स्वर्णनगरी में आध्यात्मिक वातावरण के बीच दो मुमुक्षुओं की भगवती दीक्षा 5 मार्च को आयोजित होगी। खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिन मणिप्रभ सूरीश्वर महाराज के सान्निध्य में, खरतरगच्छाचार्य आचार्य जिन मनोज्ञसूरीश्वर महाराज तथा आचार्य जिन पूर्णानंद सूरीश्वर महाराज सहित शताधिक साधु-साध्वी भगवंतों की उपस्थिति में यह दीक्षा समारोह संपन्न होगा। बाड़मेर निवासी सुशीला देवी रतनलाल मालू की पुत्री संतोष मालू तथा शेरगढ़ निवासी सुमित्रा देवी रमेश कुमार लूणिया की पुत्री कुमारी मैना लूणिया संयम पथ को अंगीकार कर साध्वी जीवन में प्रवेश करेंगी। दोनों मुमुक्षु परमात्मा महावीर के बताए मार्ग पर अग्रसर होते हुए पंच महाव्रत धारण करेंगी। संतोष मालू ने बताया कि 26 वर्ष की आयु में प्रवर्तिनी सज्जन महाराज तथा प्रवर्तिनी शशिप्रभा महाराज के समुदाय की साध्वी सौम्यगुणा महाराज के बाड़मेर चातुर्मास के दौरान उन्हें सान्निध्य मिला।
आगमों के अध्ययन से उनके मन में वैराग्य जागृत हुआ। उनका कहना है कि अरिहंत परमात्मा की वाणी जीवन को भवसागर से पार लगाने वाली है और संयम जीवन सर्वोत्तम मार्ग है। दीक्षा के पश्चात उनका प्रयास रहेगा कि अधिक से अधिक जन जिनमार्ग में प्रवर्त हों तथा श्रावक-श्राविका धर्म का पालन करें।मैना लूणिया ने बताया कि 29 वर्ष की आयु में साध्वी आनंद दर्शना महाराज की प्रेरणा से उन्हें जैन धर्म के संस्कार प्राप्त हुए। देव-गुरु की कृपा से संयम मार्ग में उनकी रुचि प्रबल हुई। चादर महोत्सव से पूर्व रजोहरण प्राप्त करना वे अपने जीवन का गौरवपूर्ण क्षण मानती हैं। साध्वी प्रियदर्शना महाराज की शिष्या बनकर आगमों का अध्ययन कर जन-जन तक परमात्मा महावीर की वाणी पहुंचाने की उनकी अभिलाषा है।
जैनागमों के अनुसार दीक्षा जीवन में सांसारिक मोह-माया का त्याग कर सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे पंच महाव्रत धारण किए जाते हैं। संयम मार्ग में साधु-साध्वी पैदल विचरण करते हुए गांव-गांव धर्म संदेश पहुंचाते हैं और आत्मकल्याण के प्रति निरंतर सजग रहते हैं।
पांच मार्च को दोनों दीक्षार्थियों का वर्षीदान का वरघोड़ा निकाला जाएगा। इसके उपरांत जैन भवन में आचार्य, उपाध्याय और साधु-साध्वी भगवंतों की उपस्थिति में भगवान नमिनाथ की छत्रछाया में दीक्षा विधान संपन्न होगा।


