जयपुर के महात्मा गांधी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक 63 साल के मरीज के वॉल्व रिप्लेसमेंट करके नई जिंदगी दी है। सर्जरी में मरीज के सीने में करीब 5 सेमी. का चीरा लगाया गया और वहां से ट्रांस आर्टिक विधि से वॉल्व का सफल ट्रांसप्लांट किया गया। हॉस्पिटल के हृदय रोग विभागाध्यक्ष डॉ. राजीव शर्मा ने बताया- मरीज गंभीर ऑर्टिक वाल्व में लीकेज और खराब हृदय पंपिंग क्षमता से पीड़ित था। वो मुख्य आर्टरी के वॉल्व के रिप्लेसमेंट की सर्जरी के लिए हॉस्पिटल पहुंचा था, लेकिन उसकी स्थिति बहुत क्रिटिकल थी। मरीज लंबे समय से अत्यधिक सांस फूलना, चक्कर आना, बेहोशी के दौरे और हृदय गति बढ़ने जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा था। मरीज की गंभीरता को समझते हुए उसका टावी तकनीक से वॉल्व रिप्लेसमेंट का फैसला किया। नई तकनीक से पहली बार ऑपरेशन वरिष्ठ हृदय शल्य चिकित्सक डॉ. अजय मीणा ने बताया- ऑर्टिक वॉल्व लीकेज के लिए देश में आई “हैंकोर वाल्व प्रणाली” की मदद ली गई। यह प्रणाली विशेष रूप से ऑर्टिक वॉल्व लीकेज के लिए विकसित की है। यह प्रणाली अपनी खास तकनीक के माध्यम से बिना कैल्सियम जमाव वाले अथवा अत्यंत कम जमाव वाले मरीजों में भी सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट की जा सकती है। इस प्रणाली की सफलता दर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करीब 96 प्रतिशत है। इसलिए लगाना पड़ा चीरा डॉ. अजय मीणा ने बताया- मरीज की जांघ की धमनियां अत्यधिक क्षतिग्रस्त थी, ऐसे में इस जगह से वॉल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी करना बड़ा चुनौतीपूर्ण था। इसके बाद हमारी टीम ने दाहिनी ओर सीने में पांच सेमी के छोटे चीरे से ट्रांस आर्टिक विधि से सफलतापूर्वक वॉल्व रिप्लेस किया। उन्होंने बताया कि मरीज पूरी तरह स्थिर है, तेजी से स्वस्थ हो रहा है तथा शीघ्र ही उसे हॉस्पिटल से छुट्टी दी जाएगी। इस सर्जरी में डॉ. अजय मीणा के साथ डॉ. सौरभ गुप्ता, डॉ. आशीष जैन, डॉ. अभिनव, डॉ. वरुण छाबड़ा और टावी एक्सपर्ट डॉ. प्रशांत वैजनाथ, डॉ. ए. बी. गोपाला मुरुगन का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
महात्मा गांधी मेडिकल यूनिवर्सिटी के चेयरपर्सन डॉ. विकास चंद्र स्वर्णकार ने इस ऐतिहासिक सफलता पर सम्पूर्ण हृदय चिकित्सा टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि न केवल संस्थान बल्कि सम्पूर्ण देश के लिए गौरव का विषय है।


