GDP Growth Rate: पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इन दिनों सुर्खियों में हैं। उन्होंने मोदी सरकार की ओर से जारी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों पर सवाल उठा कर हंगामा खड़ा कर दिया है। गर्ग नौकरी में भी अपने काम से अक्सर चर्चा और विवादों में रहे। नौकरी के अंत में भी वह चर्चा में रहे, क्योंकि वह शांति से रिटायर नहीं हुए थे। उन्होंने नौकरी छोड़ी थी। वह भी वित्त मंत्री से विवाद की वजह से।
टीचर्स की हड़ताल के बावजूद स्कूलों में करवा दी थी परीक्षा
राजस्थान कैडर के अफसर सुभाष गर्ग जब एसडीओ थे तो उन्होंने उपजाऊ, मैदानी इलाकों में तैनात पटवारियों का तबादला बंजर, पहाड़ी इलाकों में करने का फैसला किया था। साथ ही, लंबे समय से एक ही काम देख रहे कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी भी बदल दी थी। आगे चल कर स्कूल के शिक्षकों के तबादले में भी उन्होंने यही फॉर्मूला अपनाया था। उन्होंने शिक्षकों की नियुक्ति के लिए इंटरव्यू में मार्क्स देने की व्यवस्था खत्म कर दी थी। उन्होंने शिक्षकों की हड़ताल के बावजूद स्कूलों में परीक्षा करवा ली, जिससे शिक्षक यूनियन के नेता काफी नाराज हुए थे।
नौकरी के दौरान कई बार हुआ तबादला
गर्ग को नौकरी के दौरान कई बार बिना बारी के तबादला भी झेलना पड़ा। उन्होंने अपनी किताब ‘नो मिनिस्टर’ में लिखा है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान राजसमंद में एक कला परिसर के उदघाटन के लिए कांग्रेस नेता गिरिजा व्यास को बुलाने से उन्होंने मना कर दिया था। इसके कुछ ही दिन बाद उनका तबादला कर दिया गया था। बकौल गर्ग, व्यास ने उनके काम की सराहना की थी और कहा था, ‘हमने आपके तबादले के लिए कहा क्योंकि आपका यहां बने रहना हमारे लिए ठीक नहीं होता।’
साल 2000 में आए दिल्ली
गर्ग की दिल्ली में पहली तैनाती साल 2000 में हुई थी। वित्त मंत्रालय के तहत आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) में निदेशक के रूप में। दिल्ली के दिनों को याद करते हुए उन्होंने लिखा है कि मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में इतने कमजोर हो गए थे कि तब की पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन निवेश से जुड़ी कैबिनेट कमिटी को भी 40 मिनट तक इंतजार करवा दिया करती थीं और उसके बाद पीएम को खबर भिजवा देती थीं कि वह अभी प्रोजेक्ट देख ही रही हैं।
गर्ग ने पी चिदंबरम को अपना सबसे अच्छा और मेहनती बॉस बताया। उन्हें याद करते हुए गर्ग ने बताया कि वह फ़ाइल पर स्पष्ट नोट लिखते थे और एक दिन से ज्यादा फ़ाइल अपने पास नहीं रखते थे।
दिल्ली से मूल राजस्थान कैडर में वापसी के बाद गर्ग ने वसुंधरा राजे के साथ भी काम किया। उनके मुख्यमंत्री रहते वह वित्त विभाग के प्रधान सचिव हुआ करते थे। जब अशोक गहलोत सीएम बने तो गर्ग को ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ पर भेज दिया गया।
2014 में जब नरेंद्र मोदी पीएम बने तो गर्ग को बड़ी अहम जिम्मेदारी मिली। उन्हें विश्व बैंक में भारत का ईडी चुना गया। गर्ग के लिए तो यह नियुक्ति रोमांचक और उत्साहित करने वाली थी, लेकिन राजे को यह अच्छा नहीं लगा, क्योंकि वह फिर से सीएम बन गई थीं और गर्ग को अपने साथ लाना चाहती थीं।
निर्मला सीतारमण से शुरू से ही नहीं बनी
2017 में एक बार फिर गर्ग की वित्त मंत्रालय में वापसी हुई। तब अरुण जेटली वित्त मंत्री थे। गर्ग आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव बनाए गए। वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री और पीएमओ के दोनों कद्दावर सेक्रेटेरी (नृपेंद्र मिश्रा और पीके मिश्रा) से उनकी अच्छी बनती थी। लेकिन यह बनाव ज्यादा दिन तक नहीं रहा। दो साल के भीतर ही कुछ ऐसा हुआ कि नृपेंद्र मिश्रा उनकी हर बात को काटने लगे। बीएसएनएल, एमटीएनएल के भविष्य का सवाल हो या किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की जगह आर्थिक मदद की व्यवस्था लागू करने का सुझाव हो, सारे मुद्दों पर उनकी दलील को मिश्रा काटने लगे। इसी बीच, मई 2019 में निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री बनीं। उनसे उनकी शुरू से ही नहीं बनी।
सीतारमण जब पहला बजट पेश करने वाली थीं, तो बजट भाषण बनाने में गर्ग ने काफी मेहनत की। इसको लेकर भी दोनों के बीच काफी मतभेद रहे। कुछ ही समय में नृपेंद्र मिश्रा ने उन्हें संकेत दे दिया कि सरकार की सोच से उनकी सोच अलग है, इसलिए उनका तबादला किया जाएगा। 2019 में 31 अक्टूबर को गर्ग ने वीआरएस ले लिया।


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“Subhash Chandra Garg was in the Finance Ministry.
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