दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को ‘अंसल थियेटर एंड क्लबोटल्स (प्राइवेट) लिमिटेड’ को नोटिस जारी किया। यह नोटिस आयकर विभाग द्वारा दायर एक अपील के संबंध में है, जिसमें आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) के आदेश को चुनौती दी गई है। यह मामला ‘उपहार सिनेमा अग्निकांड’ मामले में दिए गए मुआवजे से जुड़े उस खर्च से जुड़ा है, जिसका दावा अंसल ने किया था। जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद और जस्टिस रेनू भटनागर की खंडपीठ ने इस अपील पर नोटिस जारी किया है। मामले की सुनवाई के लिए 5 फरवरी, 2027 की तारीख तय की गई है। आयकर विभाग की ओर से सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल विपुल अग्रवाल पेश हुए। आयकर विभाग, अंसल थिएटर्स एंड क्लबोटल्स (प्राइवेट) लिमिटेड के मामले में असेसमेंट ईयर 2014-15 के लिए आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) के 22 नवंबर, 2023 के आदेश को चुनौती दे रहा है।
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बताया गया है कि यह विवाद कंपनी द्वारा किए गए उन खर्चों से जुड़ा है, जो उपहार सिनेमा अग्निकांड के मुआवजे और उससे जुड़ी कानूनी कार्यवाही के कारण हुए थे। 13 जून 1997 को, दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में ‘बॉर्डर’ फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान आग लग गई थी, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई और 103 अन्य लोग घायल हो गए। इस त्रासदी के बाद पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवजा देने, और सिनेमा मालिकों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर लंबी कानूनी कार्यवाही चली। आयकर विभाग ने बताया कि असेसमेंट ईयर 2014-15 के लिए, कंपनी ने लगभग 10.45 करोड़ रुपये की कटौती (डिडक्शन) का दावा किया था। इसमें त्रासदी से जुड़े मुआवजे के लिए 8.81 करोड़ रुपये और कानूनी व पेशेवर खर्चों के लिए 1.65 करोड़ रुपये शामिल थे। आयकर विभाग ने इस पूरे दावे को खारिज कर दिया। विभाग का मानना था कि कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि ये खर्च आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 37(1) के तहत पूरी तरह और विशेष रूप से व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किए गए थे। आयकर आयुक्त (अपील) ने भी इस दावे को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा।
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हालाँकि, ITAT ने करदाता कंपनी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और ‘मुआवजे के तौर पर दिए जाने वाले हर्जाने’ (compensatory damages) तथा ‘दंड के तौर पर दिए जाने वाले हर्जाने’ (punitive damages) के बीच अंतर किया। ITAT ने निर्देश दिया कि ‘दंड के तौर पर दिए जाने वाले हर्जाने’ के 25 लाख रुपये को छोड़कर बाकी अस्वीकृत राशि (disallowance) को हटा दिया जाए। साथ ही, कंपनी द्वारा किए गए कानूनी और पेशेवर खर्चों को भी स्वीकार कर लिया गया। विभाग ने इस बात पर जोर दिया है कि विवाद का एक बड़ा हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के 13 अक्टूबर 2011 के उस फैसले से जुड़ा है, जो ‘म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम एसोसिएशन ऑफ विक्टिम्स ऑफ उपहार ट्रेजेडी’ मामले में आया था। इस फैसले में कहा गया था कि ‘दंड के तौर पर दिए जाने वाले हर्जाने’ को ‘नकारात्मक प्रतिपूर्ति’ (negative restitution) के रूप में स्वीकार किया जा रहा है, क्योंकि “लाइसेंसधारी न केवल मौत और चोटों के लिए मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार है, बल्कि उसे अपने अवैध कार्यों से मिले मुनाफे या लाभ से भी वंचित किया जाना चाहिए।

