटवारा हो। उसी कड़ी का हिस्सा चिराग पासवान हो सकते हैं।’ चिराग भाजपा के लिए उपयोगी कैसे, फैक्ट से समझिए… सवाल-3ः UP में अकेले चुनाव लड़ने का असर बिहार और केंद्र में गठबंधन पर पड़ेगा? जवाबः नहीं। चिराग पासवान बिहार में एक फैक्टर हैं, UP में नहीं। बिहार में साथ लड़ने पर भाजपा को फायदा है, लेकिन UP में अकेले लड़ने से फायदा है। पॉलिटिकल एनालिस्ट केके लाल कहते हैं, ‘चिराग बहुत समझधार पॉलिटिशन हैं। उन्होंने अब तक जितने भी स्टेप उठाए हैं, उससे उनको फायदा ही हुआ है। वह अगर UP में चुनाव लड़ेंगे तो भाजपा की टॉप लीडरशिप से सलाह लेकर ही लड़ेंगे।’ केके लाल कहते हैं, ‘अगर भाजपा को लगेगा कि चिराग के लड़ने से नुकसान हो रहा है तो वह उन्हें रोक सकती है। वह भाजपा की बात भी मान जाएंगे। ऐसे में चिराग पासवान के UP में चुनाव लड़ने का बिहार और केंद्र के गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।’ सवाल-4ः क्या चिराग का बिहार में मुकेश सहनी वाला हाल होगा? जवाबः नहीं। इसे ऐसे समझिए… सहनी ने NDA के वोट बैंक में लगाई सेंध मुकेश सहनी निषाद समाज से आते हैं। UP में निषाद समाज की आबादी करीब 4.5% है। वहां इस समाज का प्रतिनिधित्व निषाद पार्टी करती आई है। निषाद पार्टी भाजपा की सहयोगी पार्टी है। या यूं कहे UP में निषाद समाज NDA का वोट बैंक हैं। चिराग दलितों में ही करेंगे सेंधमारी, जो मायावती के वोटर चिराग पासवान दलित समुदाय से आते हैं। UP में दलित पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी BSP (बहुजन समाज पार्टी) के कोर वोटर हैं। भाजपा, सपा और कांग्रेस उनके वोट बैंक में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश कर रही है। सवाल-5ः UP में दलितों पर कौन सी पार्टी क्या दांव चल रही? जवाबः उत्तर प्रदेश में दलितों की कुल आबादी 20.7% (करीब 4.14 करोड़) है। दलितों के लिए 84 विधानसभा सीटें रिजर्व हैं। करीब 120 सीटों पर दलित वोटर्स 1 लाख से अधिक हैं। दलितों में जाटव सबसे प्रभावशाली और एकजुट हैं। BSP के ये कोर वोटर माने जाते हैं। गैर-जाटव दलित (पासी, कोरी, धोबी, खटिक, वाल्मिकी आदि) में बंटवारा ज्यादा है। BJP ने 2017-2022 में गैर-जाटव को साधकर अपनी वोट बैंक बढ़ाया था। 2024 लोकसभा में गैर-जाटव कुछ हद तक इंडिया गठबंधन की ओर गए। इससे भाजपा को नुकसान हुआ। सिर्फ 33 सांसद जीत पाए। UP में दलितों के लिए पार्टियों की अपनी-अपनी रणनीति भाजपाः अंबेडकर प्रतिमा पर छत और सीधा संपर्क कांग्रेसः कांशीराम बने आइडल, संविधान खतरे में का नारा सपाः अंबेडकर जयंती के भव्य आयोजन की तैयारी अगले साल सत्ता का सबसे बड़ा दंगल उत्तर प्रदेश में देखने को मिलेगा। 2027 के फरवरी-मार्च में होने वाले विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अभी से बढ़ने लगी है। इसमें बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की भी एंट्री हो गई है। पार्टी की UP इकाई ने विधानसभा की सभी 403 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। करीब 21% दलित आबादी वाले UP में चिराग पासवान अकेले क्यों चुनाव लड़ेंगे। कहीं उसके पीछे भाजपा का दिमाग तो नहीं। क्या भाजपा बिहार में चिराग की सहनी वाली हालत करेगी। इन्हीं सवालों का जवाब आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। सवाल-1ः चिराग पासवान की पार्टी LJP(R) क्या UP में चुनाव लड़ेगी? जवाबः हां। पूर्वी UP के LJP(R) अध्यक्ष राजीव पासवान ने 6 मार्च को प्रयागराज में अकेले विधानसभा की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। राजीव पासवान ने स्पष्ट किया कि केंद्र में हमारी पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन में है, लेकिन उत्तर प्रदेश में किसी भी दल के साथ कोई गठबंधन नहीं किया जाएगा। पार्टी ‘यूपी फर्स्ट, यूपी वाले फर्स्ट’ के मिशन के साथ मैदान में उतरेगी और पूरी मजबूती से चुनाव की तैयारी कर रही है। हालांकि, पार्टी अध्यक्ष और मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री चिराग पासवान ने अब तक चुनाव लड़ने का ऐलान नहीं किया है। सवाल-2ः UP में अकेले चुनाव क्यों लड़ेगी LJP(R)? जवाबः चिराग के चुनाव लड़ने के पीछे 2 बड़ी स्ट्रेटजी हो सकती है। 