RGHS Update : राजस्थान में RGHS में बड़ा बदलाव संभव, चिकित्सा जगत और सरकारी कर्मचारियों-पेंशनर्स के बीच हलचल बढ़ी

RGHS Update : राजस्थान में RGHS में बड़ा बदलाव संभव, चिकित्सा जगत और सरकारी कर्मचारियों-पेंशनर्स के बीच हलचल बढ़ी

RGHS Update : जयपुर. राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (आरजीएचएस) में बड़े बदलाव की तैयारी की चर्चाओं ने प्रदेश के चिकित्सा जगत और लाखों सरकारी कर्मचारियों-पेंशनर्स के बीच हलचल बढ़ा दी है। सूत्रों और चिकित्सा संगठनों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार सरकार आरजीएचएस को “इंश्योरेंस मोड” पर केवल आईपीडी (भर्ती मरीज) और डे-केयर सेवाओं तक सीमित करने पर विचार कर रही है, जबकि ओपीडी सुविधाओं को सरकारी अस्पतालों में संचालित मुख्यमंत्री निशुल्क निरोगी राजस्थान योजना के तहत शामिल किया जा सकता है।

प्रस्तावित व्यवस्था में मरीजों को ओपीडी में निशुल्क दवा और जांच की सुविधाएं सरकारी अस्पतालों के माध्यम से मिलेंगी। इसके लिए मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना और मुख्यमंत्री निशुल्क जांच योजना के तहत करीब 2472 प्रकार के आइटम सूचीबद्ध किए गए हैं। अस्पतालों के स्तर और श्रेणी के अनुसार इन्हें उपलब्ध कराया जाएगा।

10 लाख ले रहे हैं आरजीएचएस योजना का लाभ

प्रदेश में वर्तमान में आरजीएचएस योजना का लाभ 10 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी, पेंशनर्स और उनके आश्रित उठा रहे हैं। पिछले कई महीनों से निजी अस्पतालों और राज्य सरकार के बीच बकाया भुगतान को लेकर विवाद बना हुआ है। निजी अस्पतालों के आरजीएचएस बहिष्कार से कई अस्पतालों में इस योजना के तहत इलाज नहीं मिल पा रहा है।

…तो चिकित्सक समुदाय समर्थन करेगा

प्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. विजय कपूर ने बयान जारी कर कहा कि आरजीएचएस में भ्रष्टाचार रोकने, पारदर्शिता बढ़ाने और योजना को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे तो चिकित्सक समुदाय इसका समर्थन करेगा।

इससे पूर्व योजना को इंश्योरेंस मॉडल में बदलने के संभावित ड्राफ्ट पर प्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन ने कई अहम सुझाव देते हुए अपनी चिंताएं सामने रखी हैं। इंश्योरेंस मॉडल को लेकर अस्पतालों का कहना है कि यदि इसे लागू किया जाता है तो यह पूरी तरह पुनर्भरण आधारित होना चाहिए, ताकि अनावश्यक जटिलताओं से बचा जा सके।

RGHS पर सालाना 4 हजार करोड़ खर्च

आरजीएचएस के तहत करीब 10 लाख से अधिक कर्मचारियों और पेंशनर्स के परिवारों के करीब 50 लाख सदस्य जुड़े हुए हैं, जिन पर सरकार सालाना लगभग 4 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। वहीं मां योजना के तहत करीब 7 करोड़ लोगों को कवर किया जा रहा है, जिस पर करीब 3500 करोड़ रुपए का व्यय हो रहा है। सरकार का मानना है कि कम लाभार्थियों के बावजूद आरजीएचएस पर ज्यादा खर्च हो रहा है, जिससे वित्तीय दबाव और प्रबंधन संबंधी चुनौतियां सामने आ रही हैं।

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