पार्ट-2 : कोर्ट ने माना-अधिकृत है बस्ती:झील बचाने में ‘जयमंगला गढ़’ उजड़ रहा; 335 परिवारों को हटाया जाएगा!

पार्ट-2 : कोर्ट ने माना-अधिकृत है बस्ती:झील बचाने में ‘जयमंगला गढ़’ उजड़ रहा; 335 परिवारों को हटाया जाएगा!

कांवर झील को पर्यटन स्थल बनाने की जल्दबाजी में इसे जड़ से उजाड़ने की कोशिश की जा रही है। झील के बीचोबीच बसी मंझौल बस्ती को अतिक्रमण बताकर खाली कराया जा रहा है। पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 5 फरवरी 2026 को जयमंगला गढ़ की मुसहर बस्ती को अतिक्रमणकारी नहीं, अधिकृत माना। इसके बावजूद 27 फरवरी को अंचलाधिकारी ने 12 मार्च तक बस्ती खाली करने का नोटिस जारी कर दिया। 10 मार्च को न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने दो आदेश देकर उजाड़ने पर रोक लगा दी। इस बीच 1 मार्च से विद्यालय बंद कर दिया गया और 10 मार्च से आंगनबाड़ी केंद्र स्थानांतरित कर दिया गया। भवन तोड़ने के भी आदेश दिए हैं। करीब 1300 की आबादी वाली बस्ती आज मिटने की कगार पर है। यह पूरी प्रक्रिया न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि कोर्ट की अवमानना का भी स्पष्ट उदाहरण पेश करती है। गौरतलब है कि 2023 के जातीय सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में 40 लाख मुसहरों में 96.3 प्रतिशत भूमिहीन हैं और केवल 18 प्रतिशत के पास पक्का मकान है। साक्षरता दर महज 9.8 प्रतिशत है। न्याय की प्रतीक्षा में ये परिवार सिस्टम की संवेदनहीनता का शिकार हो रहे हैं। विवाद निपटारे में लगेंगे 12 साल कांवर झील भूमि विवादों पर सुनवाई सुस्त है। मंझौल एसडीओ के अनुसार 1726 वादों में 563 वाद हाजिरी पैरवी के अभाव में निष्पादित हैं, कार्यव्यस्तता के कारण हर महीने सिर्फ 8-10 का ही निष्पादन संभव है। इस रफ्तार से देखें तो 1163 मामलों को निपटाने में करीब 9 से 12 साल लग सकते हैं। बखरी एसडीओ ने भी इसी तरह की व्यस्तताओं का हवाला देते हुए कहा है कि 155 में 15 मामले निबटाये हैं शेष 140 में 18 माह का समय लग सकता है। जबकि दोनों अफसरों को सरकार ने डीएम की शक्तियां दी हैं। देवांश मान नहीं हुई थी बंदोबस्ती बिहार ग्रंथ अकादमी द्वारा 1977 में प्रकाशित ऐतिहासिक पुस्तक ‘बिहार की नदियां’ में उल्लेख है कि झील के बीच मिट्टी के टीले पर माता जयमंगला का मंदिर स्थित है। 1793 ई में जब राज्य में सर्वत्र जमीन की बन्दोबस्ती हुई। तब इस जगह को देवांश मानकर छोड़ दिया गया था। वर्ष 1970 में गंगाधर झा, सिधेश्वर झा आदि की जमीन पर पर्चा जारी कर 60 मुसहरों को बसाया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इन्हें 1982 में इंदिरा आवास गुच्छ योजना के तहत 67 परिवारों को घर भी दिए गए थे। प्राकृतिक जलमार्ग बंद, इसलिए सूखा विशेषज्ञों का मानना है कि झील के सूखने का बड़ा कारण प्राकृतिक जल मार्गों का अवरुद्ध होना है। आसपास सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों के कारण पानी के पुराने रास्ते स्थायी रूप से बंद हो गए हैं। 1951 में कांवर-बगरस नहर परियोजना शुरू की गई थी। करीब 8 किलोमीटर लंबी इस नहर का आज कोई अस्तित्व नहीं बचा। जबकि जल संसाधन विभाग ने 362 करोड़ की नई योजना बना दी है। सरकार ने बसाया, अब अतिक्रमणकारी मंझौल-3 जयमंगला गढ़ मुसहर बस्ती रामसर साइट के नोटिफाइड क्षेत्र से बाहर है। यहां रहने वाले 335 में 222 परिवारों को अलग-अलग वर्षों में पीएम आवास का लाभ दिया गया है। सामुदायिक भवन, स्कूल, हेल्थ सेंटर, आंगनबाड़ी और सरकारी गेस्ट हाउस तक बन गए। लेकिन, अब कोर्ट का