1. मायावती के ढलान का फायदा उठाना चाहते हैं चिराग पासवान युवा हैं। लंबा राजनीतिक सफर है। उनके पिता दिवंगत रामविलास पासवान की पकड़ भले बिहार की राजनीति पर रही, लेकिन उनकी पहचान दलितों के राष्ट्रीय स्तर के नेता की भी थी। मायावती की उम्र हो रही है और वह अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे कर रही हैं। मायावती के बाद इस वक्त हिन्दी पट्टी में दलितों का कोई देशव्यापी चेहरा नहीं है। युवा नेता हैं तो उनकी पकड़ सीमित एरिया में ही है। चिराग उस स्पेस को भरने का प्रयास करना चाहते हैं। 2. दलित वोटरों को बांटकर भाजपा को पहुंचा सकते हैं फायदा चिराग पासवान के UP में चुनाव लड़ने के पीछे भाजपा की स्ट्रेटजी की संभावना है। दरअसल, भाजपा को दलित वोटरों के मायावती, सपा-कांग्रेस की तरफ जाने की आशंका है। 2024 लोकसभा चुनाव का रिजल्ट इसका उदाहरण है… लखनऊ के सीनियर जर्नलिस्ट शरत प्रधान कहते हैं, ‘2024 लोकसभा चुनाव में जिस आक्रामक तरीके से राहुल गांधी ने प्रचार की शुरुआत की और ‘संविधान खतरे में है’ का नैरेटिव सेट किया, उसका फायदा सपा को भी मिला। बड़ी संख्या में कांग्रेस की वजह से दलित वोटर्स INDIA के पक्ष में लामबंद हुए।’ सीनियर जर्नलिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव के झटके के बाद भाजपा UP में दलितों के बीच अलग-अलग प्लेयर खड़ा करना चाहती है। ताकि वोटों का बंटवारा हो। उसी कड़ी का हिस्सा चिराग पासवान हो सकते हैं।’ चिराग भाजपा के लिए उपयोगी कैसे, फैक्ट से समझिए… सवाल-3ः UP में अकेले चुनाव लड़ने का असर बिहार और केंद्र में गठबंधन पर पड़ेगा? जवाबः नहीं। चिराग पासवान बिहार में एक फैक्टर हैं, UP में नहीं। बिहार में साथ लड़ने पर भाजपा को फायदा है, लेकिन UP में अकेले लड़ने से फायदा है। पॉलिटिकल एनालिस्ट केके लाल कहते हैं, ‘चिराग बहुत समझधार पॉलिटिशन हैं। उन्होंने अब तक जितने भी स्टेप उठाए हैं, उससे उनको फायदा ही हुआ है। वह अगर UP में चुनाव लड़ेंगे तो भाजपा की टॉप लीडरशिप से सलाह लेकर ही लड़ेंगे।’ केके लाल कहते हैं, ‘अगर भाजपा को लगेगा कि चिराग के लड़ने से नुकसान हो रहा है तो वह उन्हें रोक सकती है। वह भाजपा की बात भी मान जाएंगे। ऐसे में चिराग पासवान के UP में चुनाव लड़ने का बिहार और केंद्र के गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।’ सवाल-4ः क्या चिराग का बिहार में मुकेश सहनी वाला हाल होगा? जवाबः नहीं। इसे ऐसे समझिए… सहनी ने NDA के वोट बैंक में लगाई सेंध मुकेश सहनी निषाद समाज से आते हैं। UP में निषाद समाज की आबादी करीब 4.5% है। वहां इस समाज का प्रतिनिधित्व निषाद पार्टी करती आई है। निषाद पार्टी भाजपा की सहयोगी पार्टी है। या यूं कहे UP में निषाद समाज NDA का वोट बैंक हैं। चिराग दलितों में ही करेंगे सेंधमारी, जो मायावती के वोटर चिराग पासवान दलित समुदाय से आते हैं। UP में दलित पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी BSP (बहुजन समाज पार्टी) के कोर वोटर हैं। भाजपा, सपा और कांग्रेस उनके वोट बैंक में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश कर रही है। सवाल-5ः UP में दलितों पर कौन सी पार्टी क्या दांव चल रही? जवाबः उत्तर प्रदेश में दलितों की कुल आबादी 20.7% (करीब 4.14 करोड़) है। दलितों के लिए 84 विधानसभा सीटें रिजर्व हैं। करीब 120 सीटों पर दलित वोटर्स 1 लाख से अधिक हैं। दलितों में जाटव सबसे प्रभावशाली और एकजुट हैं। BSP के ये कोर वोटर माने जाते हैं। गैर-जाटव दलित (पासी, कोरी, धोबी, खटिक, वाल्मिकी आदि) में बंटवारा ज्यादा है। BJP ने 2017-2022 में गैर-जाटव को साधकर अपनी वोट बैंक बढ़ाया था। 2024 लोकसभा में गैर-जाटव कुछ हद तक इंडिया गठबंधन की ओर गए। इससे भाजपा को नुकसान हुआ। सिर्फ 33 सांसद जीत पाए। UP में दलितों के लिए पार्टियों की अपनी-अपनी रणनीति भाजपाः अंबेडकर प्रतिमा पर छत और सीधा संपर्क कांग्रेसः कांशीराम बने आइडल, संविधान खतरे में का नारा सपाः अंबेडकर जयंती के भव्य आयोजन की तैयारी


