NEET स्टूडेंट से रेप-हत्या…यह महज एक अपराध नहीं, बल्कि बिहार की कानून-व्यवस्था की कड़ी परीक्षा है। और सम्राट चौधरी अपनी पहली ही परीक्षा में फेल होते दिख रहे हैं। रेप-मर्डर को 11 दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस आज भी अंधेरे में तीर चला रही है। लोगों का दबाव बढ़ा तो SIT बनी, लेकिन उसमें भी वही अफसर शामिल किए गए, जिन पर शुरू से लापरवाही बरतने का आरोप लगता रहा है। सवाल साफ है-किसे बचाया जा रहा है? किस नेता से उसके खास संबंध हैं कि पुलिस कदम पीछे खींच रही है। सम्राट की पुलिस की 5 बड़ी चूक, जिससे न्याय मिलने की उम्मीद धुंधली दिख रही है। जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाही में…। पटना पुलिस की 5 चूक, जिससे न्याय की संभावना कम हो रही 1. 3 दिन बाद FIR, बिना रिपोर्ट आत्महत्या बताया घटना 6 जनवरी की, लेकिन FIR 9 जनवरी को हुई। प्रभात मेमोरियल अस्पताल में इलाज से असंतुष्ट परिवार ने छात्रा को 10 जनवरी को मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन 11 जनवरी की दोपहर उसकी मौत हो गई। 12 जनवरी को पोस्टमॉर्टम कराया गया और बॉडी परिजनों को सौंप दी गई। 2. 14 दिन बाद क्राइम सीन सील किया घटना के 14 दिन तक हॉस्टल या कमरा सील नहीं किया गया, जिससे सबूत नष्ट होने का खतरा था। 3 दिन तक कोई गंभीर जांच नहीं हुई। 3. प्राइवेट ड्राइवर भेजकर सीसीटीवी- DVR मंगवाया उठवाना SHO रोशनी कुमारी ने खुद मौके पर जाने की बजाय अपने प्राइवेट ड्राइवर को DVR लाने भेजा, जो सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका पैदा करता है। 4. संदिग्धों पर 10 दिन बाद कार्रवाई घटना के 10 दिन तक संदिग्धों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने और लोगों के हंगामा करने के बाद 16 जनवरी को पुलिस ने हॉस्टल मकान मालिक मनीष कुमार रंजन को गिरफ्तार किया। 5. लापरवाह अफसरों को ही SIT में शामिल कर दिया लोगों के दबाव पर DGP विनय कुमार ने 16 जनवरी को SIT बनाई, लेकिन इसमें उन्हीं अफसरों को शामिल किया गया जिन पर लापरवाही के आरोप थे। 7 सदस्यीय SIT का नेतृत्व सिटी एसपी (पूर्वी) परिचय कुमार कर रहे हैं। इसमें एएसपी सदर वन अभिनव को भी शामिल किया गया है। जिन्होंने इस केस में शुरू से लापरवाही बरती…जानिए सिटी एसपी परिचय कुमारः इन्होंने बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के सीधे इसे सुसाइड बताया। नींद की गोली और मोबाइल सर्च की कहानी सामने लाए। मेडिकल रिपोर्ट में उनकी सभी बातें उलट साबित हुईं। बिना जांच के नीचे के अफसरों की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। ASP अभिनव कुमारः इन्होंने थाना प्रभारी की रिपोर्ट को ही आधार मान लिया। न कमरे की फोरेंसिक जांच कराई गई, न नए सिरे से संदिग्धों को जोड़ा गया। यह वह टाइम था, जहां केस को सही दिशा में मोड़ा जा सकता था, लेकिन कैजुअल एप्रोच से ही काम किया गया। ऐसा मान लिया गया कि मामला सुसाइड का है, दब जाएगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पुलिस ने SIT के नाम पर सिर्फ कोरम पूरा किया है। अपनी थ्योरी साबित करने पटना एम्स गई पुलिस? PMCH ने