इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल में कथित मस्जिद में रमजान में अधिक लोगों को नमाज़ पढ़ने से रोकने को लेकर दाखिल याचिका निस्तारित कर दी। कोर्ट ने कहा है कि फोटोग्राफ से स्पष्ट है कि वह स्थल मस्जिद नहीं है। याचियों को निर्देश दिया है कि 1995 से चली आ रही परंपरा का कड़ाई से पालन करें। कोर्ट ने कहा कि याची ने सही जानकारी नहीं दी थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी को भी अपने विश्वास व आस्था के अनुरूप निजी संपत्ति या धार्मिक स्थल पर पूजा करने या नमाज पढ़ने का अधिकार है, इसपर कोई रोक नहीं है। यदि कोई इसमें बाधा डालता है तो सरकार संज्ञान लेगी और जरूरत के अनुसार स्थल व पूजा करने वाले लोगों को सुरक्षा देगी। सरकार ने भी हाईकोर्ट में साफ कहा कि किसी की निजी संपत्ति में पूजा या नमाज पढ़ने पर सरकार हस्तक्षेप नहीं करती। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन तथा न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह आदेश मुनाजिर खान की याचिका पर दिया है। राज्य पूजा, नमाज में हस्तक्षेप या बाधा नहीं डालेगा कोर्ट ने कहा राज्य ने एक बार फिर वही बात दोहराई है जो उसने पहले भी कही थी कि राज्य किसी भी संप्रदाय द्वारा अपनी निजी संपत्तियों में या अपने-अपने पूजा स्थलों पर की जाने वाली पूजा में हस्तक्षेप या बाधा नहीं डालेगा। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 की व्याख्या को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत में इस्लामी धर्म के अनुयायियों को कोई विशेष दर्जा प्राप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि अनुच्छेद 25 भारत में प्रत्येक धर्म और आस्था को अपने धर्म को मानने (अपनी आस्था घोषित करने), उसका आचरण करने (रीति-रिवाज, प्रार्थना, समारोह आयोजित करने और त्योहार मनाने) और उसका प्रचार करने का समान और अपरिवर्तनीय अधिकार देता है;। यह अधिकार बिना किसी “किंतु-परंतु” के सभी पर समान रूप से लागू होता है।, बशर्ते यह लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन हो। कोर्ट ने कहा यह अनुच्छेद 25 ऐसे कार्यों और भाषणों को भी प्रतिबंधित करता है जिनमें एक धार्मिक संप्रदाय को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करके लोक व्यवस्था को बिगाड़ने की प्रवृत्ति हो।; ऐसा निषिद्ध कार्य अनुच्छेद 25 के संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा और उस व्यक्ति को आपराधिक कानून की पूरी कठोरता का सामना करना पड़ेगा। कोर्ट ने कहा यह अधिकार एक नास्तिक को भी लॉजिक, कारण और साइंस के आधार पर यह मानने, प्रैक्टिस करने और उसे फैलाने में मदद करता है कि कोई भगवान नहीं है। इंसानियत वाले इस रिपब्लिक देश की यही शान कोर्ट ने कहा धरती के 1.4 अरब इंसानियत वाले इस रिपब्लिक देश की शान इसके लचीलेपन और उस ताकत में है, जो इसकी ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता से आती है,। इस धरती पर कोई भी दूसरे देश की तरह नहीं का नहीं है, जहाँ हर धर्म, संस्कृति और अलग-अलग भाषाएँ सदियों से शांति, मेल-जोल और आपसी सम्मान के साथ साथ रही हैं।, जिसे भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के लागू होने के बाद औपचारिक रूप दिया गया है। कोर्ट ने आदेश की प्रति डी जी पी व अपर मुख्य सचिव गृह को भेजने का भी निर्देश दिया है। इससे पहले कोर्ट ने 20 से अधिक लोगों को नमाज़ पढ़ने से रोकने पर खड़ा रूख अपनाया था और राज्य सरकार को स्थल का फोटोग्राफ सहित हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार की तरफ से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कोर्ट को वास्तविकता की जानकारी दी और कहा कि याची ने नहीं बताया कि किस अधिकारी ने ऐसा आदेश दिया है।जिसे मस्जिद बताया ,उसपर दो अन्य लोगों का नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज है। जबकि याची ने। हलफनामा दाखिल कर कहा कि 1995 में उसके बाबा छिद्दा खान ने मस्जिद बनाई थी,वक्फ भी किया है। जमीन उसके कब्जे में है।एक कमरे में नमाज पढ़ी जाती रही है। कोर्ट ने दाखिल फोटोग्राफ देखने के बाद कहा स्थल मस्जिद नहीं है।बाईं तरफ दो मंजिला भवन है और दाईं तरफ दो बेडरूम बने हैं, जिसमें नमाज पढ़ी जाती है। जिसमें किसी द्वारा अवरोध नहीं उत्पन्न किया गया। 17 मार्च को कोर्ट प्रशासन का आदेश रद्द कर नमाज की अनुमति दी थी संभल की एक मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित करने के जिला प्रशासन के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को नमाज के समय सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम करने का आदेश दिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति नमाज में बाधा डालता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने फैसला संभल के रहने वाले मुनाजिर खान की याचिका पर सुनाया। याचिका पर पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संभल DM और SP को फटकार लगाई थी। कहा था- प्रशासन मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित नहीं कर सकता। अगर डीएम राजेंद्र पेंसिया और एसपी केके विश्नोई को लगता है कि वे कानून व्यवस्था नहीं संभाल पा रहे, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर ट्रांसफर करवा लेना चाहिए। कोर्ट ने कहा था- यह राज्य का कर्तव्य है कि वह सुनिश्चित करे कि हर समुदाय निर्धारित पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा कर सके। अगर वह निजी संपत्ति है, तो राज्य से किसी इजाजत की जरूरत नहीं। कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि राज्य का दखल सिर्फ वहीं जरूरी है, जहां प्रार्थना या धार्मिक काम सार्वजनिक भूमि पर आयोजित किए जाने हों। याचिकाकर्ता मुनाजिर खान ने याचिका में कहा था कि पिछले साल फरवरी में हयातनगर थाने से पुलिसवाले आए। कहा कि सिर्फ 20 लोग ही मस्जिद में नमाज पढ़ सकते हैं। एक बार में 5-6 लोग ही नमाज अदा करें। इसके बाद मुनाजिर ने 18 जनवरी, 2026 को हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 27 फरवरी को पहली सुनवाई हुई। आज 16 मार्च को हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया। सरकारी वकील की दलील- कानून व्यवस्था न बिगड़े, इसलिए प्रशासन ने रोका याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि रमजान के दौरान मस्जिद में नमाज अदा करने से रोका जा रहा। रमजान चल रहा है। ऐसे में परिसर के भीतर नमाज अदा करने के लिए बड़ी संख्या में लोग आ सकते हैं। वहीं, सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने नमाजियों की संख्या सीमित करने का आदेश दिया था। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने सरकार के वकील के तर्क को खारिज कर दिया। 450 वर्गफीट में मस्जिद, मालिकाना हक दूसरे के नाम पर दरअसल, हयातनगर गांव में 2700 से ज्यादा लोग रहते हैं। यहां 450 वर्गफीट में घोसिया नाम की मस्जिद है। प्रशासन के मुताबिक, जमीन का गाटा नंबर- 291 है। डॉक्यूमेंट्स में यह जमीन मोहन सिंह और भूराज सिंह पुत्र सुखी सिंह के नाम पर है। अब संभल डीएम और एसपी के बारे में जानिए- बरेली के डीएम-एसएसपी हाईकोर्ट में तलब किए गए थे इससे पहले हाईकोर्ट ने घर में नमाज अदा करने से रोकने के मामले में बरेली के जिला मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को 23 मार्च को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया। कोर्ट ने साफ किया था कि अगर वे हाजिर नहीं होते तो गैर-जमानती वारंट जारी किया जाएगा। साथ ही कोर्ट ने याची को 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षा प्रदान करने का भी निर्देश दिया। यह आदेश भी जस्टिस अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने दिया था। कोर्ट ने मामले में पिछली सुनवाई पर बरेली के डीएम और एसएसपी को एक पुराने आदेश की अवहेलना करने के आरोप में अवमानना नोटिस जारी किया था। बरेली निवासी तारिक खान ने याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि गत 16 जनवरी को स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें उनके घर के अंदर नमाज अदा करने की अनुमति नहीं दी थी। यह कार्रवाई हाईकोर्ट के उस पूर्व आदेश का उल्लंघन है, जिसमें साफ किया गया था कि निजी परिसर में प्रार्थना के लिए प्रशासन की अनुमति जरूरी नहीं है। ———————— ये खबर भी पढ़िए- ओवैसी बोले- सुनो संभल DSP मुल्क आपके बाप का नहीं, इजराइली प्रधानमंत्री की भाषा बोल रहे संभल में CO कुलदीप कुमार का ‘जहाज में बैठकर ईरान चले जाओ’ वाला बयान तूल पकड़ता जा रहा है। AIMIM नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पलटवार करते हुए कहा- ये मुल्क आपके बाप का नहीं। तुम इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की जुबान बोल रहे हो। पूरी खबर पढ़िए


