पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा सरकार की ‘पेन-डाउन’ स्ट्राइक, अधिकारों की अनदेखी का लगाया आरोप

पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा सरकार की ‘पेन-डाउन’ स्ट्राइक, अधिकारों की अनदेखी का लगाया आरोप

Khyber Pakhtunkhwa: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में संघीय सरकार के खिलाफ एक अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। दरअसल, मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी के आह्वान पर पूरे प्रांत में अभूतपूर्व ‘पेन-डाउन’ हड़ताल लागू की गई। इस हड़ताल के चलते गैर-जरूरी सरकारी कामकाज पूरी तरह प्रभावित रहा। इस दौरान प्रांत के सरकारी कार्यालय तो खुले रहे, लेकिन अफसरों ने फाइलों को आगे बढ़ाने, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और नियमित प्रशासनिक कार्य करने से परहेज किया। हालांकि आपातकालीन और आवश्यक सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहीं।

संघीय सरकार पर क्या लगाया आरोप?

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के अधिकारियों ने ‘पेन-डाउन’ स्ट्राइक को प्रांतीय अधिकारों की कथित उपेक्षा के खिलाफ एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन बताया। मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से जारी बयान में संघीय सरकार पर महत्वपूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक मामलों में प्रांत की अनदेखी का आरोप लगाया गया।

प्रांतीय अधिकारियों ने दावा किया कि राष्ट्रीय वित्त आयोग के पुरस्कार के तहत खैबर पख्तूनख्वा को उसका उचित हिस्सा नहीं दिया गया। बिजली एवं प्राकृतिक गैस संसाधनों के वितरण में उसके साथ असमान व्यवहार किया गया। सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि प्रांत लंबे समय से वित्तीय अन्याय और राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा है।

इस पेन डाउन स्ट्राइक ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी की हिरासत की स्थितियों पर भी ध्यान आकर्षित किया। खैबर पख्तूनख्वा के अधिकारियों ने आरोप लगाया कि दंपति को पर्याप्त कानूनी सहायता, पारिवारिक मुलाकातों और निजी डॉक्टरों से चिकित्सा परामर्श से वंचित रखा जा रहा है। प्रांतीय नेताओं ने इन प्रतिबंधों को गैरकानूनी और अमानवीय बताया, जिससे इस्लामाबाद और प्रांतीय प्रशासन के बीच दरार बढ़ गई है।

सार्वजनिक सेवाओं पर असर नहीं

आपको बता दें कि खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने सप्ताह की शुरुआत में ही विरोध-प्रदर्शन की घोषणा करते हुए प्रांतीय विभागों से नियमित कागजी कार्रवाई रोकने का आह्वान किया था। उन्होंने इसे संघीय हस्तक्षेप के खिलाफ पेन स्ट्राइक को प्रतीकात्मक करार दिया था। हालांकि हड़ताल से सार्वजनिक सेवाओं पर कोई खास असर नहीं पड़ा, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे संघीय सरकार और खैबर पख्तूनख्वा प्रशासन के बीच चल रहे टकराव में एक तीखा मोड़ माना। एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, संघीय अधिकारियों ने अभी तक इस पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

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