ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों और उसके पलटवार में खाड़ी देशों पर हुए भीषण हमलों ने पश्चिम एशिया की कूटनीति को निर्णायक मोड़ दे दिया है। इस युद्ध के बाद से इस्लामिक एकजुटता का भ्रम टूट चुका है और खाड़ी देशों के बीच फूट खुलकर सामने आ गई है। UAE ने 8 अप्रैल तक 537 बैलिस्टिक मिसाइलों और 2,256 ड्रोनों को इंटरसेप्ट करने का दावा किया, लेकिन इसके बावजूद उसे अरब देशों से अपेक्षित राजनीतिक समर्थन नहीं मिला।
ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध से खाड़ी देशों में फूट
ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध की वजह से पैदा हुए तनावपूर्ण माहौल एवं बदलते परिवेश में UAE ने बड़ा निर्णय लिया है। हाल ही में जेद्दा में GCC की बैठक के दौरान UAE ने ओपेक (OPEC) और ओपेक प्लस संगठन छोड़ने का ऐलान किया है। अबू धाबी ने इस फैसले को अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों से जोड़ा है, जिसे सऊदी वर्चस्व को सीधी चुनौती माना जा रहा है। बता दें कि ओपेक (Organization of the Petroleum Exporting Countries) पेट्रोलियम निर्यातक देशों का एक स्थायी संगठन है। अभी तक ओपेक में सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, वेनेजुएला, अल्जीरिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, लीबिया, नाइजीरिया और संयुक्त अरब अमीरात शामिल थे। अब UAE इस संगठन से अलग हो गया है।
सऊदी-UAE प्रतिद्वंद्विता और बढ़ती फूट
UAE द्वारा ओपेक छोड़ने के फैसले के पीछे दोनों देशों के बीच पहले से चल रही प्रतिस्पर्धा भी अहम मानी जा रही है। सऊदी अरब और UAE के बीच तनाव अब कई मोर्चों पर गहराता दिख रहा है। यमन में जहां रियाद हूतियों से समझौता चाहता है, वहीं अबू धाबी अलगाववादियों का समर्थन कर रहा है। सूडान में UAE ‘RSF’ के साथ है, जबकि सऊदी अरब सेना का समर्थन कर रहा है। यमन के मुकाला पोर्ट पर सऊदी हमले और इसके बाद UAE की सैन्य वापसी ने दोनों देशों के रिश्तों में दरार और बढ़ा दी। तेल के मोर्चे पर UAE का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता का संकेत है, जहां आर्थिक हितों के साथ सुरक्षा अब केंद्रीय चिंता बनकर उभर रही है।
ईरान का उभार, बदलता पावर स्ट्रक्चर
ईरान युद्ध के दौरान अधिकांश पश्चिम एशियाई देश अमेरिकी कार्रवाई के खिलाफ एकजुट नहीं हुए, जिससे ‘इस्लामिक उम्माह’ की अवधारणा कमजोर पड़ी है। इसकी झलक हालिया हमलों में भी नजर आई है। जब स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का इस्तेमाल कर खाड़ी देशों को सीधे दबाव में लाया गया और उनके भीतर स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर न केवल ईरान ने अपनी सामरिक क्षमता दिखाई, बल्कि अमरीकी सुरक्षा ढांचे की सीमाएं भी उजागर कर दीं। इससे उसकी क्षेत्रीय ताकत और प्रभाव बढ़ा है।
अमेरिका-इजरायल से संबंध मजबूत कर रहा UAE
UAE अब सऊदी नेतृत्व वाले ढांचे से हटकर अमरीका और इजरायल के साथ अपने संबंध और मजबूत कर रहा है, ताकि सुरक्षा, वित्तीय और रणनीतिक समर्थन सुनिश्चित किया जा सके। क्षेत्र में अब ईरान, सऊदी अरब और यूएई के बीच ‘त्रिकोणीय शक्ति संघर्ष’ स्पष्ट रूप से उभर रहा है।
इस भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर तेल आपूर्ति पर भी दिख रहा है। मार्च में ओपेक के उत्पादन में 7.88 मिलियन बैरल प्रतिदिन की भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि हॉर्मुज बंद होने से यूएई का उत्पादन 44% घटकर 1.9 मिलियन बैरल रह गया। ओपेक से बाहर निकलकर यूएई 2027 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन क्षमता हासिल कर स्वतंत्र रूप से बाजार को प्रभावित करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
आर्थिक रूप से सबसे समृद्ध खाड़ी देश
- सऊदी अरब-1.39 ट्रिलियन डॉलर
- यूएई- 552 बिलियन डॉलर
- इराक- 264 बिलियन डॉलर
- कतर- 220 बिलियन डॉलर
- ओमान-113 बिलियन डॉलर
- बहरीन – 48 बिलियन डॉलर
ओपेक के अनुसार, बड़े तेल भंडार वाले खाड़ी देश
- सऊदी अरब- 267 अरब बैरल
- ईरान- 209 अरब बैरल
- इराक-145 अरब बैरल
- यूएई- 113 अरब बैरल
- कुवैत- 102 अरब बैरल
- कतर- 25 अरब बैरल


