Mumbai: हर साल मुंबई के करीब 50 नालों से लगभग 50 लाख किलोग्राम प्लास्टिक कचरा अरब सागर में पहुंच रहा है। यह खुलासा नीदरलैंड स्थित गैर-लाभकारी संस्था The Ocean Cleanup (TOC) द्वारा किए गए एक साल लंबे अध्ययन में हुआ है। यह अध्ययन मई 2024 से मई 2025 के बीच किया गया, जिसमें मुंबई महानगर क्षेत्र से समुद्र में जाने वाले प्लास्टिक प्रवाह का विस्तृत मानचित्र तैयार किया गया।
अध्ययन के मुताबिक, ठाणे क्रीक, मालाड क्रीक और वसई क्रीक प्लास्टिक प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत हैं। TOC के संस्थापक Boyan Slat ने कहा कि नालों के जरिए बहता कचरा समुद्र, मैंग्रोव, तटरेखाओं और समुद्र तटों तक पहुंच रहा है। इसका असर करीब 220 किलोमीटर की तटरेखा, 152 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव क्षेत्र, 107 संरक्षित प्रजातियों और लगभग 19 लाख लोगों की आजीविका पर पड़ रहा है, जो तटीय और समुद्री संसाधनों पर निर्भर हैं।
“ट्रैश इंटरसेप्टर” लगाने की योजना
इस समस्या से निपटने के लिए TOC ने प्रमुख नालों के मुहानों पर विशेष “ट्रैश इंटरसेप्टर” लगाने की योजना बनाई है। मानसून से पहले ट्रॉम्बे और मालाड में दो इंटरसेप्टर लगाए जाएंगे, जिनसे शुरुआती चरण में 61 से 92 टन प्लास्टिक कचरा इकट्ठा किए जाने का अनुमान है। अगले तीन वर्षों में संस्था सभी 50 बड़े नालों पर ऐसे सिस्टम लगाने की तैयारी कर रही है।
कचरे को पकड़ेगा इंटरसेप्टर
TOC के अनुसार, मुंबई में ज्वार-भाटे की तेज गतिविधि एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि ऊंचे ज्वार के दौरान प्लास्टिक कचरा उलटी दिशा में भी बहता है। इसी वजह से इंटरसेप्टर को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वह समुद्र की ओर और ज्वार के समय ऊपर की ओर बहने वाले कचरे दोनों को पकड़ सके।
ग्लोबल प्लास्टिक प्रदूषण हॉटस्पॉट में शामिल मुंबई
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मुंबई दुनिया के उन 30 शहरों में शामिल है, जो नदी आधारित प्लास्टिक प्रदूषण के लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। इस परियोजना को बृहन्मुंबई नगर निगम और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सहयोग से लागू किया जाएगा, जबकि स्थानीय निजी एजेंसी रोजमर्रा के संचालन की जिम्मेदारी संभालेगी।
कचरा रोकने के लिए ठोस कदम
विशेषज्ञों का कहना है कि नालों में पहुंचने वाला प्लास्टिक अधिकतर कम मूल्य वाला पैकेजिंग कचरा होता है, क्योंकि रिसाइकल योग्य प्लास्टिक पहले ही कबाड़ी और कचरा बीनने वालों द्वारा इकट्ठा कर लिया जाता है। इससे साफ है कि समुद्र में जा रहे प्लास्टिक को रोकने के लिए नालों के स्तर पर ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है।


