सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह जांच करेगा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को लॉ कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज को नियंत्रित और रेगुलेट करने का अधिकार है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि BCI की कानूनी जिम्मेदारी वकील के तौर पर लाइसेंस दिए जाने के बाद शुरू होती है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सवाल उठाया कि BCI को कानूनी शिक्षा रेगुलेट करने वाली विशेषज्ञ संस्था कैसे माना जा सकता है। शिक्षा से जुड़े मामलों को लॉ स्कॉलर्स और शिक्षाविद ज्यादा बेहतर तरीके से देख सकते हैं। दरअसल, BCI ने 13 अगस्त को सभी स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी NALSAR के 2026 बैच के किसी भी ग्रेजुएट को अगले आदेश तक वकील के तौर पर एनरोल न किया जाए। कोर्ट ने BCI से दो हफ्ते में जवाब मांगा, 5 बड़ी बातें… BCI चेयरपर्सन मनन के कार्यकाल पर भी सवाल उठे सुप्रीम कोर्ट इससे पहले BCI चेयरपर्सन मनन कुमार मिश्रा के पद को प्रो-टेम बता चुका है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि उन्हें कोई भी नीतिगत फैसला लेने से पहले भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से सलाह लेनी होगी। इससे पहले मिश्रा के लंबे कार्यकाल को चुनौती देते हुए उनकी पद से हटाने की मांग वाली याचिका भी दाखिल की गई थी। वकील योगमाया एम.जी. की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि मिश्रा पहली बार 2012 तक BCI चेयरमैन चुने गए थे। उन्होंने 2014 में कुछ समय के लिए पद छोड़ा, लेकिन उसी साल नवंबर में दोबारा चेयरमैन बन गए और तब से पद पर बने हुए हैं। CJI की टिप्पणी से नाराज थे छात्र NALSAR यानी नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च, हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी है। यहां करीब 1,400 छात्र पढ़ते हैं। इनमें से करीब 450 छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को पत्र लिखकर CJI को चीफ गेस्ट बनाने का न्योता वापस लेने की मांग की थी।
SC बार काउंसिल के रेगुलेट अधिकार की जांच करेगा:कहा-कानूनी जिम्मेदारी लाइसेंस के बाद शुरू होती; काउंसिल ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट्स का एनरोलमेंट रोका था

