Supreme Court ने नाबालिग होने पर रद्द की 20 साल पुरानी Conviction

Supreme Court ने नाबालिग होने पर रद्द की 20 साल पुरानी Conviction

नयी दिल्ली, दो सितंबर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक व्यक्ति की 20 साल पुरानी दोषसिद्धि यह कहते हुए रद्द कर दी कि ‘‘एक बच्चे को अपराधी नहीं माना जाना चाहिए।’’ कथित अपराध के समय व्यक्ति नाबालिग था। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रक्रिया के समाप्त होने और ‘‘तकनीकी बाध्यताओं’’ का इस्तेमाल किसी किशोर को कानून के तहत मिलने वाले लाभों से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कोई बच्चा किसी परिस्थितियों में फंसकर सामाजिक-आर्थिक या भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारणों से कभी-कभी अपराध की दुनिया की ओर आकर्षित हो जाता है।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने कहा, ‘‘राज्य की जिम्मेदारी है कि वह किशोरों को स्थायी रूप से कलंकित करने के बजाय उन्हें समाज में फिर से शामिल करे।’’
पीठ ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम के तहत नाबालिगों को उपलब्ध कानूनी संरक्षण के बारे में जागरूकता की कमी का उल्लेख किया और कहा कि ‘‘इस अदालत में पहली बार किशोर होने का दावा करने वाले मामलों की बढ़ती संख्या से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि संबंधित पक्षों के बीच कानून की समझ में बहुत बड़ा अंतर है।’’
शीर्ष अदालत ने अपीलकर्ता महावीर उर्फ अवनीश के खिलाफ फैसला पलटते हुए कहा कि ‘‘साक्ष्य मिटाने’’ के अपराध में उसकी दोषसिद्धि न केवल प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण थी, बल्कि कानूनी रूप से भी टिकाऊ नहीं थी। पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर ने मामले के तथ्यों का उल्लेख किया और किशोर कानून के क्रियान्वयन में बाधा डालने वाले एक गंभीर मुद्दे को रेखांकित किया। फैसले में कहा गया, ‘‘हमें याद रखना चाहिए कि औद्योगीकरण, शहरीकरण और प्रवासन के प्रभाव ने लोगों के दैनिक जीवन को बदल दिया।

इसके परिणामस्वरूप लोग ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन करने लगे और आबादी में भारी वृद्धि हुई… गरीबी, असमानता, निरक्षरता और भेदभावपूर्ण माहौल, जिसमें बच्चा बड़ा होता है, उसमें अपराधी व्यवहार को जन्म देते हैं और वह अपराध का शिकार बन जाता है।’’
पीठ ने कहा कि कानून की समझ को लेकर हितधारकों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। उसने कहा, ‘‘जांच अधिकारी आम तौर पर दोषी को सजा दिलाने के उद्देश्य में इस कदर लगे रहते हैं कि जिस अदालत के समक्ष किशोर को पेश किया जाता है, वह उसकी उम्र के आकलन पर पर्याप्त ध्यान नहीं देती।’’
पीठ ने कहा, ‘‘यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि बच्चे किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति हैं और उन्हें जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जो मानसिक रूप से सजग, शारीरिक रूप से स्वस्थ और नैतिक रूप से सुदृढ़ हों ताकि समाज की बेहतरी में योगदान दे सकें।’’
पीठ ने कहा कि बच्चों पर राज्य द्वारा किए गए खर्च का सबसे बड़ा प्रतिफल एक सशक्त मानव संसाधन के रूप में मिल सकता है, जो राष्ट्र की प्रगति में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हो। पीठ ने कहा, ‘‘निष्कर्ष रूप में, मौजूदा व्यवस्था को और मजबूत करने, जांच प्रक्रियाओं की प्रभावी निगरानी करने और वैधानिक प्रावधानों के क्रियान्वयन की जरूरत है।’’
यह मामला सितंबर 2004 का है, जब मध्य प्रदेश के मुरैना में एक महिला भूरी और उसकी नवजात बेटी के शव रेलवे पटरी पर मिलने के बाद मामला दर्ज किया गया था।

महावीर और उसके परिवार के सदस्यों पर हत्या, दहेज हत्या और भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के तहत साक्ष्य मिटाने के आरोप लगाए गए थे। वर्ष 2005 में गवाहों के मुकर जाने के बाद निचली अदालत ने परिवार के सदस्यों को हत्या और दहेज हत्या के आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, अदालत ने महावीर को भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

कई वर्ष बाद महावीर ने किशोर होने का दावा किया और कहा कि घटना के समय उसकी उम्र महज 17 वर्ष थी। किशोर न्याय बोर्ड की जांच में उसकी जन्मतिथि एक जुलाई 1987 पाई गई, जिससे यह साबित हुआ कि 2004 में वह नाबालिग था। हालांकि, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि चूंकि मामला पहले ही उच्चतम न्यायालय तक पहुंच चुका है था, इसलिए उसके पास अंतिम रूप ले चुके फैसले को ‘‘दोबारा खोलने’’ का अधिकार क्षेत्र नहीं। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय की ‘‘अति-सतर्कता’’ की आलोचना की और कहा कि उसने ‘‘रिकॉर्ड संबंधी त्रुटि’’ की है। पीठ ने स्पष्ट किया कि महावीर की पिछली याचिका उच्चतम न्यायालय में इस उद्देश्य से वापस ली गई थी कि किशोर होने का दावा विशेष रूप से उठाया जा सके।

इसलिए मामला अंतिम स्थिति में नहीं पहुंचा था जो अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलती को सुधारने से रोकती हो। पीठ ने दोहराया कि किशोर कानून की धारा 7ए के तहत किशोर होने का दावा किसी भी अदालत के समक्ष किसी भी समय उठाया जा सकता है, यहां तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी। उसने कहा कि राज्य और अदालतों का कर्तव्य है कि वे बच्चों के सर्वोत्तम हित में काम करें और यह सुनिश्चित करें कि ‘‘कानून की समझ में कमी’’ के कारण उन्हें कानूनी संरक्षण से वंचित न किया जाए।

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