बहरोड़ में दर्दनाक हादसा: जर्जर भवनों के कागजी सर्वे पर सवाल…

बहरोड़ में दर्दनाक हादसा: जर्जर भवनों के कागजी सर्वे पर सवाल…

बहरोड़ में जुड़वा बच्चों को बाइक से स्कूल छोड़ने जा रहे युवक की मकान का छज्जा गिरने से हुई मौत क्या महज एक हादसा है? क्या इस घटना को रोका जा सकता था? क्या इसे हत्या मानकर जर्जर मकानों का सर्वे करने वाले नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारियों पर आपराधिक केस दर्ज होना चाहिए? ऐसे कई सवालों की गूंज आज दिनभर बहरोड़, अलवर समेत तीनों जिलों में सुनाई दी। सवाल करने वाली आम जनता थी, लेकिन जिन्हें जवाब देना चाहिए, वे चुप्पी साधे रहे।

आयुक्त का अजीब तर्क

बहरोड़ नगर परिषद के आयुक्त नूर मोहम्मद खान का अजीब तर्क भी सुन लीजिए। वे कहते हैं कि हमने पूर्व में जर्जर भवनों का सर्वे कराया था। नोटिस भी दिए थे। हो सकता है कि जिस मकान के छज्जा गिरने से यह हादसा हुआ, वह मकान हमसे छूट गया हो। धन्य हैं ऐसे अफसर, जो अपने ही कागजी सर्वे पर सवाल उठा रहे हैं। दरअसल, यह घटना यह उस लापरवाही का नतीजा है, जो हमारे सिस्टम को अंदर से खोखला कर चुकी है। अफसर संवेदनहीन हो चुके हैं।

उदासीन अफसरशाही जिम्मेदार

राजनेताओं को सिर्फ इस बात से मतलब है कि उनके बताए काम हो जाएं, बाकि जनता अपना भला खुद सोचे। बहरोड़ जैसी घटनाएं प्रदेश में पहले भी होती रही हैं और लापरवाही का आलम यह रहा, तो हो सकता है कि आगे भी होती रहें। इसके लिए सीधे तौर पर हमारी उदासीन अफसरशाही जिम्मेदार है। ऐसे अफसरों को किसी भी सूरत में माफ नहीं किया जाना चाहिए। बहरोड़ के नगर परिषद आयुक्त के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज होना चाहिए, ताकि भविष्य के लिए यह नजीर बन सके।

सिर्फ कागजी सर्वे कब तक ?

बहरोड़ के लोगों को भी यह बात समझ लेनी चाहिए कि सिर्फ शिकायत करने से कुछ नहीं होगा। जनता के कहने से ही यदि सख्त कार्रवाईयां हो जातीं, तो ऐसी घटनाएं कब की रुक जातीं। यह घटना जर्जर भवनों के कागजी सर्वे पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। यह प्रदेश के उन तमाम शहरों-कस्बों व गांवों की शहरी निकायों के लिए भी सबक है, जहां ऐसे न जाने कितने जानलेवा भवन मौत का फन फैलाए खड़े हैं। आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोटपूतली-बहरोड़ की जिला कलक्टर इस घटना को लेकर कोई बड़ा एक्शन लेंगी?

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