भारतीय विश्वविद्यालय संघ (AIU) के शताब्दी वर्ष समारोह की शुरुआत पुणे में भव्य अंदाज में हुई। डॉ. डी.वाई. पाटिल विद्यापीठ में आयोजित इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य केंद्र बिंदु ‘ज्ञान और नवाचार के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत का निर्माण’ है। देश भर के विश्वविद्यालयों के कुलपति और शिक्षाविद इस मंथन में जुटे हैं कि कैसे उच्च शिक्षा को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जाए। एआईयू अध्यक्ष और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने शिक्षा के बदलते स्वरूप पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का मतलब केवल कल-कारखानों में उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका असली अर्थ ज्ञान, कौशल और नवाचार में स्वावलंबन है। प्रो. पाठक ने विश्वविद्यालयों को स्पष्ट संदेश दिया कि अब समय आ गया है जब शिक्षण संस्थानों को केवल डिग्री बांटने वाले केंद्रों से आगे बढ़कर ‘नवाचार का हब’ बनना होगा। उन्होंने आह्वान किया कि हमारे शिक्षण संस्थान ऐसे युवा तैयार करें जो केवल नौकरी मांगने वाले न हों, बल्कि नौकरी देने वाले (जॉब क्रिएटर) बनें। शिक्षा में शोध और स्टार्टअप संस्कृति की अहमियत सम्मेलन के दौरान इस बात पर आम सहमति बनी कि विश्वविद्यालयों को उद्योग जगत के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत करना होगा। स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देना और स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए शोध (रिसर्च) करना ही भारत को ग्लोबल लीडर बनाने की कुंजी है। प्रो. पाठक ने कहा कि यदि हम अपनी शिक्षा प्रणाली में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हैं, तो यह वैश्विक मंच पर भारत की एक अलग पहचान बनाएगा। समावेशी शिक्षा पर जोर,कोई पीछे न छूटे सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण मुद्दा डिजिटल विभाजन को खत्म करने का भी रहा। वक्ताओं ने माना कि आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी पूरा होगा जब शिक्षा की पहुंच अंतिम छोर पर बैठे छात्र तक होगी। ग्रामीण क्षेत्रों और वंचित वर्गों तक आधुनिक उच्च शिक्षा पहुंचाना और उन्हें समान अवसर देना ही असली आत्मनिर्भरता है। क्या-क्या होगा इन तीन दिनों में? 28 से 30 अप्रैल तक चलने वाले इस सम्मेलन में शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण, स्वास्थ्य सेवा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और क्वांटम तकनीक जैसे विषयों पर विशेष सत्र रखे गए हैं। ये तकनीकें न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाएंगी, बल्कि छात्रों को भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए भी तैयार करेंगी। सम्मेलन में शिक्षाविदों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं, ताकि वैश्विक स्तर पर शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ तौर-तरीकों को भारत में लागू किया जा सके।