अपनी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा है- सेक्सुअल असॉल्ट से इनकार नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट के मुताबिक, उसके प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान हैं। ब्लीडिंग पाई गई है। गाल, गर्दन, माथा, बाईं भौंह के ऊपर, बाएं कंधे के ऊपरी हिस्से, बाईं बांह के अंदरूनी हिस्से (कोहनी के नीचे) और दाहिनी कलाई के ऊपर 2 सेमी तक नाखून से नोचने के निशान थे। पूर्व DGP अभयानंद कहते हैं, ‘सेकेंड ओपिनियन मांगने की जरूरत ही नहीं थी। पटना एम्स भी करीब-करीब PMCH की तरह ही रिपोर्ट देगा। क्योंकि उसको दोबारा बॉडी पोस्टमॉर्टम के लिए नहीं भेजा गया है। उसे रिपोर्ट की कापी भेजी गई है। थोड़ा बहुत बदलाव कर वही बात निकलेगी।’ अभयानंद कहते हैं, ‘पुलिस पटना एम्स भेजकर केस को डिले करने का प्रयास कर रही है। अब मामला बढ़ रहा है तो हो सकता है अपनी गर्दन बचाने के लिए कोई उपाय खोजा जा रहा हो। आगे हो सकता है कि मामले को CBI ट्रांसफर किया जा सकता है।’ मनीष-नीलम के पीछे कौन? मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 15 हजार की नौकरी कर करोड़ों की प्रॉपर्टी बनाने वाला जहानाबाद के मनीष रंजन के पीछे कुछ राजनेताओं का हाथ है। वह समय-समय पर अपनी सर्विस उन नेताओं को उपलब्ध कराता रहा है। मनीष पर पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाया है। नीलम अग्रवाल को भी एक नेता का करीबी बताया जाता है। बताया जा रहा है कि यही कारण है कि नीलम को तब पुलिस ने सिर्फ पूछताछ करके छोड़ दिया था। उसका पटना में कई हॉस्टल है। NEET स्टूडेंट से रेप-हत्या…यह महज एक अपराध नहीं, बल्कि बिहार की कानून-व्यवस्था की कड़ी परीक्षा है। और सम्राट चौधरी अपनी पहली ही परीक्षा में फेल होते दिख रहे हैं। रेप-मर्डर को 11 दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस आज भी अंधेरे में तीर चला रही है। लोगों का दबाव बढ़ा तो SIT बनी, लेकिन उसमें भी वही अफसर शामिल किए गए, जिन पर शुरू से लापरवाही बरतने का आरोप लगता रहा है। सवाल साफ है-किसे बचाया जा रहा है? किस नेता से उसके खास संबंध हैं कि पुलिस कदम पीछे खींच रही है। सम्राट की पुलिस की 5 बड़ी चूक, जिससे न्याय मिलने की उम्मीद धुंधली दिख रही है। जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाही में…। पटना पुलिस की 5 चूक, जिससे न्याय की संभावना कम हो रही 1. 3 दिन बाद FIR, बिना रिपोर्ट आत्महत्या बताया घटना 6 जनवरी की, लेकिन FIR 9 जनवरी को हुई। प्रभात मेमोरियल अस्पताल में इलाज से असंतुष्ट परिवार ने छात्रा को 10 जनवरी को मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन 11 जनवरी की दोपहर उसकी मौत हो गई। 12 जनवरी को पोस्टमॉर्टम कराया गया और बॉडी परिजनों को सौंप दी गई। 2. 14 दिन बाद क्राइम सीन सील किया घटना के 14 दिन तक हॉस्टल या कमरा सील नहीं किया गया, जिससे सबूत नष्ट होने का खतरा था। 3 दिन तक कोई गंभीर जांच नहीं हुई। 3. प्राइवेट ड्राइवर भेजकर सीसीटीवी- DVR मंगवाया उठवाना SHO रोशनी कुमारी ने खुद मौके पर जाने की बजाय अपने प्राइवेट ड्राइवर को DVR लाने भेजा, जो सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका पैदा करता है। 