आदेश बताकर इस बस्ती से अतिक्रमण हटाने के नाम पर ये संसाधन बर्बाद किये जा रहे हैं। कांवर झील को पर्यटन स्थल बनाने की जल्दबाजी में इसे जड़ से उजाड़ने की कोशिश की जा रही है। झील के बीचोबीच बसी मंझौल बस्ती को अतिक्रमण बताकर खाली कराया जा रहा है। पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 5 फरवरी 2026 को जयमंगला गढ़ की मुसहर बस्ती को अतिक्रमणकारी नहीं, अधिकृत माना। इसके बावजूद 27 फरवरी को अंचलाधिकारी ने 12 मार्च तक बस्ती खाली करने का नोटिस जारी कर दिया। 10 मार्च को न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने दो आदेश देकर उजाड़ने पर रोक लगा दी। इस बीच 1 मार्च से विद्यालय बंद कर दिया गया और 10 मार्च से आंगनबाड़ी केंद्र स्थानांतरित कर दिया गया। भवन तोड़ने के भी आदेश दिए हैं। करीब 1300 की आबादी वाली बस्ती आज मिटने की कगार पर है। यह पूरी प्रक्रिया न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि कोर्ट की अवमानना का भी स्पष्ट उदाहरण पेश करती है। गौरतलब है कि 2023 के जातीय सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में 40 लाख मुसहरों में 96.3 प्रतिशत भूमिहीन हैं और केवल 18 प्रतिशत के पास पक्का मकान है। साक्षरता दर महज 9.8 प्रतिशत है। न्याय की प्रतीक्षा में ये परिवार सिस्टम की संवेदनहीनता का शिकार हो रहे हैं। विवाद निपटारे में लगेंगे 12 साल कांवर झील भूमि विवादों पर सुनवाई सुस्त है। मंझौल एसडीओ के अनुसार 1726 वादों में 563 वाद हाजिरी पैरवी के अभाव में निष्पादित हैं, कार्यव्यस्तता के कारण हर महीने सिर्फ 8-10 का ही निष्पादन संभव है। इस रफ्तार से देखें तो 1163 मामलों को निपटाने में करीब 9 से 12 साल लग सकते हैं। बखरी एसडीओ ने भी इसी तरह की व्यस्तताओं का हवाला देते हुए कहा है कि 155 में 15 मामले निबटाये हैं शेष 140 में 18 माह का समय लग सकता है। जबकि दोनों अफसरों को सरकार ने डीएम की शक्तियां दी हैं। देवांश मान नहीं हुई थी बंदोबस्ती बिहार ग्रंथ अकादमी द्वारा 1977 में प्रकाशित ऐतिहासिक पुस्तक ‘बिहार की नदियां’ में उल्लेख है कि झील के बीच मिट्टी के टीले पर माता जयमंगला का मंदिर स्थित है। 1793 ई में जब राज्य में सर्वत्र जमीन की बन्दोबस्ती हुई। तब इस जगह को देवांश मानकर छोड़ दिया गया था। वर्ष 1970 में गंगाधर झा, सिधेश्वर झा आदि की जमीन पर पर्चा जारी कर 60 मुसहरों को बसाया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इन्हें 1982 में इंदिरा आवास गुच्छ योजना के तहत 67 परिवारों को घर भी दिए गए थे। प्राकृतिक जलमार्ग बंद, इसलिए सूखा विशेषज्ञों का मानना है कि झील के सूखने का बड़ा कारण प्राकृतिक जल मार्गों का अवरुद्ध होना है। आसपास सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों के कारण पानी के पुराने रास्ते स्थायी रूप से बंद हो गए हैं। 1951 में कांवर-बगरस नहर परियोजना शुरू की गई थी। करीब 8 किलोमीटर लंबी इस नहर का आज कोई अस्तित्व नहीं बचा। जबकि जल संसाधन विभाग ने 362 करोड़ की नई योजना बना दी है। सरकार ने बसाया, अब अतिक्रमणकारी मंझौल-3 जयमंगला गढ़ मुसहर बस्ती रामसर साइट के नोटिफाइड क्षेत्र से बाहर है। यहां रहने वाले 335 में 222 परिवारों को अलग-अलग वर्षों में पीएम आवास का लाभ दिया गया है। सामुदायिक भवन, स्कूल, हेल्थ सेंटर, आंगनबाड़ी और सरकारी गेस्ट हाउस तक बन गए। लेकिन, अब कोर्ट का आदेश बताकर इस बस्ती से अतिक्रमण हटाने के नाम पर ये संसाधन बर्बाद किये जा रहे हैं।  

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