Rent Vs Home Loan EMI: घर खरीदना सही या किराए पर रहना? ये 6 बातें बदल सकती हैं आपका फैसला

Rent Vs Home Loan EMI: घर खरीदना सही या किराए पर रहना? ये 6 बातें बदल सकती हैं आपका फैसला

Home Loan EMI: घर खरीदना जिंदगी के बड़े फैसलों में से एक है। लेकिन यहां एक गलती अक्सर हो जाती है। लोग किराए और होम लोन की EMI को आमने-सामने रखकर फैसला करने लगते हैं। अगर ईएमआई ज्यादा है, तो किराए को सस्ता मान लिया जाता है और अगर ईएमआई किराए के करीब है तो घर खरीदना बेहतर समझ लिया जाता है। असल हिसाब इससे कहीं बड़ा है। घर खरीदते समय डाउन पेमेंट, स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन, लोन का ब्याज, मेंटेनेंस, प्रॉपर्टी टैक्स और मरम्मत जैसे खर्च भी जुड़ते हैं। दूसरी तरफ किराए पर रहने में जमा राशि, ब्रोकरेज, शिफ्टिंग खर्च और हर साल बढ़ता किराया जेब पर असर डालता है।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किराया कितना है और ईएमआई कितनी होगी। असली सवाल यह है कि आपकी आर्थिक स्थिति में कौन सा विकल्प ज्यादा फिट बैठता है।

1 करोड़ का घर या 30 हजार किराया

मान लीजिए 1 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी का मंथली रेंट 30,000 रुपये है। यानी सालभर में किराया 3.60 लाख रुपये हुआ। यह प्रॉपर्टी की कीमत का करीब 3.6 फीसदी है। लेकिन सिर्फ इस आंकड़े से यह तय नहीं किया जा सकता कि घर खरीदना महंगा है या किराए पर रहना। गोदरेज वेल्थ के चीफ बिजनेस ऑफिसर नीरज महाजन के मुताबिक, तुलना करते समय घर की कीमत, सालाना किराया, होम लोन की लागत, कितने साल उस घर में रहने की योजना है और डाउन पेमेंट के पैसे का दूसरा इस्तेमाल करने पर मिलने वाला संभावित रिटर्न, इन सभी चीजों को ध्यान में रखना चाहिए। यानी हिसाब-किताब लंबा है, लेकिन यही सही तस्वीर दिखाता है।

घर खरीदने पर सिर्फ EMI नहीं भरनी होती

होम लोन की ईएमआई आपकी सबसे बड़ी मासिक लागत हो सकती है, लेकिन यह पूरी लागत नहीं है। घर खरीदते समय स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज देना पड़ता है। इसके अलावा लोन प्रोसेसिंग फीस, घर का इंटीरियर, प्रॉपर्टी टैक्स, मेंटेनेंस और समय-समय पर होने वाली मरम्मत का खर्च भी आता है। सबसे अहम है डाउन पेमेंट। मान लीजिए आपने घर खरीदने में अपनी बड़ी बचत लगा दी। अब वह पैसा किसी दूसरे निवेश, इमरजेंसी फंड या दूसरे जरूरी काम में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। इसे निवेश की भाषा में ऑपोर्च्युनिटी कॉस्ट कहा जाता है। इसलिए सिर्फ यह उम्मीद रखकर घर खरीदना सही रणनीति नहीं है कि आने वाले वर्षों में प्रॉपर्टी की कीमत बहुत बढ़ जाएगी और सारा हिसाब बराबर हो जाएगा।

किराए पर रहने में भी खर्चे कम नहीं हैं। किराए का विकल्प पूरी तरह बेफिक्र होने वाला नहीं है। घर लेते समय सिक्योरिटी डिपॉजिट देना पड़ सकता है। ब्रोकरेज देना पड़ सकता है और एक घर से दूसरे घर में जाने पर शिफ्टिंग का खर्च भी आता है। सबसे बड़ी बात, किराया समय के साथ बढ़ सकता है। यानी किराए पर रहने वाले व्यक्ति को भी लंबी अवधि का हिसाब लगाना चाहिए।