4. संदिग्धों पर 10 दिन बाद कार्रवाई घटना के 10 दिन तक संदिग्धों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने और लोगों के हंगामा करने के बाद 16 जनवरी को पुलिस ने हॉस्टल मकान मालिक मनीष कुमार रंजन को गिरफ्तार किया। 5. लापरवाह अफसरों को ही SIT में शामिल कर दिया लोगों के दबाव पर DGP विनय कुमार ने 16 जनवरी को SIT बनाई, लेकिन इसमें उन्हीं अफसरों को शामिल किया गया जिन पर लापरवाही के आरोप थे। 7 सदस्यीय SIT का नेतृत्व सिटी एसपी (पूर्वी) परिचय कुमार कर रहे हैं। इसमें एएसपी सदर वन अभिनव को भी शामिल किया गया है। जिन्होंने इस केस में शुरू से लापरवाही बरती…जानिए सिटी एसपी परिचय कुमारः इन्होंने बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के सीधे इसे सुसाइड बताया। नींद की गोली और मोबाइल सर्च की कहानी सामने लाए। मेडिकल रिपोर्ट में उनकी सभी बातें उलट साबित हुईं। बिना जांच के नीचे के अफसरों की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। ASP अभिनव कुमारः इन्होंने थाना प्रभारी की रिपोर्ट को ही आधार मान लिया। न कमरे की फोरेंसिक जांच कराई गई, न नए सिरे से संदिग्धों को जोड़ा गया। यह वह टाइम था, जहां केस को सही दिशा में मोड़ा जा सकता था, लेकिन कैजुअल एप्रोच से ही काम किया गया। ऐसा मान लिया गया कि मामला सुसाइड का है, दब जाएगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पुलिस ने SIT के नाम पर सिर्फ कोरम पूरा किया है। अपनी थ्योरी साबित करने पटना एम्स गई पुलिस? PMCH ने अपनी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा है- सेक्सुअल असॉल्ट से इनकार नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट के मुताबिक, उसके प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान हैं। ब्लीडिंग पाई गई है। गाल, गर्दन, माथा, बाईं भौंह के ऊपर, बाएं कंधे के ऊपरी हिस्से, बाईं बांह के अंदरूनी हिस्से (कोहनी के नीचे) और दाहिनी कलाई के ऊपर 2 सेमी तक नाखून से नोचने के निशान थे। पूर्व DGP अभयानंद कहते हैं, ‘सेकेंड ओपिनियन मांगने की जरूरत ही नहीं थी। पटना एम्स भी करीब-करीब PMCH की तरह ही रिपोर्ट देगा। क्योंकि उसको दोबारा बॉडी पोस्टमॉर्टम के लिए नहीं भेजा गया है। उसे रिपोर्ट की कापी भेजी गई है। थोड़ा बहुत बदलाव कर वही बात निकलेगी।’ अभयानंद कहते हैं, ‘पुलिस पटना एम्स भेजकर केस को डिले करने का प्रयास कर रही है। अब मामला बढ़ रहा है तो हो सकता है अपनी गर्दन बचाने के लिए कोई उपाय खोजा जा रहा हो। आगे हो सकता है कि मामले को CBI ट्रांसफर किया जा सकता है।’ मनीष-नीलम के पीछे कौन? मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 15 हजार की नौकरी कर करोड़ों की प्रॉपर्टी बनाने वाला जहानाबाद के मनीष रंजन के पीछे कुछ राजनेताओं का हाथ है। वह समय-समय पर अपनी सर्विस उन नेताओं को उपलब्ध कराता रहा है। मनीष पर पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाया है। नीलम अग्रवाल को भी एक नेता का करीबी बताया जाता है। बताया जा रहा है कि यही कारण है कि नीलम को तब पुलिस ने सिर्फ पूछताछ करके छोड़ दिया था। उसका पटना में कई हॉस्टल है।


