अलवर वन मंडल के वन्यजीव सर्वे में चीतल की संख्या शून्य आना चिंतित करने वाला है। अगर रणथंभौर टाइगर रिजर्व का धारा 144 मॉडल यहां लागू कर मजिस्ट्रेट, फोर्स व वन्यजीवकर्मी तैनात किए जाएं तो चीतल की संख्या में बढ़ोतरी संभव है।
अलवर वन मंडल में 7200 से अधिक वन्यजीव मिले हैं, जिसमें चीतल की संख्या शून्य है। यह आंकड़ा करीब दो दशक से चला आ रहा है। कुछ चीतल इस अवधि से पहले थे, लेकिन वह सरिस्का की ओर चले गए। अब सरिस्का में भी चीतल की संख्या में अपेक्षाकृत वृद्धि नहीं देखी जा रही है। इसी कारण चीतल-सांभर की संख्या बढ़ाने के लिए 500 हेक्टेयर में घास उगाई जा रही है। हालांकि यह घास उगाना ही पर्याप्त उपाय नहीं है।
क्यों कम हो रहे हैं चीतल
चीतल की संख्या कम होने का प्रमुख कारण चारागाह विकास है। साथ ही, टाइगर व पैंथर की संख्या में वृद्धि भी एक कारण माना जा रहा है। मवेशियों को जंगल में छोड़ने से घास खत्म हो रही है, जो कि चीतल व सांभर के विकास के लिए जरूरी है।
क्या है रणथंभौर का धारा 144 मॉडल
रणथंभौर टाइगर रिजर्व में मुख्य रूप से बारिश के दौरान बाघों की सुरक्षा, उनके संरक्षण और अवैध चराई को रोकने के लिए धारा 144 लागू की जाती है। इस अवधि में बाहरी लोगों और मवेशियों के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया जाता है ताकि बाघ-मानव संघर्ष कम हो और वन्यजीवों को शांत वातावरण मिल सके। बारिश में आसपास के गांवों से मवेशियों को जंगल में चराने ले जाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाया जाता है। इससे जंगल में घास बढ़ती है, जिसका प्रयोग सांभर व चीतल करते हैं। सरिस्का में भी जंगल बारिश में बंद होता है, लेकिन धारा 144 लागू नहीं होती। मवेशियों को रोकने के लिए मजिस्ट्रेट से लेकर फोर्स की तैनाती होती है। साथ ही, जंगल की फोर्स अलग से लगती है।
रणथंभौर का धारा 144 मॉडल सरिस्का में बढ़ा सकता है चीतल की संख्या