एक और अहम बात है। अगर कोई व्यक्ति घर खरीदने के बजाय किराए पर रहता है और डाउन पेमेंट की रकम या ईएमआई और किराए के बीच बचने वाली राशि को निवेश करता है, तो उस संभावित रिटर्न को भी गणना में शामिल करना चाहिए।

20 साल और 30 साल के होम लोन में बड़ा फर्क

लंबी अवधि का होम लोन पहली नजर में राहत देता है। ईएमआई कम हो जाती है। लेकिन यहां मामला थोड़ा उलटा है। ईएमआई कम होने का मतलब यह नहीं कि घर सस्ता पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर 80 लाख रुपये के होम लोन को 8 फीसदी की ब्याज दर पर लें और मान लें कि पूरी अवधि में ब्याज दर यही रहती है और कोई प्रीपेमेंट नहीं किया जाता। ऐसे में 30 साल की अवधि चुनने पर 20 साल के लोन की तुलना में ईएमआई करीब 8,200 रुपये कम हो सकती है। लेकिन इसके बदले पूरी अवधि में करीब 50.7 लाख रुपये ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ सकता है। यानी आज की जेब पर बोझ कम हुआ, लेकिन लंबे समय में बैंक को जाने वाला पैसा काफी बढ़ गया। इसलिए होम लोन की अवधि चुनते समय सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि हर महीने कितनी ईएमआई देनी होगी। कुल ब्याज भी देखना जरूरी है।

एक जैसी सैलरी, फिर भी घर खरीदने की कैपेसिटी अलग

दो लोगों की मंथली इनकम समान हो सकती है, लेकिन दोनों की घर खरीदने की कैपेसिटी एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है। एक व्यक्ति के पास डाउन पेमेंट के लिए पर्याप्त बचत हो सकती है और हो सकता है उसके पास कोई दूसरा लोन न हो। वहीं, हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति माता-पिता की जिम्मेदारी संभाल रहा हो, उसकी आय में बोनस का बड़ा हिस्सा शामिल हो या आने वाले समय में नौकरी के कारण दूसरे शहर जाना पड़ सकता हो। इसलिए सिर्फ सैलरी देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति कितना महंगा घर खरीद सकता है। मौजूदा EMI, परिवार की जिम्मेदारियां, नौकरी में स्टेबिलिटी, इमरजेंसी फंड और घर खरीदने के बाद हर महीने बचने वाली रकम भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

अगर नौकरी या शहर बदलने की संभावना ज्यादा है, तो किराए का विकल्प ज्यादा लचीलापन दे सकता है। वहीं, जिस व्यक्ति का एक ही शहर में लंबे समय तक रहने का इरादा है, उसके लिए घर का मालिकाना हक ज्यादा अहम हो सकता है।

कब घर का मालिकाना हक ज्यादा मायने रखता है?

घर खरीदने का फैसला केवल पैसों से तय नहीं होता। जिंदगी की जरूरतें भी इसमें बड़ा रोल निभाती हैं। बच्चों की स्कूलिंग एक जगह हो, माता-पिता के पास रहना हो या परिवार लंबे समय के लिए किसी शहर में बसना चाहता हो, तो घर का मालिकाना हक महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे मामलों में सिर्फ किराए और ईएमआई का हिसाब पूरी तस्वीर नहीं बताता। रिटायरमेंट के करीब पहुंचने पर भी खुद का घर एक अलग तरह की वित्तीय सुरक्षा दे सकता है।

क्या हो फैसला?

किराया कम और ईएमआई ज्यादा है, इसलिए किराए पर रहना चाहिए। या ईएमआई किराए के करीब है, इसलिए घर खरीद लेना चाहिए। इस तरह का सीधा हिसाब अक्सर अधूरा साबित हो सकता है। लोन से घर खरीदना लॉन्ग टर्म कमिटमेंट है। इसमें पैसा एक प्रॉपर्टी में बंध जाता है और कर्ज की जिम्मेदारी भी आती है। किराए पर रहने से ज्यादा लचीलापन मिलता है, लेकिन लंबे समय तक किराया बढ़ने का जोखिम बना रहता है। इसलिए फैसला अपनी आय, बचत, कर्ज, परिवार की जरूरत और भविष्य की योजनाओं को देखकर करना चाहिए।

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