धागों और दस्तानों में बसी जिंदगी, दो दशकों से कठपुतली बचा रहे मिथिलेश, एआई के दौर में भी जिंदा है कला

धागों और दस्तानों में बसी जिंदगी, दो दशकों से कठपुतली बचा रहे मिथिलेश, एआई के दौर में भी जिंदा है कला

वाराणसी: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीक के दौर में भी काशी में परंपरागत कला की दुनिया जीवित है। आधुनिक युग में भी कुछ कलाकार पुरातन सभ्यता को संजोए हुए हैं। ऐसी ही कहानी है कठपुतली मैन कहे जाने वाले मिथिलेश दुबे की, जो पिछले दो दशकों से अधिक समय से इस कला को जीवित रखे हुए हैं।

जब से टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लोगों के जीवन का हिस्सा बनी है, तब से पुरातन और पारंपरिक कला कहीं पीछे छुटती जा रही है। बावजूद इसके मिथिलेश और उनके जैसे कई कलाकार इन परंपराओं और संस्कृति को युवाओं के बीच पहुंचने का काम कर रहे हैं। मिथिलेश और उनकी टीम में शामिल करीब 10 से 12 लोग नई पीढ़ी तक ग्लव्स पपेट के जरिए सामाजिक और लोगों के जीवन पर आधारित कहानी पहुंच रहे हैं। इसका उद्देश्य लोगों के मनोरंजन के अलावा पुरातन सभ्यता के प्रति जागरूक करना भी है।

बंगाल के गुरु से सीखी कला

मिथिलेश ने बताया कि वह एक थिएटर आर्टिस्ट रहे हैं और जिस तरह से कठपुतली कला अंतिम सांस ले रही है, उसको लेकर इन्होंने इसे फिर से जीवित करने का जरिया बनने का सोचा। उन्होंने बताया कि नए युग के लोग अब इन कलाओं को भूलते जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि यही वजह है कि उन्होंने इसे एक बार फिर से जीवंत करने का मन बना लिया। मिथिलेश ने बताया कि उनके गुरु स्वर्गीय सुरेश दत्त पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे और उनसे उन्होंने इस कला को सीख कर इसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।

मिथिलेश ने बताया कि उनकी टीम में शामिल सदस्यों के साथ मिलकर वह अलग-अलग विषयों पर कहानी तैयार करते हैं। इन कहानियों का मकसद केवल कहानी तक ही सीमित रहना नहीं होता, बल्कि समाज को एक संदेश देने का भी मकसद होता है। उन्होंने बताया कि यदि एक छोटी सी कहानी तैयार की जाती है तो इसमें दो से तीन महीने तक का वक्त लग जाता है। वहीं, किसी व्यक्ति विशेष पर यदि कहानी तैयार करनी हो तो इसमें करीब 1 साल तक कभी समय लग जाता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में वह लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जीवनी तैयार करने में जुटे हुए हैं।

चार प्रकार की होती है कठपुतली कला

मिथिलेश ने बातचीत के दौरान बताया कि कठपुतली कला के चार प्रमुख रूप होते हैं। स्ट्रिंग (धागे वाली) ग्लव्स (दस्ताने वाली) शैडो (परछाई वाली) और रॉड (छड़ी वाली)। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में ग्लव्स वाली कला ज्यादा मशहूर है, जिसमें में कलाकार उंगलियों के सहारे पत्रों को पेश करते हैं। मिथिलेश ने बताया कि उन्होंने अब तक देश के 18 राज्यों में अपनी इस कला की प्रस्तुति दी है। मिथिलेश के मुताबिक, पुराने समय के लोग तो इस कला में रुचि रखते ही है, लेकिन अब युवा पीढ़ी भी इस कला को देखने पहुंच रही है।

उन्होंने बताया कि जब कभी उन्हें समय मिलता है, वह वर्कशॉप आयोजित करके बच्चों को यह कला दिखाते हैं और इसकी प्रस्तुति भी समझते हैं। उन्होंने बताया कि अब तक 50 से अधिक लोगों को वह प्रशिक्षण दे चुके हैं। हालांकि, उनके मन में विलुप्त हो रही इस कला को लेकर मलाल भी है। उन्होंने बताया कि इस तरह की कला दिखाने के बावजूद भी कलाकार आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, शायद यही वजह है कि धीरे-धीरे यह कला विलुप्त होती जा रही है। मिथिलेश ने कहा है कि यदि सरकार और कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं इस कला को बढ़ावा दें तो इसे विलुप्त होने से बचाया जा सकता है। इसके साथ ही यह रोजगार का एक मध्यम भी बन सकता है।

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