Sambhal Violence: Supreme Court ने रद्द की Afroz की NSA हिरासत, UP पर 10 लाख जुर्माना

Sambhal Violence: Supreme Court ने रद्द की Afroz की NSA हिरासत, UP पर 10 लाख जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के लिए सिर्फ़ ‘एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन’ (कोर्ट के बाहर किया गया कबूलनामा) ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज़ की हिरासत को रद्द कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने अफरोज़ की अपील को मंज़ूरी देते हुए कहा कि हालांकि एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन एक अहम सबूत हो सकता है, लेकिन प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश देने के लिए ज़रूरी संतुष्टि तक पहुँचने से पहले हिरासत लेने वाले अधिकारी को अन्य संबंधित परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि अफरोज़ के मामले में हिरासत लेने वाला अधिकारी इन बातों पर विचार करने में नाकाम रहा और इसलिए उसने प्रिवेंटिव डिटेंशन की शक्ति का गलत इस्तेमाल किया।

इसे भी पढ़ें: CEC Gyanesh Kumar के फैसलों की SIT जांच की मांग, याचिकाओं पर अगले हफ्ते सुनवाई पर सहमत हुए CJI

यह मामला नवंबर 2024 में संभल में शाही जामा मस्जिद के कोर्ट के आदेश पर हुए सर्वे के दौरान भड़की हिंसा के सिलसिले में NSA की धारा 3(2) के तहत अफ़रोज़ की हिरासत से जुड़ा है। हिंसा से जुड़े मामलों में संभल पुलिस ने 17 जनवरी 2025 को अफ़रोज़ को गिरफ़्तार किया था। इसके बाद ज़िला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को उसके ख़िलाफ़ NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया। बाद में राज्य सरकार ने इस हिरासत की पुष्टि की। अफ़रोज़ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस हिरासत को चुनौती दी और तर्क दिया कि अधिकारियों ने जिन सबूतों या जानकारी का इस्तेमाल किया था, वे अपर्याप्त थे और उसके ख़िलाफ़ मामला मुख्य रूप से कथित तौर पर अदालत के बाहर किए गए एक कबूलनामे पर आधारित था। राज्य ने इस याचिका का विरोध किया और जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों का हवाला दिया। राज्य का आरोप था कि हिंसा के दौरान भीड़ को भड़काने में अफ़रोज़ शामिल था और उसकी गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने का ख़तरा था। 

इसे भी पढ़ें: Supreme Court जज बनेंगे Chief Justice DK Upadhyaya, Collegium ने भेजी 3 नामों की लिस्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिरासत को सही ठहराया था। कोर्ट ने कहा कि हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी ने उसके सामने रखी गई जानकारी पर विचार किया था और हिरासत के लिए जिन दस्तावेज़ों का इस्तेमाल किया गया था, वे अफ़रोज़ को दिए गए थे। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के आदेश की न्यायिक समीक्षा करते समय, कोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या अधिकारी ने ज़रूरी जानकारी पर ठीक से विचार किया है, न कि इस बात पर कि वह जानकारी कितनी काफ़ी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अधिकारी द्वारा विचार की गई जानकारी के आधार पर हिरासत को सही नहीं ठहराया जा सकता। बेंच ने इस बात पर विचार किया कि क्या कोर्ट के बाहर किया गया कबूलनामा (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन) प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश का आधार बन सकता है और क्या अधिकारी द्वारा इस्तेमाल की गई जानकारी कानूनी रूप से काफ़ी थी। (ANI) कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के बाहर किया गया कबूलनामा अकेले प्रिवेंटिव डिटेंशन को सही नहीं ठहरा सकता। इस अधिकार का इस्तेमाल करने से पहले अधिकारी को अन्य ज़रूरी और ठोस परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। अफ़रोज़ के मामले में, कोर्ट ने पाया कि अधिकारी ऐसे कारकों पर विचार करने में नाकाम रहा और नतीजतन, उसने उस मकसद के लिए अधिकार का इस्तेमाल किया जिसका समर्थन उसके सामने मौजूद जानकारी से नहीं होता था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *